फिल्म समीक्षा : बॉक्स ऑफिस पर ‘ठाकरे’ की दहाड़ नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती



Vipul Rege
Vipul Rege

फ्री प्रेस के कार्टूनिस्ट केशव बाल ठाकरे को उसका संपादक कार्टून की धार कम करने के लिए कहता है। संपादक को लगता है कि केशव के धारदार कार्टून के अख़बार का नुकसान करवा रहे हैं। जवाब में केशव संपादक की टेबल पर एक और कार्टून रख देता है और कहता है ‘मेरे कार्टून आपको ख़ारिज करते हैं। ये रहा मेरा इस्तीफा।’ अगले दृश्य में केशव खराब मूड ठीक करने के लिए थिएटर में जा बैठा है। परदे पर कार्टून चल रहा है लेकिन ठाकरे को उन छवियों में आहत मराठी स्वाभिमान दिखाई देता है। अभिजीत पानसे की फिल्म ‘ठाकरे’ एक आक्रोशित कार्टूनिस्ट से लेकर एक विराट राजनेता बनने तक की यात्रा है।

फिल्म की शुरुआत में निर्देशक कोई प्रस्तावना नहीं रखते। कोई वाइस ओवर नहीं देते बल्कि सीधे ही कथा में प्रवेश कर जाते हैं। शुरुआत बाबरी विध्वंस प्रकरण से होती है। बाल ठाकरे इस मामले में कोर्ट में गवाही देने पहुंचे हैं। वकील उनसे कहता है कि अपना पूरा नाम बताए। इसी संवाद के साथ कहानी रिवर्स लेकर वहां पहुँचती है, जहाँ से उन्होंने अपनी पत्रकारीय पारी की शुरुआत की थी। फिल्म सिलसिलेवार ढंग से उनके जीवन प्रसंगों को सामने रखती है। उन परिस्थितियों को सामने रखती है, जिनके कारण बाल ठाकरे ने राजनीति में प्रवेश किया था। उनके जीवन प्रसंगों को बाकायदा सन और तारीख के साथ पेश कर फिल्म को एक दस्तावेज बनाने का प्रयास किया गया है। मराठी समाज के लिए किये गए उनके कार्यों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

अदालत में वकील के प्रश्न पूछने के साथ ही फिल्म फ्लैशबेक में जाती है। निर्देशक ने रचनात्मक प्रयोग करते हुए बाल ठाकरे के युवावस्था के जीवन प्रसंगों को ब्लैक एंड  व्हाइट में फिल्माया है। काला-सफ़ेद रंग अतीत का प्रतीक है। इन दो रंगों में दर्शक की निगाह केवल और केवल किरदार और उसकी भाव-भंगिमाओं तक सीमित हो जाती है। परदे पर पहली बार रंग उभरते हैं, जब बाल ठाकरे का साम्राज्य आकार लेने लगता है। इंटरवल से ठीक पहले ठाकरे बगिया में पानी देते नज़र आते हैं। कैमरा एक गेंदे के फूल पर केंद्रित होता है। देखते ही देखते फूल रंगीन हो जाता है। शिव सेना की प्रगति को निर्देशक ने फूल के खिलने से सांकेतिक रूप से जोड़ा है।

नवाजुद्दीन सिद्दीकी के अलावा कोई और अभिनेता ये किरदार नहीं कर सकता था। ठाकरे के व्यक्तित्व को जिस ढंग से उन्होंने आत्मसात किया है, प्रशंसनीय है। बाल ठाकरे का लुक लाने के लिए उन्हें एक नकली नाक लगाई गई है। नकली नाक लगने के बाद वे बाल ठाकरे जैसे प्रतीत होते हैं। संवाद अदायगी में उन्होंने कमाल किया है। उच्चारण में मराठी लहजा दिखा देता है कि नवाज़ किरदार में कितना डूबे हुए हैं। नवाज का अभिनय असीमित क्षमताएं लिए हुए हैं।  दर्शकों ने उनकी नायाब अदाकारी को हाथोहाथ लिया है। मेरे विचार में  नए साल का ये सबसे उत्कृष्ट अभिनय माना जाएगा।

अमृता राव ने मीना ताई ठाकरे का किरदार प्रभावी ढंग से निभाया है। बाल ठाकरे के पिता प्रबोधनकर का किरदार करने वाले अभिनेता ने बेजोड़ अभिनय किया है। मराठी पृष्ठभूमि से आने वाले इस शानदार अभिनेता का नाम हमें मालूम नहीं हो सका। जॉर्ज फर्नांडिस का किरदार करने वाले प्रकाश बेलावड़ी भी बेहतर रहे हैं। मोरार जी देसाई का किरदार कुछ नकारात्मक शेड्स लिए हुए हैं। हम नहीं जानते निर्देशक ने ऐसा क्यों किया है। मोरार जी का किरदार करने वाले राजेश खेरा का चुनाव सही नहीं रहा। वे कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते।

अभिजीत पानसे की ‘ठाकरे’ एक ऑटोबायोग्राफी के रूप में बेजोड़ है। फिल्म दर्शक को बखूबी बताती है कि शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे का व्यक्तित्व कैसा था, उनकी जीवन यात्रा किन रास्तों से होकर गुज़री थी। मुझे इस फिल्म की सबसे अच्छी बात ये लगी कि बिना लाग-लपेट बाल ठाकरे की स्वछन्द छवि प्रस्तुत की गई है। यदि आप बाल ठाकरे को करीब से जानना चाहते हैं। यदि आप एक रियलस्टिक फिल्म देखना चाहते हैं तो ये फिल्म आपके लिए ही बनी है। फिल्म दो भागों में प्रस्तुत की जाएगी। निर्माता संजय राऊत ने व्यवसायिक सूझबूझ दिखाते हुए फिल्म का बजट केवल तीस करोड़ रखा है इसलिए बॉक्स ऑफिस पर इसे कोई खतरा नहीं है।

URL: Nawazuddin Siddiqui’s Thackeray, based on the life of Bal Keshav Thackeray has been released.

Keywords: Thackeray, movie, Nawazuddin Siddiqui, Bal Thackeray, Shiv sena


More Posts from The Author





राष्ट्रवादी पत्रकारिता को सपोर्ट करें !

जिस तेजी से वामपंथी पत्रकारों ने विदेशी व संदिग्ध फंडिंग के जरिए अंग्रेजी-हिंदी में वेब का जाल खड़ा किया है, और बेहद तेजी से झूठ फैलाते जा रहे हैं, उससे मुकाबला करना इतने छोटे-से संसाधन में मुश्किल हो रहा है । देश तोड़ने की साजिशों को बेनकाब और ध्वस्त करने के लिए अपना योगदान दें ! धन्यवाद !
*मात्र Rs. 500/- या अधिक डोनेशन से सपोर्ट करें ! आपके सहयोग के बिना हम इस लड़ाई को जीत नहीं सकते !

About the Author

Vipul Rege
Vipul Rege
पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।