मीडिया का प्रधानमंत्री संग विदेश न जा पाना परेशानी का कारण है या नोटबंदी के आंकड़े !

आंकड़ो का खेल आप शानदार खेल रहे हैं। अर्थशात्र के चकरघिन्नी से साबित कर दीजिए की नोटबंदी फेल हो गया। आम जनता को इस गणित से क्या लेना देना।सुन कौन रहा है सर। ये तो आप 9 महीने से चिल्ला रहे है। आपकी चिल्लाहट की शोर में जो दिख रहा है न वो जनता संमझ रही है। चुपके से,यूपी के नोट की देवी से पूछिए। पैसे से वोट खरीदने वाले माफिया और राजनीति को बपौती मानने वाले खानदानी मरगिल्लों से पूछिए। सालो से जनता की गाढ़ी कमाई लूटने वाले देश के बिल्डरों से पूछिए। हां धीरे से टीवी चैनल चलाने के नाम पर वर्तमान सरकार मे धमक की सेखी बघारने वालो से पूछिए।

पूछिये,दो तीन दशक से सत्ता की चाकरी करने वाले सात से आठ प्रतिशत पत्रकारों से पूछिए क्या आय से अधिक संपत्ति की जांच उनके खिलाफ नहीं होनी चाहिये। उन से पूछिए की कल तक सत्ता की चाकरी करना, दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री मुख्यमंत्री, केंद्र के मंत्री संग फोटो खिंचाना, दिवाली पर लाखों का गिफ्ट आना बंद होने की परेशानी तो नहीं।

प्रधानमंत्री संग विदेश जाना अब सपना हो जाना परेशानी का कारण तो नहीं। या सचमुच नोटबंदी के आकड़े परेशानी का कारण है।मुझे तीन साल पहले का दो चार नामचीन पत्रकार बता दीजिए जो सत्ता के खिलाफ पत्रकारिता कर रहा था। तहलका वाला तेजपाल समेत विपक्ष के खिलाफ मुहिम वाला! किस किस का नाम लू? मतलब वो बड़ा इस लिए था क्योंकि वो सरकार की सुविधा के साथ सेखी बघार रहा था। फोटो खिंचवा रहा था। स्पष्ट रूप से बड़ी बात थी भाई की वो आपके देश के मंत्री संत्री के साथ फोटो खिंचाए। आज ये पाप हो गया। किसने बनाया ये माहौल? आपके मुंह से ये किराये की नैतिकता सोभ रही है कि पत्रकारिता को सत्ता के खिलाफ जनता की आवाज का पहरेदार होना चाहिये। हाँ सर होना चाहिये न। कीजिये न ये तो जनता तय करेगी न की आप पहरेदार उनके है या किसी और के। आप बस करते रहिये,हतास न होइये बस!

ऐसा नहीं है कि आपके पेशे पर उसे भरोसा नहीं। साख बची है अभी सैकड़ो के तपस्या से जिसकी नैतिकता के आवरण में आप जिन्दा है, आपकी चमक धमक जीवित है। यकीं है हमें, आज भी यदि कोई पेशा खुद को आईना दिखाता है ,तो बस पत्रकारिता है, वर्ना धरती पर भगवान कहलाने वाले डॉक्टरों की करतूत तक तो बस देख ही रहे हैं। तो बस सर ,आप चिल्लाते रहिये, शोर जरुरी है लोकतंत्र में। ताकि जनता जागी रहे, सजग रहे, वो जान सके की आपकी नियत क्या? आप कितने नैतिक दीखते है? क्योंकि फैसले आंकड़ो से नहीं होते।

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