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फेमिनिज्म नहीं, यह हिन्दुओं को तोड़ने का षड्यंत्र है टुकड़े टुकड़े गैंग द्वारा

Sonali Misra. भारत में इन दिनों फेमिनिज्म का अभिप्राय केवल और केवल हिन्दू द्वेष और हिन्दू परिवारों की सबसे मजबूत कड़ी को तोड़ना हो गया है, तभी कुकुरमुत्तों की तरह उगी फेमिनिस्ट वेबसाइट्स केवल और केवल उन छोटी छोटी बातों को लेकर प्रश्न उठाती हैं, जो हिन्दू धर्म की आस्था हैं, जैसे सिन्दूर लगाना, चूड़ी पहनना आदि! मजे की बात यही है कि जो फेमिनिज्म वाली वेबसाईट सिन्दूर लगाने को पिछड़ापन घोषित करती है वही हिजाब को पहनने के कई कारण बताती हैं।

1 फरवरी को विश्व हिजाब दिवस मनाया जाता है। इसका महिमामंडन करते हुए मुस्लिम औरतों के लिए पहचान की अवधारणा हिजाब के आसपास ही केन्द्रित कर दी है। औरतों के लिए लिखने वाले इस पोर्टल पर इस दिन को धार्मिक स्वतंत्रता का प्रतीक बताया गया है। इसमें लिखा गया है कि हिजाब इसलिए मुस्लिम औरतें पहनती हैं जिससे वह अपनी धार्मिक पहचान को गौरव पूर्ण तरीके से स्थापित कर सकें। हिजाब उनके लिए शोषण का प्रतीक नहीं है बल्कि हिजाब एक ऐसी सुन्दरता का प्रतीक है जिससे वह एक ऐसी सुन्दरता को स्थापित कर सकें, जो दिमाग से जुडी हो क्योंकि बाल खुले होने से लोग उनकी सुन्दरता पर ज्यादा ध्यान देने लगते हैं।

हालांकि यह लेख मूलत: एक और हिन्दू फोबिया से ग्रस्त वेबसाईट कन्वर्सेशन (conversation) से लिया था,

जिसमें बार बार मोदी सरकार को कोविड के मामले में विफल बताने के साथ साथ हिन्दुओं को उनके उस मंदिर के लिए कोसा गया है, जिसमें उन्होंने एक दो नहीं बल्कि सैकड़ों वर्षों की प्रतीक्षा की थी:

shethepeople के मुस्लिम प्रेम से बढ़कर अब आते हैं हिन्दुओं के प्रति घृणा पर। इसमें बार बार ऐसे लेख हैं, जिन्होनें हिन्दुओं को आहत करने में जरा भी कसर नहीं छोड़ी है। जैसे वह हिजाब जैसे पर्दे को तो मुस्लिमों की मजहबी आज़ादी बताती हैं तो वहीं सिन्दूर के विषय में क्या कहती हैं:

अर्थात सिन्दूर, जो हिन्दू स्त्रियों के लिए विवाह में पवित्र माना जाता है, वह इन्हें आवश्यकता नहीं लगता! वह इन्हें समाज का ओब्सेशन लगता है। क्या सिन्दूर हिन्दू स्त्रियों की धार्मिक पहचान नहीं है? क्या दहकते हुए सिन्दूर में एक विवाहित हिन्दू स्त्री का सौन्दर्य बढ़ नहीं जाता है? या फिर यह लोग हिजाब में माथा देखने के इतने आदी होते हैं कि खुले सिर वाली हिन्दू स्त्री और वह भी सिन्दूर लगाई हुई हिन्दू स्त्री इन्हें आँखों में चुभती है? और यही कारण है कि पहले वह उन्हें हिन्दू धर्म की पहचान से दूर करते हैं और फिर चुपके से हिजाब में लपेट देते हैं।

अब और लेख देखते हैं। एक लेख है “डियर देसी आंटी, अपने बेटे की ठीक से परवरिश करें, मेरी आलोचना न करें।” इसमें पड़ोसियों द्वारा टोकाटाकी पर प्रश्न उठाए गए हैं। इसमें लिखा गया है कि पड़ोस की आंटी को यह नहीं बोलना चाहिए कि एक लड़की को कैसे उठना चाहिए, बैठना चाहिए, और अपनी आँखें घुमानी चाहिए आदि आदि! या फिर रात में लड़की को घर से बाहर नहीं जाना चाहिए!

और पड़ोसियों के विषय में देसी आंटी कहा गया है! इतना अपमानजनक भाषा में लेख लिखा गया है कि जिसे पढ़ते समय गुस्सा आए। पर क्यों लिखा है? क्योंकि लेखिका और पोर्टल दोनों ही समाज को तोड़ने का विचार लिए हुए हैं। जहाँ हमारे यहाँ कन्या एक सामूहिक उत्तरदायित्व मानी जाती थी, उस पर वस्त्रों का तो छोड़िये विवाह को लेकर भी कोई बंधन नहीं था, हाँ, समाज के कुछ नियम थे, जिनका पालन किया जाता था। स्त्री को पूज्य इसलिए माना जाता था क्योंकि वह समाज में अराजकता नहीं फैलाती थी बल्कि अपने कर्मों से नए मापदंड स्थापित करती थी। अपने आप को फेमिनिस्ट कहने वाली इन लड़कियों को दूसरी स्त्रियों का उपहास करते हुए शर्म नहीं आती है!

एक बिंदु है कि शादी को एक साल हो गया, अभी बच्चा कर लो!” चूंकि विवाह में अभी भी हमारे समाज की सामूहिक प्रसन्नता होती है और एक परिवार की लड़की को अभी भी समाज की बच्ची माना जाता है इसलिए समाज उसे माँ बनता देखकर प्रसन्न होता है। पर यह भावना कबीलाई तहजीब में या कहें वामपंथ में नहीं है जहाँ पर लड़की को केवल विकृत काम की पूर्ती करने वाली वस्तु माना जाता है, इसलिए माँ बनने की भावना को समझ नहीं पाती हैं, सम्भोग नहीं यह उपभोग पर ही सिमटती हैं।

इतना ही नहीं इसमें लोगों के विचार मांगे गए हैं जैसे राजा बेटा सिंड्रोम, “डियर सोसाइटी, क्या तुम एक कामकाजी पिता से यह सब सवाल पूछती हो?”, लड़कियों को शादी के बाद अपना सरनेम बदलने की जरूरत क्यों होती है? “हे मॉम, अपने त्याग की बात न करें, आपकी बेटी देख रही है।” “डियर पेरेंट्स, कैन यू लुक बियॉन्ड “लड़का अच्छा है” व्हाइल अरेंज मैरिज” आदि आदि!

हालांकि इसे एक महिलाओं के न्यूज़ पोर्टल की तरह विकसित किया गया है और संतुलन सा दिखाने के लिए आयुर्वेद आदि को सम्मिलित कर लिया गया है, परन्तु ओपिनियन सेक्शन में हिन्दू फोबिया खूब जम कर भरा है। और हो भी क्यों न? क्योंकि यह वेबसाईट बनाई ही एक ऐसी महिला ने, जो फिलिस्तीन का समर्थन करती है और साथ ही वह एनडीटीवी प्रॉफिट में भी काम कर चुकी हैं,

इसी के साथ चुपके से वह किसान आन्दोलन के पक्ष में खड़ी हैं:

नवम्बर से लेकर जनवरी तक भारत सरकार ने बात सुनी थी और शैली चोपड़ा ने किसान आन्दोलन का समर्थन किया था, परन्तु उन्होंने एक बार भी 26 जनवरी को हुई हिंसा के विरोध न ही ट्वीट किया और न ही ऐसे किसी ट्वीट को रीट्वीट किया था। अत: इस पोर्टल की मालकिन की प्राथमिकता तय है। हाँ, चेहरा निष्पक्ष दिखाने के लिए जरूर खबरें चला दी जाती हैं, पर भीतर का जो जहर है वह ओपिनियन अर्थात विचार में दिख रहा है और दिख ही नहीं रहा है, वह हिन्दू समाज को तोड़ने के लिए लगा हुआ है।

वह कभी चर्च में होने वाले शोषण के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाती हैं, हाँ क्रिसमस की शुभकामनाएँ देती हैं, पर हिन्दू संस्कृति पर बार बार प्रहार करती हैं

वह रिश्ते तोड़ने के लिए हर सम्भव प्रयास कर रही हैं। ऐसी ही एक वेबसाईट है feminisminindia जिसका लोगो है intersectional feminism: desi style और देसी स्टाइल में फेमिनिज्म कैसे बताया जा रहा है वह देखिये:

जब फेमिनिज्म है तो फिलिस्तीन से क्या मतलब है?

वैकल्पिक अध्ययन के नाम पर, हमारे पुराणों और ग्रंथों के स्त्री चरित्रों को केवल इसी तरह से लिख कर कि हमारे धर्म को नीचा दिखाया जाए, यह बच्चों के दिमाग में हिन्दू धर्म के लिए जहर भर रही हैं। यह लोग gynocentrism अर्थात स्त्रीकेंद्रवाद का प्रयोग उस हिन्दू धर्म को तोड़ने के लिए कर रहे हैं, जहाँ पर हर प्रकार की स्वतंत्रता है और इसी के साथ यह अंतत: उस भारत देश को गुलाम बनाने का षड्यंत्र है जहाँ पर स्त्रियों को आज भी सबसे अधिक स्वतंत्रता है।

इन वेबसाइट्स का उद्देश्य दरअसल स्त्रियों को भड़काकर परिवार तोड़ना है और हिन्दू धर्म को नष्ट करना है और यह बहुत सरल कार्य इसलिए है क्योंकि हिन्दू समाज जो सेक्युलरिज्म के चलते अपने धार्मिक ग्रंथों एवं धार्मिक शिक्षा से दूर हो गया है, वह इनका सबसे बड़ा शिकार है, या इनके बहाने भारत इनका शिकार है!

इन्हें बंगाल में मरती हुई हिन्दू स्त्रियाँ नहीं दिखती हैं, इन्हें लव जिहाद की पीड़ित स्त्रियाँ नहीं दिखतीं, इन्हें निकिता तोमर नहीं दिखती और न ही इन्हें वह कोई लाशें दिखतीं हैं, जो नाम बदलकर मजहबी लोगों का शिकार होती हैं, और यह फेमिनिज्म का ठेकेदार बनकर घूम रही हैं! इन्हें पहचानिए! वह लव जिहाद की पीड़ित लड़कियों के लिए कुछ नहीं बोलती हैं पर लव जिहाद जैसा कुछ नहीं है, इसके लिए एक जैन को ही सामने करती हैं:

शैली चोपड़ा का फेमिनिज्म वाला पोर्टल हो या फिर फेमिनिज्म इन इंडिया, ऐसे हर पोर्टल का शिकार केवल और केवल हिन्दू धर्म है! यह हर मूल अवधारणा को तोड़ना चाहती हैं जिनके आधार पर हमारा धर्म टिका हुआ है. यह हमें खा जाना चाहती हैं, और यह झुण्ड में हैं, भेड़ियों के झुण्ड में!

यह भेड़िया फेमिनिज्म है!

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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