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अभी भी दुबई से फिल्मों में पैसा लगाया जा रहा है

फिल्म ‘हैरी पॉटर’ में जादूगर हमेशा ‘वोल्डेमोर्ट’ का नाम लेने से बचते हैं। उसका नाम ही आतंक पैदा करने के लिए पर्याप्त होता है। ऐसा ही एक नाम है जो फिल्म उद्योग में सिरहन और दहशत का पर्याय है। दाऊद इब्राहिम कई वर्ष से भारत से फरार होकर पाकिस्तान की शरण में है लेकिन फिल्म उद्योग आज भी पूरी तरह से उसकी मुट्ठी में है। मुंबई फिल्म उद्योग पर यदि दाऊद का नियंत्रण बना हुआ है तो उसके पीछे इसी देश के कुछ गद्दार लोग हैं, जो आज भी उसकी दहशत को कायम रखे हुए हैं। दाऊद का आतंक कुछ लोगों के लिए इस कदर मददगार हो गया कि उसके दम पर उन लोगों ने बड़े प्रोडक्शन हाउस और विज्ञापनों की दुनिया पर एकछत्र राज्य कायम कर लिया। 

सुना है दाऊद की भारत से नफरत और भी अधिक बढ़ गई है। इस देश को ख़त्म करने के सपने तो वह पहले से देखा करता था लेकिन सन 2014 के बाद आई नई सरकार ने जब उसका आर्थिक साम्राज्य तबाह कर दिया तो दाऊद ने फिल्म उद्योग पर अपना शिकंजा और मजबूत कर लिया। ये किसी से छुपा नहीं है कि सन 2005 में मुंबई पुलिस ने वह रिकार्डिंग बरामद कर ली थी, जिसमे छोटा शकील और सलमान खान के बीच लंबी बातचीत हुई थी।

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मीडिया में ये मामला बहुत उछला था और इसी वजह से पुलिस ने वे रिकार्डिंग टेप नष्ट कर दिए थे। ये इस बात का स्पष्ट प्रमाण था कि आपराधिक मनोवृत्ति का अभिनेता सलमान खान देशद्रोहियों से मिला हुआ है। इस बात को आश्चर्य मत समझिये कि सलमान खान के सुपर स्टार बनते ही फिल्म उद्योग में खेमेबाज़ी तेज़ हो गई थी। जो इस खेमे में जाता था, उसे काम मिलता था लेकिन जो इस दादागिरी को नहीं मानता था, वह सोनू निगम, अभिजीत और उदित नारायण हो जाता था। 

सलमान खान ने उस संस्कृति को भी बढ़ावा दिया, जिसे महेश भट्ट ने शुरू किया था। महेश भट्ट ने पाकिस्तानी कलाकारों को अपनी फिल्मों में काम देना शुरू किया था। उस परम्परा को सलमान खान इतनी आगे ले गया कि हमारे प्रतिभाशाली गायकों को घर बैठना पड़ा। उदित नारायण को तो मजबूरन भोजपुरी सिनेमा की ओर रुख करना पड़ा।

सलमान और उसका गैंग सिर्फ पाकिस्तानी गायकों को ही नहीं, पाकिस्तानी कलाकारों को भी यहाँ लाया और भारतीय कलाकारों की रोजी-रोटी छीन ली। वह तो उरी में हुए हमले के बाद जब पाकिस्तानी कलाकारों का बायकॉट किया गया, तब ये बीमारी इंडस्ट्री से दूर हुई लेकिन दाऊद इब्राहिम नामक वायरस अब भी इंडस्ट्री से चिपका हुआ है।

सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या को लेकर फिल्म इंडस्ट्री दो गुटों में बंट गई तो उसका जिम्मेदार सलमान खान और उसका सहयोगी गैंग है। करण जौहर के प्रोडक्शन हाउस का पक्षपातपूर्ण रवैया भी फिल्म उद्योग को बहुत नुकसान पहुंचा रहा है। उन्ही चुने हुए कलाकारों को फिल्मों और विज्ञापनों में काम मिलता है जो इन बड़े गुटों से जुड़े हुए हैं। छोटे कलाकारों को बड़े मौके मिलते ही नहीं।

बूढ़ा रहा सलमान भी पेप्सी का विज्ञापन करता है। सुशांत की मौत पर जब सलमान खान ने ट्वीट किया तो भड़के लोगों ने उसे आइना दिखा दिया। एक ट्वीट के जरिये कहा गया कि जो ये कहते हैं कि भाई-भतीजावाद इंडस्ट्री में नहीं होता, वे ख्यालों में जी रहे हैं। छिछोरे को अवार्ड नहीं मिलता लेकिन एक फ्लॉप फिल्म स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर को चार अवार्ड मिल जाते हैं।

दाऊद गैंग का आधिपत्य ओटीटी प्लेटफॉर्म पर हो गया है, ये बेहद चिंताजनक बात है। हिंदुत्व और राष्ट्र विरोधी फिल्मों को बनाने वाले इन प्रोडक्शन हॉउस की जाँच होनी चाहिए, जो इनको पैसा उपलब्ध करवा रहे हैं। अभी भारत सरकार बमुश्किल दुबई से आने वाले पैसों के कुछ ही स्त्रोत बंद करवा सकी है। अभी भी दुबई से फिल्मों में पैसा लगाया जा रहा है और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर लगने वाले पैसे में दाऊद की भूमिका होने की संभावना अत्यंत बलशाली है। हाल ही में हमने देखा कि अनुष्का शर्मा और एकता कपूर की फिल्मों के कारण कितना हंगामा मचा हुआ है।

जिस तरह से सुशांत की मौत के बाद उपजे विरोध पर बेशर्मी से सफाई दी जा रही है, वह ये बताने के लिए पर्याप्त है कि सलमान खान और उसका गैंग सक्रिय हो गए हैं। वे अपने गुट के लोगों से मीडिया में बयान दिलवा रहे हैं। इस मामले में सुशांत को मनोरोगी तक बताने के षड्यंत्र किये जा रहे हैं। कुछ लोग चाहते हैं कि वे हमेशा फिल्म इंडस्ट्री के सुपर स्टार बने रहे। लेकिन वे ये भूल जाते हैं कि यहाँ महानायक अमिताभ अपना सिंहासन नहीं बचा सके थे, फिर ये तो एक नॉन एक्टर स्टार है, जो इंडस्ट्री में अपने आखिरी दिन देख रहा है।

यही आखिरी दिन उसे भयभीत करते हैं कि उसकी सिंहासन की गद्दी अब जाने वाली है। वर्चस्व की इस लड़ाई में सुशांत जैसे स्वाभाविक अभिनेता पीस जाते हैं। सुशांत की मौत को कानूनन ह्त्या नहीं कहा जा सकता लेकिन है तो ये ह्त्या ही। गैंग ने सुशांत की जिजीविषा, उसके संघर्ष, उसकी मौलिकता की ह्त्या कर डाली। बाद में जो लटका, वह तो बेजान सुशांत था।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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1 Comment

  1. Dattatray Kulkarni says:

    सही बात है।संदीपनी हम आपके साथ हैं।

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