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अब संघ भारत को पैगंबरों की धरती बता रहा है!

इस्लाम में करीब सवा लाख अज्ञात नबियों के बारे में बताया गया है. जिनके लिए कहा गया है कि ये, इस्लामिक मान्यता के अनुसार, आदम और मोहम्मद साहब के बीच आए हुए पैगंबर थे. जिनको ऊपरवाले ने अपना संदेश देकर भेजा था. मोहम्मद साहब ने अपने संदेश, कुरान में 25 पैगंबरों की पहचान दी थी. जिसमें आदम, अब्राहम, इस्माइल से लेकर मोजेज, डेविड और जीसस के नाम आते हैं.

इनमें से चार मोजेज, डेविड, जीसस और मोहम्मद साहब विशेष हैं. क्योंकि कुरान के अनुसार इन्हीं चार पर ही ऊपरवाले की किताब उतरी थी. अर्थात् आदम पहले और मोहम्मद साहब अंतिम नबी थे. अब हम यदि इन ज्ञात 25 नबियों को छोड़ दें तो करीब 1,24,975 (एक लाख चौबीस हजार नौ सौ पचछत्तर) नबी/पैगंबर ऐसे हैं जो अनाम और अज्ञात हैं. इनके बारे में जानकारी बस इतनी है कि यह आए थे.

वैसे इस्लाम के फिरके अहमदिया, कादियानी और खोजा ने थियासिफिकल सोसाइटी के प्रभाव और भारत में अपना दायरा बढ़ाने के लिए, भगवान कृष्ण को एक नबी में स्थापित करने का प्रयास किया था. बाद में ये खुद इस्लाम से ही खारिज हो गए. इस्लाम की एक धारा ने मोजेज को ही कृष्ण बताने का भी काउंटर प्रयास किया था. जब विवेकानंद ने शिकागो सम्मेलन में गीता को मुख्य पुस्तक के रूप में स्थापित किया था.

लेकिन यह स्वीकार हो ही नहीं पाया क्योंकि विवेकानंद संघी नहीं थे, इसीलिए मन बदलने में नहीं पड़े. ना ही शील प्रभुपाद पड़े. फिर कभी इस पर विस्तार से बात होगी. तो इस समस्त भूमिका को लिखने का कारण यह है कि भले ही इस्लाम में अज्ञात, अनाम नबियों के रूप में भाईचारा बनाने का एक दांव वहाँ उपस्थित है.

लेकिन किसी भी इस्लामिक मौलाना ने इस प्रकार के किसी भी प्रयास को बढ़ावा नहीं दिया. उन्होंने किसी भी दौर में हिंदु अवतारों को नबियों के रूप में स्थापित नहीं होने दिया.

ध्यान दीजिए जबकि नबी का स्थान इस्लाम में वह नहीं है, जो अवतारों का भारतीय हिंदु संस्कृति में है. नबी किसी भी स्थिति में देवदूत अर्थात् अल्लाह के बंदे ही हो सकते हैं. स्वयं ईश्वर नहीं. लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भारत को “पैगंबरों” की धरती बता रहा है. अर्थात् राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मन बदलू अभियान, और संघुल्लों के अनुसार 20 करोड़ आबादी के लिए प्लान बनाने के लिए संघ हिंदु सनातन अवतारों को “अल्लाह के बंदे” बता सकता है.

और यह तो छोड़िए इस्लाम में तो इमाम की स्थिति तो नबी के बाद की है. इमाम वह है जो नबी के बताए ज्ञान को लोगों को देता है. अर्थात् संघ के भगवान श्रीराम को “इमाम ए हिंद” मानने का अर्थ है. वह श्रीराम को नबी भी नहीं, उनके बाद का फॉलोवर मानने को तैयार है. क्या राम नबी के फॉलोवर हो सकते हैं? हिंदु बनने की संघुल्ली टेक्नीक के जानकार इसका डिफेंड करने के लिए सनातन की सर्व-स्वीकार्यता का झूठा सहारा लेने लगते हैं.

स्वीकार्यता का अर्थ यह थोड़े है कि त्रिदेव सिद्धांत या सौर, गाणपत्य, शैव, शाक्त व वैष्णव मतों में स्थापित सृष्टि की स्थापना और नियामन को ही रद्द कर दिया जाए. क्या मन बदलने की स्वीकार्यता में हम सभी मतों को केवल अल्लाह के अनुगामी के तौर पर मान लेंगे? इससे क्या हिंदु दर्शन के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह नहीं लग जाता है? इससे तो अब्राहमिक मत की स्थापना पक्की हो जाती है कि सिवाए अब्राहमिक और आदम की मान्यता के अलावा बाकी सब कुछ गलत था और है. क्या यह हमें स्वीकार होगा?

वैसे अब्राहमिक मत में ही यहूदी आज तक जीसस को सेकेंड कमिंग नहीं मानते हैं. और इस्लाम में तो यहूदी के विरूद्ध एक पूरा खंड ही है. ऐसे में हम, अर्थात् हिंदुओं को ही क्योंकर संघ के प्लान के अनुसार अपना अस्तित्व तिरोहित करना होगा. हिंदु धर्म के समस्त मतों और पंथों में पूजा-पद्धति की तो एक साम्यता है. यह अब्राहमिक धर्मों के साथ कैसे मिलाएंगे. वैष्णव को कैसे मांसाहार धार्मिक संस्कार सिद्ध किया जाएगा?

ऐसे में संघ की अपनी वर्चस्वता और 20 करोड़ लोगों का मन जीतने का प्लान स्वीकार करना हिंदु धर्म पर आधुनिक युग का सबसे बड़ा हमला है. जो अभी अनुभूत नहीं हो रहा है. वहीं सोचिए एक ओर जाकिर नायक है, जो यह पूछने पर “क्या रविश कुमार जैसे नॉन-मुस्लिमों को, हक का साथ देने के लिए, जन्नत मिलेगी?” उसका सीधा जवाब था, “इस्लाम में मुशरिक, काफिर के लिए किसी भी तरह की जन्नत नहीं है. जब तक वह इस्लाम ना कुबुल कर ले. काफिर को जहन्नुम में ही जाना है.”

जाकिर नायक को अपने मजहब के आगे किसी की परवाह नहीं है. और यही सवाल अपने आस-पास के किसी भी मौलाना से पूछिए सीधे या घुमा-फिराकर यही कहेगा. लेकिन आपका संघ अफ्तारी करा रहा है. और राम को सेकेंड कमांड का फॉलोवर बता रहा है. आपको क्या लगता है यह धर्म बचा रहे हैं, या आपका अस्तित्व ही मिटा रहे हैं. सोचकर देखिए? रागजनतंत्र से हटकर

साभार लिंक

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