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मॉब लिंचिंग पर टीवी-अख़बार के दबदबे के कारण हिन्दू फंसा है गनभेदी चुप्पी के मकड़जाल में!

चन्द्रकान्त प्रसाद सिंह। मॉब लिंचिंग की जड़ें ईसाइयत, इस्लाम और कम्युनिज़्म में हैं, हिन्दू तो बस ‘मियाँ की जूती मियाँ के सर’ मार रहे हैं! कम्युनिज़्म और इस्लाम के प्रसार का आधार ही मॉब लिंचिंग है। इसके पहले ईसाइयत का भी यही हाल था। बाइबिल में दो दर्जन से ज़्यादा बार लिंचिंग का उल्लेख है। काफ़िरों/मुशरीक़ों को प्रताड़ित या उनकी हत्या करने का क़ुरआन में 24 बार उल्लेख है जबकि भारत की किसी भाषा में मॉब लिंचिंग का कोई मौलिक समानार्थी शब्द नहीं है। याद है अरब की प्रेम-कहानी पर बनी फ़िल्म लैला-मजनू का वो गाना “हुस्न हाज़िर है मुहब्बत की सज़ा पाने को कोई पत्थर से न मारे मेरे दीवाने को…”

इसे कहते है मॉब लिंचिंग
मुसलमानों द्वारा हिंदुओं की मॉब लिंचिंग के बिना ही एक पहाड़ का नाम अभी तक हिन्दूकुश है? इस्लाम में मॉब लिंचिंग मजहब सम्मत नहीं होता तो क्यों नहीं इस पहाड़ का नाम अबतक बदला गया? 1400 सालों में 10 करोड़ हिंदुओं और बौद्धों की सगर्व मॉब लिंचिंग की गई है। ईसाइयत ने यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका और एशिया में 30 करोड़ से ज्यादा लोगों की मॉब लिंचिंग की है जबकि कम्युनिज़्म ने तो 100 सालों से भी कम में 10 करोड़ का आँकड़ा पार कर लिया। करोड़ों की मॉब लिंचिंग करने- कराने वाले मोहम्मद को पैग़म्बर माननेवाले मुसलमानों तथा लेनिन, स्टालिन और माओ जैसों को नायक माननेवाले कम्युनिस्टों को मॉब लिंचिंग के विरोध का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

1000 सालों से मॉब लिंचिंग के शिकार हिंदुओं का धैर्य जवाब दे रहा है क्योंकि सोशल मीडिया उन्हें उनके साथ हुए अन्याय की पुख़्ता जानकारी दे रहा है। उन्हें यह भी पता चल रहा है कि देश सत्ता संस्थान (नौकरशाही, विधायिका, न्यायपालिका, मीडिया, स्कूल-कॉलेज- विश्वविद्यालय) आज भी हिंदुओं की सैकड़ों सालों से चली आ रही मॉब लिंचिंग पर या तो पर्दा डालता रहा है या फिर हिंदुओं को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहरा देता है।

बहुमत हिन्दू अब इस साज़िश को समझ रहा है और आत्मरक्षार्थ प्रतिहिंसा का सहारा ले रहा है। इसे क़ानून से तो नहीं ही रोका जा सकता, हाँ समाजसम्मत और न्यायसम्मत व्यवस्था से जरूर रोका जा सकता है। इसलिए मामला गाय बनाम इंसान का नहीं बल्कि सैकड़ों सालों से चली आ रही मॉब लिंचिंग पर चुप्पी बनाम ईंट का जवाब पत्थर से देने का है।

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टीवी-अख़बार के दबदबे के कारण हिन्दू ‘गगनभेदी चुप्पी के मकड़जाल’ में फँसकर रह जाता था। आज वह क्रूर सत्य से लैश है, इसलिए मॉब लिंचिंग का विशेषज्ञ इवांजेलिस्ट-जेहादी-कम्युनिस्ट गिरोह खुद को पीड़ित घोषित करने का नाटक कर रहा है।
सवाल है कि-

● राम मंदिर की मॉब लिंचिंग हुई थी या नहीं?

● ऐसे ही देश के 40000 देवस्थानों की मॉब लिंचिंग किसने और किस किताब के आधार पर की थी?

● भारत का बँटवारा क्या बिना मॉब लिंचिंग के हुआ था?

● कश्मीर घाटी के अल्पसंख्यक का जातिनाश क्या बिना मॉब लिंचिंग के हुआ था?

● पंजाब में हिंदुओं और दिल्ली में सिखों की मॉब लिंचिंग नहीं हुई थी क्या? कौन लोग थे इसके पीछे?

● गोधरा में औरतों और बच्चों की मॉब लिंचिंग किसने की थी?

● जिस दिन अलवर में गौ-तस्कर की कथित मॉब लिंचिंग हुई उसी दिन बाड़मेर में मुस्लिम लड़की से प्रेम करने के कारण एक हिन्दू लड़के की मॉब लिंचिंग हुई या नहीं? फिर इस पर खबर को क्यों दबाया गया?

● ऐसी ही एक घटना के शिकार दिल्ली के लड़के के पिता से इफ़्तार पार्टी दिलवानेवाले कौन लोग थे?

● दिल्ली के ही डॉ नारंग की मॉब लिंचिंग पर सत्ता संस्थान क्यों चुप था?

● लाखों मामलों पर बैठनेवाली अदालत रात में एक आतंकवादी के लिए खुलती है या फिर आतंकवादियों की समर्थक पार्टी की सरकार बनवाने के लिए खुलती है। यह न्याय और नीति की मॉब लिंचिंग है या नहीं?

● नियमों को ताक पर रखकर एक सरकार 2008 से 2014 के बीच में 36 लाख करोड़ के लोन बाँट देती है, यह जनहित की मॉब लिंचिंग है या नहीं?

लब्बोलुआब यह है कि सैकड़ों सालों से अल्पमत द्वारा मॉब लिंचिंग के शिकार बहुमत ने खुद को नरम चारा के रूप में पेश करने से न सिर्फ मना कर दिया है बल्कि ‘मियाँ की जूती मियाँ के सर’ मारना शुरू कर दिया है जिसका ईलाज अब्राह्मिक-साम्यवादी गिरोहों द्वारा स्थापित क़ानून का शासन नहीं बल्कि ऐसे संविधान का निर्माण और उसपर अमल है जो समाजसम्मत हो, नीतिसम्मत हो, न्यायसम्मत हो और विधिसम्मत हो। सत्ता संस्थान ने इसे समझने में भूल की तो इसकी रही-सही विश्वसनीयता भी जाती रहेगी और जनता क़ानून अपने हाथ में लेकर ‘फटाफट न्याय’ करने लगेगी।

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साभार: चंद्रकांत पी सिंह की फेसबुक वाल से!

URL: Mob lynching truths or dissemination of media

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