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दीवाली के पटाखों पर सुप्रीम हथौड़े से नहीं, चीनी मिजाज से प्रदूषण मुक्त होगा भारत

दीवाली की रात सोशल मीडिया पर भारत के सुप्रीम अदालत के उस आदेश का मजाक उड़ना शुरु हो गया जिसमें अदालत ने दिल्ली एनसीआर में रात के आठ बजे से दस बजे तक ही पटाखे जलाने के आदेश दिए थे। सुप्रीम अदालत का आदेश था कि इन दो घंटों के दौरान सिर्फ ग्रीन पटाखे जलाए जा सकते हैं। आम-जन की तो बात छोड़िए पुलिस प्रशासन को भी पता नहीं था कि ग्रीन पटाखे होते क्या हैं? दीवाली के दिन तक भी बाजार में लोग ग्रीन पटाखे तलाशते रहे। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन क्या संभव था!

विकास की अंधी दौड़ में आवोहवा को खराब करने का क्या क्या अपराध किया उसे जाने बिना हमने दीवाली के पटाखे को ही अपराधी मान लिया। जो साल में एक दिन आता है। चीन से हम प्रतिस्पर्धा करते रहे। आंख मूँद कर। वो दीवाली नहीं मनाता। लेकिन हमसे ज्यादा प्रदूषित था। उसने समाधान ढूंढ लिया। हमने सुप्रीम कोर्ट का डंडा ढूंढ लिया। डंडों से जानवर हांके जाते हैं। विचारशील मनुष्य तो समझ-बूझ से राह तय करते हैं।

दलीलो की अदालत में भारत की सुप्रीम कोर्ट को यह एहसास करा दिया गया कि दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण सिर्फ दीवाली के पटाखों से होता है और सुप्रीम अदालत ने पिछले साल की भांती पटाखे जलाने पर रोक लगा दिया। बस दो घंटे की ढील दे दी गई। हुआ यह कि सालों से पटाखों से ही दीवाली की खुशी मापने वाली पीढी ने जैसे तैसे कुछ पटाखे ढुंढ लाए और दीवाली का आनंद ले लिया। बेहद सधन आबादी वाले दिल्ली एनसीआर में जो पटाखे फूटे उसे हमने सुप्रीम अदालत के आदेश का उल्लंघन मानते हुए अदालत का मजाक उड़ाना शुरु कर दिया।

सच मानिए तो जैसी सघन आबादी हमने बसाई है उस हिसाब से पटाखे जले नहीं। लेकिन प्रदूषण का रोना हमने शुरु कर दिया दीवाली के नाम पर। बिना सच का सामना किए कि प्रदुषण हमने विकास के अपने बेतरतीब रफ्तार से बढ़ाए हैं । अनियंत्रित जनसंख्या बढ़ा कर बढाए हैं। चीन और भारत में बेहद समानता है। वो दीवाली नहीं मनाता। लेकिन उसके यहां ठंढ के मौसम में राजधानी समेत अन्य विकसित शहरों के हालात दिल्ली जैसे से थे। चीन है कि उसने समस्या से निदान पा लिया हम दीवाली को समस्या मान कर बैठ गए।

2000 के शुरुआती दौर में चीन के विकसित शहरों के हालात ठीक वैसे ही थे जैसे आज दिल्ली एनसीआर के हैं। विकास का रफ्तार ठीक वैसा ही था जैसे दिल्ली ने कंक्रीट के शहर को बसाने के क्रम में किया है। आप दिल्ली के एनसीआर इलाके में आएं तो पाएंगे कि निर्माणाधीन मकानों के कारण यहां सांस लेना मुश्किल है। यह समस्या ठंढ के दिनो में ज्यादा बढ जाती है।

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चीन के हालात का अध्यन करने पर हमने पाया की चीन के उत्तर पूर्वी भाग का मौसम भी कमोवेस उत्तरी भारत की तरह होता है। जब चीन में यह समस्या हुई तो उसने विकास की रफ्तार पर थोड़ा लगाम लगाया। चार दशक पहले ही बेतरतीब जनसंख्या पर वो रोक लगा चुका था चीन। वोट बैंक की राजनीति के कारण जिसके बारे में हम सोच भी नहीं सकते।

पांच छह साल पहले तक चीन में वायु प्रदूषण की समस्या इतनी गंभीर थी कि सर्दियों में स्मॉग से आसमान नजर आना बंद हो जाता था। चीन में कई दिनों के लिए स्कूल बंद कर दिये जाते थे। कई शहरों में वायु प्रदूषण के चलते सूरज के दर्शन नहीं हो पाते थे। बीजिंग का हर शख्स मास्क पहनकर घूमता नजर आता था। लेकिन अब चीन में ये हाल नहीं है। ऐसे में ये सवाल जाएज है कि चीन ने ये सब कैसे कर दिया? एक वक्त बीजिंग का एयर क्वालिटी इंडेक्स 450 तक पहुंच चुका था जो बेहद खतरनाक था। कुछ एहतियात बरतने के बाद अब ये महज 30 तक आ चुका है, जो अपने आप में आदर्श है।

चीन की राजधानी बीजिंग की हालत सुधर रही है, लेकिन भारत की राजधानी दिल्ली की हालत बिगड़ रही है। दिल्ली के सबसे प्रदूषित इलाके आनंद विहार का एयर क्वालिटी इंडेक्स 703 है। वहीं बीजिंग के सबसे प्रदूषित इलाके लियू लियानज़िन का एयर क्वालिटी इंडेक्स 74 है। यानी दिल्ली का प्रदूषण तकरीबन 9 गुना है। दिल्ली के सबसे कम प्रदूषित इलाके मंदिर मार्ग का एयर क्वालिटी इंडेक्स 290 है। तो बीजिंग के हुआइरऊ इलाके का 30, यानी दिल्ली से तकरीबन 9 गुना कम।

वर्ष 2012 तक चीन के 90 प्रतिशत शहरों की आबोहवा निर्धारित मानकों से ज्यादा थी। वहां वायु प्रदूषण से हर साल पांच लाख लोगों की मौत समय से पहले हो जाती थी। दुनियाभर में चीन के वायु प्रदूषण की आलोचना होने लगी थी। भारत आज प्रदुषण की बदहाली में 2000 के चीन के दौर से बहुत आगे निकल चुका है। चीन ने वहां से सीख ली। जबकि उसके पास सिखने के लिए कोई चीन नहीं था जो भारत के पास है। चीन की स्थिति भी भारत से बहुत ज्यादा अलग नहीं है। औद्योगीकरण और तेज विकास का खामियाजा भारत व चीन, दोनों ही भुगत रहे हैं। भारत की तरह ही चीन के उत्तरी हिस्सों में भी ठंड के दिनों में प्रदूषण की समस्या अक्सर सामने आती है। लेकिन चीन ने समस्या का समाधान कर लिया।

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अगले कुछ सालों में भारत से कम हो जाएगी चीन की जनसंख्या। हमने जनसंख्या पर नियंत्रण के लिए साहसी कदम उठाए ही नहीं। उसके कई शहर विकसित हुए। लिहाजा देश की जनसंख्या कई शहरों में बटें। हमने बस बिल्डिंग बनाने को ही विकास मान लिया। फर्क यह पड़ा कि दिल्ली के आसपास के हालात बिगड़ते जा रहे हैं, जबकि बीजिंग और इसके आसपास के पूरे क्षेत्र में नीला आसमान फिर से दिखने लगा है, और वायु की गुणवत्ता बहुत अच्छी हो चुकी है। भारत के उलट चीन में सड़कों पर न तो धूल उड़ती है और न ही कचरा जलाया जाता है। पर वहां प्रदूषण के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार कोयले से चलने वाले प्लांट थे। जो अब लगभग नदारद हैं।

अगर प्रदूषण पर नियंत्रण करने के उपायों की चर्चा करें, तो चीन ने इस दिशा में लगभग एक दशक पहले ही गंभीरता दिखानी शुरू कर दी थी। इसके लिए बीजिंग में मौजूद फैक्टरियों को नजदीक के हबेई प्रांत में भेजा गया, जबकि कोयले से चलने वाले कई प्लांट बंद कर दिए गए। साथ ही सड़कों पर वाहनों के लिए सख्ती से सोमवार से शुक्रवार तक सम-विषम नियम लागू किया गया, जो अब तक जारी है। इस नियम का उल्लंघन करने पर भारी जुर्माना होता है। शहर की सड़कों पर ट्रैफिक पुलिस की बजाय सीसीटीवी कैमरे पहरा देते हैं। सरकार ने पुराने वाहनों को सड़कों से हटाने का अभियान भी चलाया है।

चीन ने सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने की पूरी कोशिश की है। इसका शुरुआती मकसद साल 2008 के ओलंपिक में खिलाड़ियों और नागरिकों को स्वच्छ वायु व प्रदूषण रहित माहौल प्रदान करना था। इसके बाद भी लोगों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए यह नीति जारी रही। और 2012 में नेशनल एयर पॉल्यूशन एक्शन प्लान लागू किया गया। इसके तहत कोयले से चलने वाली फैक्टरियों के खिलाफ कार्रवाई की गई। साथ ही ऊर्जा के वैकल्पिक उपायों पर भी सरकार का ध्यान केंद्रित है। सौर ऊर्जा और रिसाइकिल होने वाली ऊर्जा के उत्पादन व इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है।

चीन ने सबसे ज्यादा धूल के प्रदूषण को कम करने में कामयाबी पाई है। वहां सड़कों की मशीनों से सफाई के बाद उनकी बाकायदा धुलाई होती है। वहां निर्माण कार्य भी पूरी तरह ढककर किया जाता है। यदि आप दिल्ली एनसीआर में निर्माण कार्य को देखेंगें तो पाएंगे कि हमने चीन से क्या सिखा है!

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बीजिंग समेत चीन के अन्य शहरों में सबको सार्वजनिक परिवहन सुलभ कराने के लिए मेट्रो लाइनों का विस्तार किया गया है। सार्वजनिक बसों की संख्या में भी बढ़ोतरी की गई है। बीजिंग में करीब 23 हजार बसें संचालित होती हैं, जिनमें से 90 प्रतिशत से अधिक सरकारी निगम द्वारा चलाई जाती हैं। निजी कारों पर नियंत्रण के लिए तीन साल पहले बीजिंग और शंघाई में कारों के लिए लॉटरी सिस्टम लागू किया गया। बीजिंग में हर महीने महज 17,600 नई कारें ही खरीदी जा सकती हैं।

कार खरीदने वालों को लंबा इंतजार करना पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में बीजिंग में नौ लाख से अधिक पुराने वाहन सड़कों से हटाए जा चुके हैं। साइकिल का चलन बढ़ने लगा है, इसके लिए सरकार ने शहर के कोने-कोने में साइकिल स्टैंड बनवा रखे हैं, जहां से बहुत कम पैसे में नई साइकिलें किराये पर ली जा सकती हैं। इन सबसे आम लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता काफी बढ़ चुकी है। स्कूलों में भी बच्चों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए एयर प्यूरीफायर लगाए गए हैं। चीन सरकार प्रदूषण से निपटने के लिए लगातार गंभीर प्रयास कर रही है। भारत में अभी सिर्फ दिल्ली में ही थोड़ी-बहुत हलचल हुई है। यदि यह हलचल नहीं होती तो कल्पना कीजिए हमारी पीढी जिस तरह दीपावली में पटाखे जलाते थे वही रफ्तार होता तो इतनी सघन आबादी वाले दिल्ली एनसीआर में क्या दीवाली के दिन एक घंटे भी जी सकते थे हम?

हमारी पीढी सचेत तो हुई कि पटाखे खतरनाक हैं। यह सकारात्मक बदलाव है। लेकिन दीवाली के पटाखे और पराली को ही प्रदूषण का अपराधी मान कर आंख मुंद लेना हमें तबाही के अंधियारे में ले जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के हथौड़े की नहीं, हमारे अदंर दृढ इच्छा शक्ति की जरुरत है। इसके लिए हमारी मीडिया को दीवाली के सुबह समस्या ढूंढने के बदले इस गंभीर समस्या के निदान की राह तय करनी होगी। भारत को प्रदूषण से जंग लड़ने में लंबा सफर तय करना है।

URL: Not by Supreme Court order India will get pollution free from chinese manner

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