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पर्सियन साम्राज्य के पराभव से कब सीखेंगे हिंदू!

पुष्कर अवस्थी। भारत के पश्चिम में, मध्यपूर्व एशिया जो इस्लामिक राष्ट्र ईरान है, वहां आज से 1360 वर्ष पूर्व अग्नि पूजक रहते थे जो ज़रथुष्ट्री धर्म के अनुयायी थे और उन्हें ज़ारोऐस्ट्रीअन कहा जाता था। ये ही जब विस्थापित होकर भारत आए तो पारसी कहे जाने लगे। उस काल में ईरान को पर्शिया (फारस) के नाम से जाना जाता था, जो सबसे बड़ा और शक्तिशाली साम्राज्य था। इस शक्तिशाली साम्राज्य का पराभव सन 633 से तब शुरू हुआ जब खलीफा ओमर ने उल्लाइस के युद्ध में परास्त किया था।

जब पर्सियन साम्राज्य का पराभव शुरू हुआ तब वहां ससनियाँ राजवंश का शासन था। इस वंश ने सन 224 से 651 तक राज्य किया था इसलिए उसे ससनियाँ सम्राज्य भी कहा जाता है। यह साम्राज्य कितना बड़ा था इसको इस बात से समझा जा सकता है कि अपने श्रेष्ठतम काल मे इस साम्राज्य के अंतर्गत आज का ईरान, इराक, बहरीन, कुवैत, ओमान, क़तर,यूएई, सीरिया, पलेस्टाइन, लेबनान, इजराइल, जॉर्डन, अर्मेनिआ, जॉर्जिया, अज़रबैजान दागिस्तान, मिश्र, टर्की का बड़ा भाग, अफगानिस्तान, तुरकेमिस्तान,उज़्बेकिस्तान, ताजीकिस्तान, यमन और पाकिस्तान आते थे।

इस साम्राज्य का राजधर्म ज़रथुष्ट्री था, लेकिन साथ में ईसाई, बौद्ध व हिन्दू धर्मावलंबी भी रहते थे। इतने बड़े ज़रथुष्ट्री धर्म के पर्सियन साम्राज्य को अपने अस्तित्व को खोने में सिर्फ 21 वर्ष लगे थे! जिस पर्शिया के ससनियाँ सम्राज्य के पतन की शुरुआत 633 में सम्राट यज़देगेंर्ड की खलीफा ओमर के हाथों हारने से हुई थी, उसका अंत, पीछे की तरफ सिमटते जा रहे सम्राट यज़देगेंर्ड की 651 में हत्या से हुई थी। शताब्दियों से पर्शिया ज़ारोऐस्ट्रीअन लोगों का था लेकिन 651 में सदा सदा के लिए यह सब बदल गया। सबसे पहले पर्शिया का राजधर्म ज़ोरोअस्ट्रानिस्म समाप्त हो कर इस्लाम हो गया और अगली शताब्दी तक सारे ज़ारोऐस्ट्रीअन बलात मुसलमान बना दिये गए और पर्शिया पर अरबी शासकों की जगह पर्शिया के ही मुसलमान शासक बन गए।

हम लोगो को इतिहास यही बताता है कि अरब से इस्लाम मानने वालों की मक्का मदीना से उड़ी आंधी ने, पर्शिया के साम्राज्य और उसके ज़रथुष्ट्री धर्म के अनुयायियों को दो दशकों में ही उड़ा दिया था, लेकिन यह अर्धसत्य है। 7वी शताब्दी में पर्शिया का इस्लामिक राष्ट्र, युद्ध मे हार कर जरूर बना था लेकिन उसकी नींव 6वी शताब्दी में ही पड़ गयी थी। मैं, जो पर्शिया में 6वी शताब्दी में हुआ था वही आज भारत में देख रहा हूँ।

6वी शताब्दी में ससनियाँ के सम्राट कावध प्रथम के काल मे, पर्शिया में मज़दक नाम के एक ज़ारोऐस्ट्रीअन पुजारी (मोबाद) का बड़ा प्रभाव था। वो एक सुधारवादी था जिसने ज़रथुष्ट्री धर्म और समाज मे बदलाव लाने के लिए काम किया था। वह अपने आपको अहुर मज़्दा (ज़ारोऐस्ट्रीअन धर्म के सर्वोच्च देवता) का पैगम्बर कहता था। उसने, उस समय अपवादस्वरूप, कई सामाजिक व जन कल्याणकारी योजनाएं चलाई जिससे पर्शिया की जनता में वे लोकप्रिय था। उसने सुधारवादी पुट लिए जो धार्मिक शिक्षा व दर्शन को सामने रक्खा इसे मज़दक़िस्म कहा गया, जिसको उसने ज़रथुष्ट्री धर्म का सुधरा हुआ परिष्कृत स्वरूप में सामने रक्खा था। मज़दक का प्रभाव इतना बढ़ गया कि खुद सम्राट कावध प्रथम उसके अनुयायी बन गए थे जिसे परंपरागत ज़ारोऐस्ट्रीअन और उनके धर्माधिकारियों को पसन्द नही आया था।

सम्राट कावध प्रथम का समर्थन मिलने के बाद तो मज़दक ने अपने सुधारवादी कार्यक्रमो पर तेजी से काम किया जिसमे विभिन्न वर्गों में शांति, धार्मिक पुजारियों की रूढ़िवादिता को तोड़ना व गरीब जनता के सहायतार्थ योजनाओं को बढ़ाना था। उस काल मे ज़ारोऐस्ट्रीअन समाज, अपने पुजारी वर्ग से जकड़ा हुआ था इसलिये उसको तोड़ने के लिए उसने सम्राट से हर जगह कुक्करमुत्ते ऐसे उग आये ज़रथुष्ट्री धर्म के ‘अग्नि मंदिरों’ को बन्द करा कर केवल मुख्य अग्नि मंदिरों को ही रहने दिया था।

मज़दक के इन सुधारो से जहां जनता प्रसन्न थी वही ज़ारोऐस्ट्रीअन आभिजात्य व पुरोहित वर्ग बड़ा डर गया था। उनके स्वार्थों का अहित हो रहा था। मज़दक के सुधारो ने आभिजात्य वर्ग व पुरोहितों का पर्शिया के समाज व गरीब जनता पर शताब्दियों से चले आरहे निरंकुश नियंत्रण को कमजोर कर दिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि इन दोनों वर्गों ने (दोनो ही वर्गों की पर्शिया साम्राज्य को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी) मिल कर 496 में सम्राट कावध प्रथम को अपदस्त कर दिया, जिसे वो, बाह्य सहायता से 3 वर्ष बाद फिर प्राप्त कर पाए थे। इस बार जब सम्राट कावध सत्ता में जब लौटे तो उन्होंने मज़दक से अपनी दूरी बना ली और अपने पुत्र अनुषीर्वान को, जो बाद में अपने पिता के बाद सम्राट खोसरो प्रथम बना था, मज़दक व उसके समर्थको के विरुद्ध कार्यवाही करने की अनुमति दे दी। ज़रथुष्ट्री धर्म के पुरोहितों ने मज़दक को विधर्मी घोषित कर दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि सुधारवादी मज़दक के समर्थको का भीषण नरसंहार हुआ और खुद मज़दक को तड़पा तड़पा के मार डाला गया।

इस तरह एक बार फिर पुरतसंपंथियों का ज़रथुष्ट्री धर्म पर्शिया में स्थापित हो गया और उसके साथ पुरोहितों के वर्ग की सत्ता फिर पर्शियन साम्राज्य में स्थापित हो गयी। लेकिन उसके साथ ही ज़रथुष्ट्री धर्म कमजोर व उसके समाज में विभाजन हो गया। 6वी शताब्दी में भले ही पुरोहितों की अपेक्षा का ज़रथुष्ट्री धर्म राजधर्म बन गया था लेकिन पुरातनपंथियों का सुधारवादियों के प्रति नफरत बनी ही रही थी। एक तरफ पर्शिया का साम्राज्य, अरब की तरफ से इस्लाम का झंडा लिए बद्दुओं से सीमा पर लड़ रहा था वही अंदर पुरातनपंथी ज़ारोऐस्ट्रीअन लोग सुधारवादियों और मज़दक़िस्म के समर्थको का संहार करने में लगे थे। इस काम मे उन्होंने ईसाइयों और अरबो की सहायता लेने में भी कोई परहेज नही रक्खा।

यही नही, पर्शिया की युद्ध मे हार हो जाने के बाद भी जब ज़ारोऐस्ट्रीअन लोग अरबों की दासता व इस्लाम स्वीकार करने के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे तब भी ज़ारोऐस्ट्रीअन लोगो मे एका नही था। पुरातनपंथियों ने उन लोगो को अरब से आये मुसलमानों के हाथों मरने व दास बनने दिया, जिनको वे विधर्मी ज़ारोऐस्ट्रीअन समझते थे। वे अपने ही लोगो को मरवाने में मुसलमानों की सहायता करते थे। इसी का ही परिणाम था ज़ारोऐस्ट्रीअन लोग कमजोर होते चले गए और 651 में पूरी तरह अरबो के दास व एक इस्लामिक राष्ट्र के नागरिक बन गए।

7वी शताब्दी में पर्शिया एक इस्लामिक राष्ट्र जरूर बन गया था लेकिन उसकी जनता का एक तरफा धर्मांतरण नही हुआ था। ज़रथुष्ट्री धर्म मानने वालों को धिम्मी का दर्जा दिया गया और दोयम दर्जे की नागरिकता दी गयी। लेकिन जो ज़ारोऐस्ट्रीअन इस्लाम कबूल कर लेता था उसको अरबी शासकों द्वारा सत्ता में शक्ति व समृद्धि देती थी। इस काल मे भी ज़ारोऐस्ट्रीअन लोग नही सुधरे, पुरातनपंथियों ने अपनी मनमुटाव व वैचारिक मतभेद का बदला लेने में मुस्लिम शासकों की मदद करने लगे और अपने ही धर्म वालो को मुस्लिमो द्वारा मरवाने, दास बनवाने और उनका बलात धर्मांतरण करने दिया।

उस काल मे दशकों के अंतराल में जो घटनाये, पर्शिया साम्राज्य के सम्राटों, वहां के ज़ारोऐस्ट्रीअन लोगो की गलतियों के कारण हुई थी उसी का परिणाम यह है कि 7वी शताब्दी में जो ज़ोरोअस्ट्रीयन पर्शिया छोड़ भारत आगये वे ही ‘पारसी’ के नाम से बचे और जो वहां रह गये, वे 8वी शताब्दी के आते तक सभी ज़ोरोअस्ट्रीयन मुसलमान बन गए।

बचा कोई भी नही, न पुरातनपंथी न ही सुधारवादी।

अब मेरे इस लेख में काल के अनुसार व्यवस्थाओं को बदल दे तो भारत व उसके हिन्दू के भविष्य को देखा व समझा जासकता है। आप ज़ारोऐस्ट्रीअन की जगह हिन्दू, पर्शिया की जगह भारत, पुरातनपंथी की जगह 2014 से पहले भारत की शासकीय व्यवस्था व तन्त्र से फलने फूलने वाला और हिन्दुओ में भगवा ओढ़े भेड़ियों का वर्ग, मज़दक की जगह नरेंद्र मोदी पढिये तो आपको लगेगा कि आप पर्शिया के 6वी शताब्दी के इतिहास को भारत के 21वी शताब्दी में जी रहे है।

भारत अपने भविष्य का निर्धारण 2019 में करेगा और उसी के साथ उसके हिन्दू का भी भविष्य भी निर्धारित हो जाएगा। यह कोई कपोल कल्पना नही है, यह इतिहास है जो घटनाओं की पुनरावत्ति पर हमेशा सत्य होता है। भारतीय हिन्दुओ द्वारा 2019 में लिया गया निर्णय यह तय करेगा कि मुझ ऐसे हिन्दू को पारसियों की यात्रा का अनुसरण करना है कि नही क्योंकि हिन्दुओ ही द्वारा हिन्दुओ का छल इस बार फिर चल गया तो उनके पास समय कम है। बचा पर्शिया में भी कोई नही था और बचेगा भारत मे भी कोई नही।

URL : Persia’s Zoroastrian of the 6th century and and 21st Century Hindus !

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