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‘नेपोटिज़्म’ ने देश का भविष्य चंद परिवारों के पास गिरवी रख दिया है

शाहरुख़ खान की बेटी सुहाना महज बीस साल की हैं और इतनी छोटी आयु में उन्होंने बिना कुछ किये तगड़ी फैन फॉलोइंग बना ली है। सैफ अली खान के बेटे तैमूर अली खान सिर्फ तीन साल के हैं और जब-तब ख़बरों में छाए रहते हैं। तैमूर के खबर में आने का कारण महज बस इतना होता है कि वे आज मम्मी को देखकर मुस्कुराए थे या नहीं। ये बॉलीवुड है, जहाँ पर स्टार किड्स ऑंखें खोलने से पहले सितारों के तेवर सीख जाते हैं। सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद ‘नेपोटिज़्म’ बहुत चर्चा में आ गया है। वैसे तो भाई-भतीजावाद हर जगह मौजूद हैं लेकिन फिल्मों और राजनीति में ये बहुत अधिक देखा जाता है।

यदि अभिषेक बच्चन अमिताभ के बेटे न होते तो क्या उन्हें जेपी दत्ता जैसा बड़ा निर्देशक ब्रेक देता। यदि संजय दत्त सुनील दत्त के बेटे न होते तो उन्हें कभी रॉकी जैसी फिल्म नहीं मिलती। उनकी शुरूआती दौर की फिल्मे देखी जाए तो पता चलेगा कि अभिनय उनके लिए एवरेस्ट पर चढ़ने जैसा काम था। शत्रुघ्न सिन्हा की बेटी सोनाक्षी यदि गैर फ़िल्मी परिवार से आती तो उन्हें वे सारे समझौते करने पड़ते जो इंडस्ट्री में आने वाली नई लड़कियों को करना पड़ते हैं ।

शुक्र है कि बॉक्स ऑफिस का निर्णय दर्शकों के हाथ में होता है और इसकी कोई टीआरपी नहीं बनाई जा सकती। दर्शक अभिषेक बच्चन जैसे नॉन एक्टर को ज़्यादा अवसर नहीं देता। जो पूजा भट्ट आज कंगना रनौत से ‘नेपोटिज़्म’ पर बहस करती हैं, वे यदि महेश भट्ट की बेटी न होती तो दो तीन साल में इंडस्ट्री उन्हें आउट कर देती।

नेपोटिज़्म पर कई सितारें खुलकर बोल रहे हैं। उनमे से एक रवीना टंडन भी हैं, जो इसका शिकार हुई हैं। उन्होंने कहा है कि यहाँ कुछ ऐसे लोग हैं जो आपको ख़त्म करने के लिए प्रयास करते रहते हैं। रवीना ने खुलासा किया कि वे भी इस तकलीफ से गुज़र चुकी हैं। कुछ सितारें कहते हैं कि नेपोटिज़्म इंडस्ट्री में नहीं होता। ऐसा कहने वालों को सोनम कपूर, सूरज पंचोली, अभिषेक बच्चन, करण देओल, अनन्या पांडे, शनाया कपूर को देख लेना चाहिए।

ये सभी फ्लॉप हैं, इसके बावजूद इनको फ़िल्में और विज्ञापन उपलब्ध हैं। ये लोग कार्तिक आर्यन की तरह मध्यप्रदेश के छोटे से शहर से आए स्ट्रगलर नहीं हैं, जो दस साल तक इंडस्ट्री में संघर्ष करते बैठेंगे। सैफ अली खान की बेटी सारा अली खान ने केवल तीन फ़िल्में की हैं, जिनमे से एक ‘सिम्बा’ हिट रही। सिम्बा हिट होने का कारण भी रणवीर सिंह थे। अब विज्ञापनों की दुनिया पर नज़र डालिये। आपको सारे हाई वैल्यू ब्रांड के विज्ञापनों में सारा अली खान दिखाई देंगी।

प्रतिभाशाली स्टार किड्स में ऋत्विक रोशन, वरुण धवन, टाइगर श्रॉफ, रणबीर कपूर, करीना कपूर, का नाम लिया जा सकता है। इन कुछ कलाकारों ने अपनी मेहनत से ये मुकाम बनाया है। टाइगर श्रॉफ को तो नए स्ट्रगलर्स की तरह मेहनत करनी पड़ी थी। प्रतिभाहीन सूरज पंचोली और सोनम कपूर की तरह उन्हें अपने पिता जैकी श्रॉफ से कोई मदद नहीं मिली थी। वरुण धवन को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है।

 हिट होने के बाद वे अपने पिता की फिल्म में दिखाई दिए थे। दरअसल राजनीति और फिल्मों में ‘गद्दी’ की परंपरा नहीं चलाई जा सकती। इन क्षेत्रों में व्यक्ति का प्रतिभाशाली होना अत्यंत आवश्यक है। हम देख ही रहे हैं कि एक दशक से देश की एक बड़ी राजनीतिक पार्टी अपने ‘नेपोकिड’ को नेता बनाते-बनाते देश के राष्ट्रीय पटल से ही मिट गई। सुपरस्टार चाहता है कि उसकी गद्दी पर उसकी संतान बैठे। ये कैसे संभव है। बहुत ही मुश्किल है कि एक ही परिवार में दो लीजेंड पैदा हो जाए। प्रकृति भी संतुलन साधकर रखती है।

फिल्म इंडस्ट्री में ये नेक्सस कई वर्ष से काम कर रहा है। यहाँ लोग ‘घर’ की पिक्चर बनाते हैं और उसमे अपने परिवार वालों को काम देते हैं। भले ही उसे वह काम आता हो या नहीं लेकिन इंडस्ट्री में कॅरियर तो शुरू हो ही जाता है। पंकज कपूर स्वयं एक स्थापित कलाकार हैं और चाहते तो बेटे शाहिद कपूर को बड़ी फिल्म में लॉन्च करवा सकते थे, जैसे संजय लीला भंसाली ने ‘सांवरिया’ में रणबीर कपूर-सोनम कपूर को साइन किया था।

शाहिद ने अत्यंत प्रतिभाशाली होने के बावजूद एक म्यूजिक वीडियो से अपना कॅरियर शुरू किया। शत्रुघ्न सिन्हा के बेटे लव सिन्हा ने एक बड़े बैनर की फिल्म ‘सदियां’ से कॅरियर शुरू किया लेकिन फिल्म पहले दिन ही ढेर हो गई और लव का कॅरियर भी। करोड़ों रुपया इन नॉन एक्टर नेपौकिडस पर खर्च कर दिया जाता है और प्रतिभाशाली कलाकार निर्माताओं के चक्कर काटते रहते हैं।

भारत देश की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है ‘नेपोटिज़्म’। आप यकीन नहीं करेंगे कि हमारे देश से ‘ब्रेन ड्रेन’ के रूप में जो प्रतिभा पलायन हो रहा है, उसका एक बड़ा कारण भाई-भतीजावाद है। प्रतिभाशाली युवा जब देखता है कि उसके टैलेंट को ठुकरा कर यहाँ परिवार के प्रतिभाहीन युवाओं को अवसर दिया जाता है, तो उसका इस देश से मनमुटाव हो जाता है।

 फिर वे विदेश जाकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हैं क्योंकि कम से कम वहां अब तक ये रोग नहीं पहुंचा है। वैसे तो भाई-भतीजावाद भारत की रग-रग में बसा हुआ है लेकिन इसका ज्वलंत उदाहरण हम देश की राजनीति और फिल्म इंडस्ट्री में साफ़-साफ़ देख पा रहे हैं। एक नेपोकिड पर देश की सबसे पुरानी पार्टी कुर्बान है तो इंडस्ट्री में एक सुपर स्टार पिछले कई साल से अपने पत्थर से चेहरे वाले बेटे को स्टार बनाने की कोशिश कर रहा है। नेपोटिज़्म ने देश का भविष्य चंद परिवारों के पास गिरवी रख दिया है।

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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