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NCERT की 12वीं कक्षा की किताब, देश के भविष्‍य में सांप्रदायिकता का ‘जहर’ !

रवीन्द्र पनमार। देश के बच्चों के दिमाग में किताब के जरिये ‘धर्म’ के नाम पर धीमा जहर घोला जा रहा है। ये सब कुछ पिछले 10 वर्षों से हो रहा है लेकिन इस ओर सरकारें और सिस्टम का रवैया उदासीन बना हुआ है और दंगों को लेकर स्‍कूली बच्‍चों को ‘मजहब का पाठ’ पढ़ाया जा रहा है। दरअसल, एनसीईआरटी की 12वीं कक्षा की एक किताब पर सवाल उठ रहे हैं। पॉलिटिकल साइंस की इस किताब में कुछ विषय सामग्री ऐसे हैं, जिन पर विवाद उठना लाजिमी है। इस किताब में गुजरात दंगों को मुस्लिम विरोधी दंगा बताया गया है। वहीं, साल 1984 में हुए दंगे को सिख विरोधी दंगा बताया गया है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि किताबों के जरिये बच्‍चों को दंगों की ‘धार्मिक एबीसीडी’ पढ़ाना कितना जायज है। सवाल ये भी उठ रहे हैं कि धर्म के नाम पर अधर्म फैलाने वाले शब्‍दों और वाक्‍यों को किताब में क्‍यों शामिल किया गया है।

ज़ी न्‍यूज की ओर से उठाए गए इस मसले का असर अब देखने को मिल रहा है। बीजेपी ने इस किताब के लिए जांच कमेटी बनाने की मांग की है। वहीं, कांग्रेस नेताओं ने भी किताब की भाषा को गलत बताया है। भारत के राजनीतिक इतिहास के नाम पर बच्चों के दिल और दिमाग में ‘दंगों’ वाला जहर घोला जाना किसी मायने में उचित नहीं है। एनसीईआरटी की 12वीं कक्षा की पॉलिटिकल साइंस की किताब जिसका शीर्षक है ‘Politics In India Since Independence….’। इस क़िताब में वैसे तो आजादी के बाद, भारत की राजनीतिक तस्वीर दिखाने की कोशिश की गई है। लेकिन इसके कुछ पन्ने ऐसे हैं, जिनमें धर्म के नाम पर अधर्म फैलाने वाले शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। भारत ने आज़ादी के बाद से लेकर अबतक वैसे तो कई दंगों का दर्द महसूस किया है। लेकिन एनसीईआरटी की इस क़िताब में, कुछ चुनिंदा घटनाओं का जिक्र धार्मिक आधार पर किया गया है और यही बात इसे लिखने वाले बुद्धीजिवियों की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

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इस क़िताब के पृष्‍ठ संख्‍या 160 पर कुछ तस्वीरों की मदद से ये दिखाने की कोशिश की गई है, कि कैसे ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई। इतिहास के लिहाज से ये जानकारी बच्चों को देनी जरूरी भी है। लेकिन इसी पन्ने की आखिरी पंक्ति में एक संदेह पैदा होता है। जिसमें लिखा है, Anti-Sikh Violence यानी 1984 में हुए दंगों को इस किताब में Anti-Sikh Violence कहा गया है। इसी क़िताब के पेज नंबर 187 पर बड़े-बड़े अक्षरों में ये लिखा हुआ दिखाई देता है कि Gujarat Is Burning…। इस तस्वीर के ठीक बांई तरफ लिखा गया है, Anti-Muslim Riots In Gujarat…। क़िताब के अगले पन्ने में तस्वीरों की मदद से Anti-Muslim Riots In Gujarat को दिखाने की कोशिश की गई है। यह एक विरोधाभास है कि इस क़िताब को लिखने वालों ने 1984 के दंगों को Anti-Sikh Violence का नाम दे दिया और वर्ष 2002 के गुजरात दंगों को Anti-Muslim Riots का नाम दे दिया। यानी एक दंगे के लिए Violence शब्द का इस्‍तेमाल हुआ है और दूसरे के लिए Riot शब्द का इस्तेमाल किया गया। दुखद यह है कि दंगों पर धर्म का लेबल लगा दिया गया।

12वीं कक्षा में पॉलिटिकल साइंस पढ़ने वाले छात्रों को अपने देश के राजनीतिक इतिहास की जानकारी होनी चाहिए, इसमें कोई दो-राय नहीं है। लेकिन हमारा सवाल ये है, कि देश में आज़ादी के बाद से बहुत सारे छोटे-बड़े दंगे हुए हैं, जिनके बारे में जानना हर छात्र के लिए ज़रूरी है। फिर ऐसा क्यों हुआ, कि इस क़िताब में सिर्फ दो दंगों का ज़िक्र किया गया। इन दोनों ही दंगों को धार्मिक आधार पर लेबल किया गया और फिर उसमें से एक दंगे को Violence कहा गया जबकि दूसरे दंगे को Riot कहा गया।

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वर्ष 2004 में UPA सरकार के आने पर शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव के लिए Central Advisory Board of Education का पुनर्गठन कर दिया गया। इसके बाद कई Sub-Committees का गठन किया गया, जिसका मकसद Schools में पढ़ाई जाने वाली क़िताबों को Regulate करना था। इसी के बाद 12वीं कक्षा की पॉलिटिकल साइंस की इस किताब में बाबरी मस्ज़िद, अयोध्या के विवादित ढांचे, गुजरात में मुस्लिम विरोधी दंगे और सिख विरोधी दंगे जैसे विषयों को शामिल किया गया। क़िताब के पेज नंबर 184 में अयोध्या के विवादित ढांचे और पेज नंबर 185 में बाबरी मस्ज़िद गिराए जाने की घटना को भी प्रमुखता दी गई है।

साभार: रवीन्द्र पनमार के फेसबुक वाल से

नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। IndiaSpeaksDaily इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति उत्तरदायी नहीं है।

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