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लड़ाई राजनीतिक हो या आंकड़ों की, जब भी मौका आता है मोदी-अमित शाह की जोड़ी जीत के मारक जज्बे के साथ मैदान में उतरती है।

तारीख थी 17 अप्रैल 1999। जयललिता के एनडीए सरकार से समर्थन वापस ले लेने के कारण वाजपेयी सरकार विश्वास प्रस्ताव रखने पर मजबूर थी। पक्ष और विपक्ष नंबर अपने पक्ष में जुटाने की कोशिश में लगा था। लोकसभा में बहस चल रही थी। मायावती ने सदन के गलियारे में कह दिया कि वह मतदान में हिस्सा नहीं लेंगी। संसदीय मंत्री प्रमोद महाजन की जान में जान आई। जब मतदान की बारी आई तो मायावती ने पलटी मार दी। उन्होंने कह दिया कि वो वाजपेयी सरकार के खिलाफ मतदान करेंगी। नेशनल कॉन्फ्रेंस के सैफुद्दीन सोज ने अपनी पार्टी के फैसले के खिलाफ जाकर वाजपेयी के विरोध में वोट किया। कांग्रेस के गिरधर गोमांग ओड़ीशा के सीएम बन चुके थे लेकिन नैतिकता को ताक पर रख कर बतौर एमपी उन्होंने भी वोट कर दिया। मतदान की जब गिनती हुई तो वाजपेयी सरकार एक वोट से विश्वास प्रस्ताव हार चुकी थी।

लोकसभा में अपनी सीट पर बैठे वाजपेयी ने अपने दोनों हाथों को सर से लगाया और झुक कर सदन के फैसले को स्वीकार किया। विपक्ष जश्न मना रहा था। वाजपेयी सदन के अपने कक्ष में वापस लौटे। वहां राजमाता विजयराजे सिंधिया फफक-फफक कर रो रही थीं। उन्हें ढांढस बंधाने में वाजपेयी ख़ुद भी भावुक हो गए।

समझदार गलतियों से सीखता है। 1999 के बाद जब भी नंबर जुटाने की बारी आई। बीजेपी कीलिंग स्पीरिट से मैदान में उतरी। एक-एक नंबर को उसने अहमियत दी। एक-एक साझीदार को विश्वास में लेने की कोशिश करती रही है। 2007 में उपराष्ट्रपति चुनाव में वाजपेयी खुद व्हीलचेयर में वोट डालने आए थे। गुरुवार को उपसभापति पद के चुनाव में किडनी ट्रांसप्लांट के बाद स्वास्थ्य लाभ कर रहे अरुण जेटली को मतदान के लिए आना पड़ा। अमित शाह ने अपने अहं को ताक पर रख कर अपनी विरोधी पार्टियों के नेताओं को अपने पक्ष में किया। राज्यसभा में केजरीवाल जैसे विरोधी नेता के वोट हासिल करने के लिए नीतीश की मदद हासिल की। लड़ाई राजनीतिक हो या आंकड़ों की, जब भी मौका आता है बीजेपी, खासकर मोदी-अमित शाह की जोड़ी जीत के मारक जज्बे के साथ मैदान में उतरती है।

इसके उलट देखिये। असम के बड़े कांग्रेस नेता थे हिमंता बिश्वा सरमा। असम में कांग्रेस की चुनावी रणनीति पर चर्चा के सिलसिले में उन्होंने राहुल गांधी से मिलने की कई बार कोशिश की। एक बार उन्हें सफलता मिल गई। जब वो राहुल से मिले तब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल का ध्यान हिमंता की बातों से ज्यादा अपने कुत्ते को खिलाने पर था। हिमंता ने पार्टी छोड़ दी और बीजेपी में शामिल हो गए। असम विधानसभा चुनाव में बीजेपी की बड़ी जीत में हिमंता ने अहम भूमिका निभाई।

राहुल गांधी महागठबंधन बनाने की कोशिश में दिन रात लगे हैं। पर यह उनकी कैसी कोशिश है कि केजरीवाल उनके फोन का इंतजार करते रहे पर राहुल ने बात करना लाजिमी नहीं समझा? राहुल टीआरएस, वाईएसआरसीपी, पीडीपी तक पहुंचने की खुद कोशिश कर सकते थे। शायद मुकाबले का परिणाम उन्हें कुछ और देखने को मिलता। अपनी गलतियों से सीख लेकर ही आप आगे बढ़ सकते हैं। लगता है राहुल अभी भी नेहरू-इंदिरा युग के सपनों में डूबे हैं। उन्हें लगता है जनता मोदी से नाराज होगी तो चुनाव में वो स्वाभाविक रूप से सीधे कांग्रेस की झोली वोटों से भर देगी। पर राहुल को शायद कोई ये समझा नहीं पा रहा है कि ये 50-60-70 का दशक नहीं है। देश नेहरू-गांधी कांग्रेस परिवार के कथित एक मात्र विकल्प से बहुत आगे निकल चुका है।

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