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पत्रकारिता के अपने आकाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आवाज को कुंद करने के लिए भी मोदी विरोध के पागलन का सहारा क्यों ले रहे हैं रविश पांडे

यौन उत्पीड़न के खिलाफ भारत में चल रहा ‘मी टू’ मूवमेंट ने चौकाने वाले खुलासे किये हैं। ‘मी टू’ आंदोलन की आंच एनडीटीवी के अंदर पहुँच गयी है! चैनल में काम कर चुकी महिला पत्रकार ने लगातार यौन शोषण होने की बात कही है। उसने चैनल के मालिक प्रणय राय और स्वघोषित महिला पत्रकारिता की आन बान शान बरखा दत्त को इसके बारे में संज्ञान होते हुए भी कार्यवाही न करने का आरोप लगाया है! महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले एनडीटीवी और प्रणय राय ने उनके खिलाफ उठी आवाज को कुंद करने के लिए अपने पिस्सू को मैदान में छोड़ दिया है। पत्रकारिता के पाप पर पर्दा ढक कर उसे राजनीतिक रंग देने के लिए।

‘मी टू’ मतलब मेरे साथ भी! सोशल मीडिया में ट्वीटर और फेसबुक पर ये आंदोलन महिला पत्रकारों ने चलाया है। खुद के यौन उत्पीड़न अत्याचार के खिलाफ आंदोलन। ये आंदोलन उस विरादरी का है जो समाज में शोषितों, पीड़ितों की आवाज रहा है। इस आवाज को बुलंद किए जाने की जरुरत है ताकि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ स्वाभिमान के साथ खड़ा रह सके। जो खुद शोषित और पीड़ित होगा वो दूसरों की आवाज क्या खाख बनेगा। लेकिन अपने आकाओं को बचाने के लिए पत्रकारिता के फ्रिंज एलिमेंट इसे राजनीतिक रंग देकर अपने धंधे में लग गए हैं।

भारत में टेलीविजन मीडिया जब 24 घंटे का हुआ, तो स्टार न्यूज पर आधे घंटे का शो चलाने वाले प्रणय राय भी एऩडीटीवी के रुप में 24 घंटे का चैनल लेकर मैदान में उतर गए। भारत में पहली बार टीवी एंकरों को ग्लैमर के रंग में रंगने की परंपरा एनडीटीवी ने शुरु की। बॉलीबुड के हीरो-हिरोइन की तरह एनडीटीवी के एक संपादक के दाएं बाएं दो बिल्कुल नई नवेली महिला पत्रकार की तस्वीर राजधानी दिल्ली की सड़क किनारे बड़े बड़े बैनर के रुप में टांगे गए। टीवी में यहीं से संपादकों ने चुनौती देनी शुरु कर दी कि पत्रकारिता में योग्यता और अनुभव के कोई मायने नहीं हैं। वो किसी भी रंभा को कभी भी पत्रकारिता के शिखर पर पहुंचा सकते हैं।

एनडीटीवी के उस संपादक को बदले में जो मिला उसकी चाहत ने शायद टीवी के हर संपादकों को यह खेल खेलने को प्रेरित कर दिया। यह परंम्परा लगातार जारी है। दुसरों की कुंठा को आवाज देने वाले टीवी मीडिया में काम करने वाले स्त्री पुरुषों ने इस कुंठा को सालों तक जिया है। आज जब सोशल मीडिया आया तो उन पत्रकारों को भी खुद पर हुए अत्याचार को आवाज देने का मंच मिल गया। फस्ट पोस्ट ने एक अनाम महिला पत्रकार के हवाले से आम पाठक को बताया कि अखबार में यह खेल पत्रकारिता को राजनीति का टूल बनाने वाले एमजे अकबर सालों से खेल रहे थे। वैसे पत्रकारिता जगत के लोगों के लिए इसमें कुछ भी खबर नहीं था। यह सालों से गॉसिप का हिस्सा था। लेकिन पत्रकारिता के पाप को राजनीतिक रंग देने के लिए अकबरनामा लिखकर अपने आकाओं को बचाने का खेल खेलने के लिए पत्रकारिता के पिस्सू मैदान में उतर गए हैं।

प्रत्रकारिता के पापियों ने अपने आकांओं को बचाने के लिए ‘मी टू’ आंदोलन की धार कुंद कर इसे राजनीतिक रंग देने की साजिश शुरु कर दी। प्रणय राय ने इस खेल के लिए फिर अपने पिस्सू रविश कुमार पांडे को मैदान में छोड़ दिया। खुद के बलात्कारी भाई को अपने गृह जिले से कांग्रेस का टिकट दिलाने के लिए जिस पत्रकार ने कांग्रेसी प्रवक्ता एम जे अकबर के जूतों पर सालों तक सिर घिसे वो पत्रकारिता की दलाली का सालो से इनाम पाते पाते जब मोदी सरकार में मंत्री बन गए तो पांडे जी और बुरे लगने लगे। क्योंकि सालों से उनके मालिक इसी चाहत में थे लेकिन चाहत पूरी न हो सकी। आखिर महत्वाकांक्षी पत्रकारों का यही तो लक्ष्य होता है जहां तक अकबर और राजीव शुक्ला पहुंच गए।

खुद को सबसे कम उम्र का संपादक कहने का गुमान पालने वाले एम जे अकबर जैसे संपादक अपने महिला पत्रकारों का यौन शोषन करते हैं पत्रकारिता जगत में यह कोई बुझऊल नहीं रहा। तीन दशक ने अकबर जैसे लोगों पर पत्रकारिता के गलिआरे में ये आरोप गौशिप का हिस्सा रहा। लेकिन इसे मुद्दा बनाकर प्रणय राय के एजेंट सवाल कर रहे हैं कि अकबर मोदी मंत्रीमंडल में कैसे हैं मानो उन पर आरोप पहली बार लगा हो। ध्यान रहे अब भी आरोप गमुनाम महिला ने लगाया है। कोई प्राथमिकी नहीं लेकिन अपने बलात्कारी भाई को चोर दरबाजे से बचाने वाले अकबर को सीधे फांसी पर लटकाना चाहते हैं।

मुझे याद आता है 2000 के शुरुआती दौर में वो एशियन एज के संपादक थे उसी अखबार में काम करने वाली महिला पत्रकार मेरी साथ बीट साथी थी वो अक्सर अकबरनामा सुनाती थी। तब अकबर सोनिया के बहुत प्रिय थे। सालों तक कांग्रेस के प्रवक्ता रहे इसी अकबर के संपादकीय ने राजीव गांधी को शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ संसद में वो कानून बनाने को मजबूर कर दिया जिसने सदा के लिए भारतीय महिला को अत्याचार के दलदल में ढ़केल दिया। तब अकबर पत्रकारिता के परमपूज्य थे किसी को बुरे नहीं लगे!

यदि महिलाओं के पास तब सोशल मीडिया का हथियार होता तो अकबरनामा दूसरे रुप में लिखा गया होता। फिर किसी एनडीटीवी या अन्य मीडिया हाऊस के अंदर महिला पत्रकारों को शिकार समझने वाले संपादक किसी अकबर की तरह शराब के प्याले में बर्फ डालने के काम के लिए किसी पत्रकार को नौकरी पर नहीं रखता। किसी महिला पत्रकार के आबरु लूटे जाने की कहानी फस्ट पोस्ट को नहीं छापनी पड़ती। अच्छा है देर से ही सही देश की महिला पत्रकारों ने आवाज उठा दी है।

लेकिन बलात्कारी संपादकों पर उड़ते तीर की दिशा बदलने के लिए रविश पांडे जैसे पत्रकारों से जो खेल शुरु किया है उसे समझने की जरुरत है। मोदी विरोध के पागलपन में पत्रकारिता के पाप के खिलाफ चले आंदोलन की दिशा बदलने की साजिश के खिलाफ सोशल मीडिया पर ही प्रणय राय के पिस्सू को लोगों ने बेनकाब करना शुरु कर दिया है। दसियों साल तक जब अकबर पत्रकार और कांग्रेस प्रवक्ता के रुप में पत्रकारिता का बलात्कार कर रहे थे ,तरुण तेजपाल जैसे मठाधीश कुकर्म कर रहे थे तब तो चुप्पी लादे ही रहे। आज जब अपने ही संस्थान के अंदर महिला पत्रकार द्वारा यौन उत्पीड़न का मामला सामने लाया जाने लगा तो मुद्दे को भटकाने के लिए अकबरनामा लिख कर उसे पत्रकारिता के पाप के बदले मोदी विरोध के पागलपन में रंगने लगे।

प्रणय राय के एजेंडा को लेकर ‘मी टू’ आंदोलन की धार कुंद करने वाले रविश पांडे अकबर को एकायक बलात्कारी साबित कर सवाल उठा रहे हैं कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज कैसे अपने राज्यमंत्री अकबर से आंख मिलाएंगी। महिलाओं के यौन उत्पीड़न पर आवाज बुलंद वो कर रहा है जो अपने बलात्कारी भाई को चोर दरबाजे से निकालने के लिए कांग्रेस के कद्दावर वकीलों को सुप्रीम कोर्ट में उतार दिया। वैसे वकीलों को जिसकी फी एक पत्रकार जिंदगी भर की कमाई से कभी नहीं दे सकता। ऐसे समय में जब महिलाएं अपने आकांओं द्वारा खुद पर हुए अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद कर रही है उन आकाओं को बचाने की साजिश में पूरे मुद्दे को राजनीतिक रंग देकर उसकी दिशा बदले की साजिश रचने वाले पत्रकारिता के फ्रिंज एलिमेंट के पहचान की जरुर है।

URL: NDTV’s Ravish Kumar started to give political color to Me Too movement

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