‘एलिट पत्रकारिता’ के नशे में ‘उल्टी’ कर अपने ही मुंह पर मलते NDTV के पत्रकार!

आजकल एनडीटीवी के कई पत्रकार और उनके समर्थक कुंठा में जी रहे हैं। ‘एलिट पत्रकारिता’ की आड़ में एनडीटवी के अंदर चल रहे काले साम्राज्य की परत-दर-परत उघड़ चुकी है। ‘नग्नता-बोध’ से ग्रस्त एनडीटीवी के मालिक और पत्रकार ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोंचे’ के तर्ज पर अपने ‘ब्लैक स्क्रीन’ को ढंकने के लिए ‘पत्रकारिता पर हमला- पत्रकारिता पर हमला’ के शोर में सारा वक्त रिसते मवाद को छिपाने में ही लगाते हैं! एनडीटीवी की ‘काली पत्रकारिता’ को ढंकने के लिए ‘फेक न्यूज’ से लेकर ‘फेक नरेशन’ तक का निर्माण किया जा रहा है, लेकिन सोशल मीडिया है कि इनकी नग्नता को और उघाड़ कर इनके ‘बेढब कुरूप शरीर’ को जनता के सामने ला देता है!

कालाधन और हवाला करोबार के आरोपों से घिरे एनडीटीवी ने विक्टिम कार्ड खेलकर यह जताने की कोशिश की कि मोदी सरकार उसकी पत्रकारिता को खत्म करना चाहती है, जबकि सच्चाई यह है कि यह मीडिया के आड़ में मनी लॉउंडरिंग, बैंको के एनपीए आदि में फंसी कंपनी है। एनडीटीवी ने एक गलत नरेशन चलाया कि उसे मोदी सरकार से विज्ञापन नहीं मिलता है। इस झूठ को बकायता एनडीटीवी की एक महिला एंकर ने ट्वीट कर फैलाया। जबकि सच्चाई यह है कि एक साल में करीब-करीब 20 करोड़ के आसपास का विज्ञापन मोदी सरकार से एनडीटीवी को मिला है। सरकार से जितना विज्ञापन अन्य मीडिया हाउस को मिलता है, उतना ही एनडीटीवी को भी मिला है। अब मनमोहन सिंह सरकार के समय गांधी परिवार की मेहरबानी से एनडीटीवी को फायदा पहुंचाने के लिए 200 करोड़ का स्पेशल टाइगर प्रोजेक्ट, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में दलाली के बाद 450 करोड़ का तत्काल बैंक लोन जैसे अवैध धंधे तो नहीं हो सकते न? यही इस चैनल और उसके पैसे पर पलने वाले ‘पिस्सुओं’ का दर्द है!

दूसरा गलत नरेशन यह चलाया गया कि मोदी सरकार ने एनडीटीवी की पत्रकारिता को समाप्त करने के लिए उसे केबल पर बैन करवा दिया है। इस फेक न्यूज को गंदे दिमाग वाली एक ‘काली कम्युनिस्ट बिल्ली’ ने ट्वीटर से फैलाया। जबकि सच्चाई यह है कि एनडीटीवी के तीन चैनल पहले से पेड थे, अब उसने हिंदी न्यूज चैनल NDtv India को भी पेड कर लिया है। अपने चैनल को पेड या फ्री करने का निर्णय कोई चैनल प्रबंधक लेता है न कि सरकार। लेकिन ताज्जुब है कि झूठ की खेती करने वाला यह चैनल और उसका बेशर्म गिरोह बेहयाई से झूठ फैलाते चले जाते हैं। जिस किसी को भी एनडीटीवी देखना है वह अपने सर्विस प्रोवाइडर से कह कर इसे जुड़वा सकता है, जिसके एवज में उसे पैसे देने होंगे, सिंपल है।

चूंकि एनडीटीवी के ऐसे फेक न्यूज सोशल मीडिया पर टिक नहीं पाते हैं, इसलिए इसके मालिक प्रणय राय खुद सोशल मीडिया पर बैन लगाने के लिए देश के गृह मंत्री से लेकर वित्त मंत्री तक से गुहार लगा चुके हैं! यह है फ्री थिंकिंग का ढिंढोरा पीटने वाले इस चैनल और उसके मालिकान का दोगलापन। अपने इस दोगलेपन को ढंकने के लिए प्रणय राय ने अपने एक ‘पीडी’ ‘बकैत पांड़े’ को आगे बढ़ा रखा है ताकि वह हिंदी दर्शकों के बीच जमकर झूठ फैला सके। ऐसे भी बकैत पांडे का भाई कांग्रेसी नेता है और इस बार बिहार कांग्रेस ने उसे अपनी कार्यकारिणी में भी शामिल किया है। बकैते को उसकी बकैती का ईनामा मिला है।

बकैत के भाई को और सूचना यह भी है कि खुद बकैत को भी 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार से टिकट मिलने वाला है, इसलिए ‘बकैत पांड़े’ एनडीटीवी पर कांग्रेस के प्रचार के लिए मोदी सरकार के खिलाफ खूब फेक न्यूज फैलाता है। बकैत का भाई बलात्कार का आरोपी और बहन भ्रष्टाचार का आरोपी रही है। सोच कर देख लीजिए कि भ्रष्टाचारी-बलात्कारी परिवार से आने वाला यह वामपंथी मक्कार कितनी निष्पक्ष पत्रकारिता करता होगा? इसके भाई की गिरफ्तारी को टालने के लिए कांग्रेस के वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में झूठ तक बोला, जिसका खुलासा इंडिया स्पीक्स पहले कर चुकी है।

NDTV का एक ऐसा ही पत्रकार और है, जिसने पूरी उम्र कभी खुद से रिपोर्टिंग नहीं की है। एक समय वह दिल्ली के एक हिंदी अखबार में क्राइम रिपोर्टर था। उस समय वह क्राइम की सारी रिपोर्ट दूसरे अखबार के क्राइम रिपोर्टरों से पूछ कर किया करता था। उसके पास अपनी एक रिपोर्ट तक नहीं होती थी। मैं उस समय दैनिक जागरण में था। रोज शाम को वह मुझसे खबर पूछा करता था, ‘भइवा बता दो…दोस्त बता दो, प्रेस क्लब जाना है।’

वह इस कदर गिड़गिड़ाता था कि कई बार अपनी खबर लिखने से पहले उसे बता दिया करता था, चलो जल्दी से पिंड छूटे। देर होने पर कई बार वह प्रेस क्लब निकल जाता था और मैं पूरी खबर बनाकर उसे मेल कर देता था। अगले दिन बिना कौमा, पूर्ण विराम बदले वह खबर यथावत उसके अखबार में छपी मिलती थी। वह इतना भी मेहनत नहीं करता था कि खबर का इंट्रो ही बदल ले! मैंने कई बार कहा भी, ‘तुम मेरी नौकरी खाओगे?’ वह बड़ी बेशर्मी से हंस देता था!

दूसरे रिपोर्टरों से पूछ कर खबर लिखने के उपरांत शाम साढे सात बजे वह रोज प्रेस क्लब पहुंच जाता था और वहां एनडीटीवी के ‘बाबाओं’ और ‘बकैतों’ को जमकर शराब पिलाता, उनकी मिन्नतें करता, उसका ‘सहलाता’ रहता था, जिस कारण उसे एनडीटीवी में नौकरी मिल गयी। NDTV में भी अखबार के क्राइम रिपोर्टरों के बल पर उसकी ‘दुकान’ चला करती थी।

बाद में उसे एनडीटीवी में अदालत की बीट दी गई। पहली बार जब वह निचली अदालत पहुंचा तो रो रहा था कि “मैं अदालत की रिपोर्टिंग कैसे कर पाउंगा? मैंने तो पूरी जिंदगी क्राइम रिपोर्टिंग की है, वह भी पूछ-पूछ कर?” अदालत कवर करने वाले वरिष्ठ रिपोर्टरों ने उसे सांत्वना दिया और उसे अदालत की रिपोर्टिंग करना सिखाया। निचली अदालत में तो काम चल गया, लेकिन जब महोदय को सर्वोच्च अदालत की रिपोर्टिंग करनी पड़ी तो फिर रोना-गाना शुरु हो गया- ‘भइवा सुप्रीम कोर्ट कैसे कवर कर पाउंगा? कहीं किसी खबर में मानहानि न हो जाए?’ चिप्पी जोड़ने वाला भी जोड़ते-जोड़ते एक दिन साईकिल मैकेनिक बन ही जाता है। ऐसे पत्रकार भी दोस्तों की मेहरबानी से आखिर पत्रकारिता सीख ही जाते हैं?

आज वह प्रेस क्लब में शराब पीकर उन्हीं रिपोर्टरों के खिलाफ ‘उल्टी’ करता रहता है, जिनसे उसने पत्रकारिता सीखी, जिनकी रिपोर्ट कॉपी कर वह पत्रकार बना! वह अपने पुराने साथियों को भूल चुका है। उसकी परेशानी यह है कि उसके पुरानी साथी पत्रकार एनडीटीवी की पोल क्यों खोल रहे हैं? कहता है- ‘वे लोग एनडीटीवी के खिलाफ एजेंडा चला रहे हैं?’ भाई तुम्हारे चैनल का 2G एजेंडा तो पूरे देश ने सुना और देखा है! इसलिए तुम एजेंडा की बात न ही करो तो बेहतर होगा!

सच तो यह है कि भाई तुम्हारी नौकरी बचाने के लिए हम पत्रकारों ने तुम्हें अपनी रिपोर्ट देने से लेकर तुम्हें अदालती पत्रकारिता तक सिखाई है। अब चाहते हो कि तुम्हारी नौकरी बचाने के लिए हम एनडीटीवी के काले साम्राज्य पर भी चुप्पी लगा लें तो यह नहीं होगा? जब तक तुम दोस्त थे, तुम्हारी हम सब ने मदद की। अब तुम प्रणय राय के ‘चाटू’ हो तो कोई तुम्हारी मदद क्यों करेगा? एनडीटीवी में तुम्हारी हैसियत पत्रकार की नहीं, ‘चप्पल चाट’ की है! इस सच को स्वीकार कर लो तो रोज रात प्रेस क्लब में बैठकर जो ‘उल्टी’ करते हो, वह रुक जाएगी! अपनी ‘उल्टी’ अपने ही चेहरे पर मल रहे हो! हमारा इससे कुछ नहीं बिगड़ने वाला है। हम नौकरी करते थे तब भी स्वतंत्र थे, और आज तो हम पूरी तरह स्वतंत्र हैं!

इंडिया स्पीक्स डेली के पाठकों से कहना चाहूंगा कि आप सब सावधान रहें। एनडीटीवी से इतने सारे पत्रकारों व कैमरामैन की नौकरी गई, लेकिन चैनल में बैठकर पत्रकारिता के नाम पर बकैती करने वाले प्रणय राय के ‘चरण चाटुओं’ ने एक की भी नौकरी को बचाने का प्रयास नहीं किया, न ही ‘अभिव्यक्ति की बकैती’ करते हुए उनके पक्ष में एक लाइन तक सोशल साइट्स पर लिखा। इसलिए इन चाटुओं को जितना नंगा करना हो करें, ताकि पत्रकारिता के नये बच्चे इनके धोखे में न आएं! ये चाटुकार हैं, पत्रकार नहीं।

URL: NDTV surrounded by allegations of black money and hawala, defamed Modi government by playing Victim card

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Sandeep Deo

Sandeep Deo

Journalist with 18 yrs experience | Best selling author | Bloomsbury’s (Publisher of Harry Potter series) first Hindi writer | Written 8 books | Storyteller | Social Media Coach | Spiritual Counselor.

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