यासीन मलिक के विरुद्ध 2007 से मेरी ‘कलम वाली लड़ाई’ आखिर आज परिणति तक पहुंच ही गई!

संदीप देव। आज मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है की आतंकवादी यासीन मलिक पर देशद्रोह का आरोप तय हो गया है। मुझे याद है तब मैं दैनिक जागरण में एक संवाददाता हुआ करता था। उस समय केंद्र में सोनिया गांधी की मनमोहन सरकार थी।

मनमोहन सरकार यासीन मलिक को ‘दमाद’ की तरह पाल रही थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से वह बड़ी आसानी से मिलता था। सारे पॉलीटिकल लीडर और लुटियंस मीडिया की आंखों का वह तारा था। वह भी शायद इसलिए कि उसने कश्मीर घाटी में हिंदुओं के नरसंहार को अंजाम दिया था। वहां से बंदूक के बल पर कश्मीरी पंडितों का पलायन करवाया था।

इतना बड़ा आतंकवादी बड़ी आसानी से तब प्रधानमंत्री आवास में आता-जाता था, दिल्ली के लुटियंस सर्कल में कार्यक्रम करता था और बड़े-बड़े नेता और एक्टिविस्ट उसके साथ शान से तस्वीरें खिंचवाते थे। लुटियंस सर्कल ने तो उसे ‘दूसरा गांधी’ तक कहना आरंभ कर दिया था।

सन् 2007 में एक संवाददाता के रूप में मैंने दैनिक जागरण में मनमोहन सरकार और यासीन मलिक के बीच की सांठगांठ को लखातार श्रंखलाबद्ध तरीके से खबर लिखकर उजागर किया था। मनमोहन सरकार ने यासीन मलिक के अपराध की फाइल को गायब कर दिया था। उस पर दर्ज सारे आपराधिक मामले ढंक दिए गए थे। केंद्र का कहना था कि यासीन पर दर्ज किसी आपराधिक मामले की कोई जानकारी हमारे पास नहीं है।

परंतु कश्मीर की घाटी में दर्ज कश्मीरी पंडितों के खून से सनी इबारद दर्ज थी। मैंने उस समय एक जोखिम उठाया और ना सिर्फ यासिन मालिक का मनमोहन सरकार के साथ सांठगांठ, बल्कि उस पर दर्ज 23 आपराधिक मामले को भी सामने ला दिया। यासीन इससे विचलित हो गया और उसने मुझे धमकाने के लिए दैनिक जागरण के कार्यालय में अपने आतंकी तक भेज दिए थे। यासीन के साथ कश्मीरी पंडितों का नरसंहार करने वाले एक और आतंकवादी बिट्टा कराटे की फाइल भी मनमोहन सरकार ने गायब कर दिया था। उसे भी मैंने उजागर किया।

मोदी सरकार के आने के बाद 2016-17 में यासीन की फाइल पुनः खुली। उसके हवाला नेटवर्क पर कार्रवाई हुई और 2019 में उसके आतंकी संगठन JKLF को बैन कर दिया गया। अब दिल्ली की एक अदालत ने यसीन पर देशद्रोह के तहत मामला चलाने की अनुमति दे दी है।

एक पत्रकार के नाते हर पत्रकार यह चाहता है कि जो रिपोर्ट वह लिख रहा है कभी ना कभी वह अंतिम अंजाम तक पहुंचे। 2007 में मैंने श्रृंखलाबद्ध रिपोर्ट लिखकर यासीन मलिक के खिलाफ कलम के जरिए जो लड़ाई छेड़ी थी, 2022 के मार्च महीने में जाकर वह परिणति तक पहुंची।

NIA कोर्ट ने लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के संस्थापक हाफिज सईद और हिजबुल मुजाहिदीन प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन, यासीन मलिक, शब्बीर शाह, मसरत आलम सहित कश्मीरी अलगाववादी नेताओं के खिलाफ UAPA की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप तय करने का आदेश दिया है।

आतंकी फंडिंग के लिए पैसा पाकिस्तान और उसकी एजेंसियों की ओर से भेजा गया था और यहां तक कि राजनयिक मिशन का इस्तेमाल ग़लत मंसूबों को पूरा करने के लिए किया गया था। NIA कोर्ट ने नोट किया,घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी हाफिज सईद द्वारा आतंकी फंडिंग के लिए पैसा भी भेजा गया था।

OP India की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2017 के एक आतंकवादी एवं अलगाववादी गतिविधियों के मामले में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) का मुखिया मोहम्मद यासीन मलिक (Mohammad Yasin Malik) के खिलाफ दिल्ली की एक अदालत ने बड़ी कार्रवाई की है। कोर्ट ने यासीन मलिक समेत 15 लोगों के खिलाफ गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (UAPA) के तहत आरोप तय किए हैं।

मामले की सुनवाई कर रहे विशेष अदालत के न्यायाधीश जस्टिस परवीन सिंह ने इसे ‘सुनियोजित साजिश’ करार दिया। जस्टिस सिंह के अनुसार, इस साजिश का मास्टरमाइंड सीमा पार पाकिस्तान में बैठे आईएसआई जैसों के हाथ में था। हर साजिशकर्ता मास्टरमाइंड के निर्देश पर काम कर रहा था और इनका अंतिम लक्ष्य कश्मीर में रक्तपात, हिंसा, तबाही और विनाश मचाकर उसे अलग करना था।

कोर्ट का कहना था कि शुरुआती तौर पर एक बड़ी आपराधिक साजिश के तहत बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जिसके कारण हिंसा की घटनाएँ हुईं। अदालत ने ये भी कहा कि भारत से कश्मीर को अलग करने के मूल लक्ष्य को हासिल करने के लिए हिंसा की साजिश को रचा गया था। इसके साथ ही अदालत ने पाया कि ये घाटी में आतंकवाद को बढ़ावा देने में अहमद भूमिका निभाई। इसको देखते हुए कोर्ट ने यासीन मलिक सहित इसमें शामिल लोगों पर यूएपीए के तहत आरोप तय किए।

कोर्ट ने कहा, “तर्क दिया गया है कि गाँदीवादी तरीके से शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। जबकि, प्रथम दृष्टया सबूत कुछ और ही कहते हैं। विरोध न केवल हिंसक थे, उनका इरादा हिंसक होना था। इस प्रकार प्रथम दृष्टया इनकी योजना एडोल्फ हिटलर और नाजी पार्टी की असली सेना ब्राउनशर्ट्स के मार्च की तरह सीधी और स्पष्ट थी। इनका उद्देश्य सरकार को डराना और किसी विद्रोह की योजना से कम नहीं था।”

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने अपने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए आतंकी संगठनों के साथ साजिश रची थी। इसमें हाफिज मुहम्मद सईद, मोहम्मद यूसुफ शाह, आफताब अहमद शाह, अल्ताफ अहमद शाह, नईम खान, फारूक अहमद डार, राजा मेहराजुद्दीन कलवाल, बशीर अहमद भट, जहूर अहमद शाह वटाली, शब्बीर अहमद शाह, मसरत आलम, अब्दुल राशिद शेख और नवल किशोर कपूर शामिल हैं।

यासीन मलिक

OP India की रिपोर्ट के अनुसार, आतंकी यासीन मलिक कश्मीर में कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार में सीधे तौर पर शामिल था। वो जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का अध्यक्ष और पाकिस्तान का पिट्ठू अलगाववादी नेता है। उस पर कश्मीर में आतंकवाद को समर्थन देने का आरोप है। साथ ही उसे भारत में टेरर फंडिंग समेत दूसरे अपराधों के मामले में हिरासत में भी लिया गया था। यासीन मलिक पर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण का भी आरोप है।

जनवरी 1990 में वायुसेना के 4 अधिकारियों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी, जिसका आरोप यासीन मलिक पर ही है। यासीन मलिक ने जेकेएलएफ आतंकियों के साथ मिलकर भारतीय वायु सेना के चार जवानों में से एक स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना की हत्या कर दी थी।

ये जानते हुए भी कि घाटी में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार में यासीन मलिक सीधे तौर पर शामिल था और उसके आतंकियों से संबंध हैं, पिछली सरकारों एवं मीडिया ने उसे हमेशा कश्मीरियों के तारणहार के रूप में पेश किया।

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Sandeep Deo

Journalist with 18 yrs experience | Best selling author | Bloomsbury’s (Publisher of Harry Potter series) first Hindi writer | Written 8 books | Storyteller | Social Media Coach | Spiritual Counselor.

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