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गंगा जलमार्ग परियोजना: नरेंद्र मोदी को फिर से भारत का प्रधानमंत्री चुनने के लिये यही कारण है काफी!

गंगा जलमार्ग परियोजना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में गंगा नदी पर सागरमाला परियोजना के अंतर्गत, राष्ट्रीय जलमार्ग-1 पर पहले बने मल्टी मॉडल टर्मिनल का उद्घाटन किया है। इस जलमार्ग का विकास जहां साक्षात औद्योगिक परिवहन को सुगम व सस्ता बनायेगा, वही यह टर्मिनल प्रत्यक्ष रूप से 500 और अप्रत्यक्ष रूप से 2000 लोगों के लिये रोजगार का भी सृजन करेगा। गंगा नदी पर वाराणसी समेत कुल 4 मल्टी मॉडल टर्मिनल बनने हैं। शेष 3 साहिबगंज, गाजीपुर और हल्दिया में होंगे।

गंगा नदी पर विकसित मल्टी मॉडल टर्मिनल भारत के आर्थिक विकास को गति देने के लिये निर्मित आधारभूत संरचनाओ का महत्वपूर्ण भाग है। मूलतः यह इस उद्देश्य से विकसित किया जा रहा है ताकि भारत मे व्यवसाय व उद्योग के लिये अंतर्देशीय जलमार्गों का अधिकतम उपयोग हो, जहां परिवहन में सड़क व ट्रैन के सापेक्ष कम खर्चा आता है।

यह मल्टीमॉडल टर्मिनल जिस जलमार्ग-1 पर बना है। इसे विकसित करने के लिए भारत सरकार विश्व बैंक के साथ 50%-50% की साझेदारी में 5369 करोड़ की लागत आने का अनुमान है। वैसे तो इस परियोजना के साथ कई तकनीकी व सहयोगी योजनाओं के पहलू भी है जिस पर प्रकाश डाला जा सकता है लेकिन मैं यहां सिर्फ मोदी जी द्वारा जलमार्ग को अपनी प्रथमिकता बनाये जाने के कारणों पर लिखूंगा।

यदि व्यवसायिक द्रष्टिकोण से विश्व भर में अंतर्देशीय जलमार्गों के उपयोग किये जाने के बारे में पढ़े तो यह जानकर बेहद आश्चर्य होता है कि भारत मे इतनी बड़ी बड़ी नदियां होने के बाद भी पिछले दशकों में इसको विकसित किये जाने के बारे में कोई गंभीर प्रयास ही नही हुआ है। जलमार्ग द्वारा कच्चे एवं तैयार माल को भेजने से लॉजिस्टिक के कारण उत्पाद के खर्चो में जो कमी की जाती है उसके विश्व भर में इतने अध्ययन उपलब्ध होने के बाद भी नरेंद्र मोदी की सरकार की पूर्वर्ती सरकारों ने इस ओर कोई ध्यान नही दिया था।

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ऐसा भी नही है की सरकारों को जलमार्ग की व्यवसायिक उपयोगिता का ध्यान नही था बल्कि भारत मे जलमार्गों को विकसित करने के लिये, 1986 में ही भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (इनलैंड वॉटरवेस अथॉरिटी ऑफ इंडिया) की स्थापना हो गयी थी। प्रयागराज (इलाहाबाद) से हल्दिया तक गंगा नदी को जलमार्ग-1 के रूप में घोषित कर दिया था। जो सार्वजनिक आंकड़े उपलब्ध है उसके अनुसार प्रधिकरण ने 1986 में अपनी स्थापना से लेकर 2014 में मोदी सरकार के आने तक, करीब 28 वर्षो में 1200 हज़ार करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किये थे। लेकिन धरातल पर कोई भी प्रगति सामने नही आई थी।

हम लोग भारत की पूर्व में हुई प्रगति को इस बात से भी समझ सकते है कि एक तरफ जहां अमेरिका में जलमार्ग द्वारा 21% व्यापार होता है वही भारत मे .01% होता है।

आज के वैश्वीकरण के वातावरण में जहां विभिन्न राष्ट्रों के बीच व्यवसायिक स्पर्धा बड़ी प्रचंड है, वहां यह सोच कर बड़ा आश्चर्य होता है कि पूर्ववर्ती सरकारों के नीतिकारों ने अपने उत्पादों की कीमत कम रखने को कोई प्राथमिकता ही नहीं दी। जब कोई भी उत्पाद बिक्री के लिये, बाजार तक पहुंचाया जाता है तो उसके मूल्य में एक महत्वपूर्ण भाग लॉजिस्टिक (परिवहन इत्यादि) का होता है। एक तरफ उस उत्पाद में लगे कच्चे माल व उसको बनाने में लगी लागत लगभग स्थिर ही रहती है वहीं लॉजिस्टिक उसका एक ऐसा संभाग होता है जिसमें परिवर्तन किया जा सकता है। इसीलिये विकसित व विकासशील देशों ने अपनी आधारभूत संरचनाओं के विकास को प्राथमिकता पर रखा है क्योंकि इसके विकास का सीधा प्रभाव उत्पाद के लॉजिस्टिक पर होने वाले खर्चो पर पड़ता है। जितना यह सब विकसित होता है उतना ही उत्पाद की लागत में कमी भी आती है।

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इसको इस तरह से समझ सकते है कि भारत मे किसी भी उत्पाद पर लॉजिस्टिक में 18% खर्चा होता है, यही यूरोप में 12% और चीन में 10% होता है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि बाजार में जब चीन और भारत के किसी उत्पाद को लेकर अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा होगी तब चीन के उत्पाद के मूल्य में 8% का लाभ पहले से ही सन्निहित होगा अर्थात 8% सस्ता होगा। यह तो सभी को मालूम है कि चीन के आर्थिक विकास में सबसे बड़ा योगदान उसके उत्पादों का सस्ता होना है और इसको सस्ता उपलब्ध कराने में चीन के जलमार्ग संचार व्यवस्था का महती योगदान है।

आज तक चीन ने 1 लाख 10 हज़ार किलोमीटर का जलमार्ग विकसित किया है और उसपर 12 हज़ार करोड़ टन माल की आवाजाही होती है। इसके सापेक्ष भारत मे 4332 किलोमीटर ही जलमार्ग घोषित हुआ है और 7 करोड़ टन माल उससे जाता है। सत्य यही है कि पूर्ववर्ती सरकारों की उपेक्षा के कारण हम इस मामले में बेहद पिछड़ गये है। जिसे अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में परिवहन मंत्री नितिन गडकरी युद्धस्तर पर कार्य करते हुये, अन्तर्देशीय जलमार्गों को विकसित करने को तीव्र गति प्रदान कर रहे है।

यदि विभन्न राष्ट्रों के पिछले 170/180 वर्ष के ओद्योगिक विकास की श्रृंखला व उसमें योगदान देने वाले मूलभूत तत्वों को देखे तो इस निष्कर्ष में पहुंचेंगे की कोई भी राष्ट्र समृद्ध हो कर, जलमार्गों को विकसित नही करता है बल्कि विकसित जलमार्ग, राष्ट्र को समृद्धिशाली बनाता है। मैं नरेंद्र मोदी जी की भारत को लेकर परिकल्पना बहुत अच्छी तरह समझता हूँ। उन्होंने वह बात समझी है जो भारत के पूर्ववर्ती नेतृत्व समझने मे अक्षम थे। उनको भली-भांति संज्ञान है कि भारत मे विकसित जलमार्गों का तन्त्र जहां औद्योगिक परिवहन को प्रत्यक्ष रूप से सुगम बनायेगा वही अप्रत्यक्ष रूप से ईंधन, प्रदूषण व दुर्घटना में भारी कमी, भारत की आर्थिक व्यवस्था के भार को कम करेगी और उसका सीधा सकारात्मक प्रभाव भारत की आर्थिक अवस्था पर पड़ेगा।

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पीएम मोदी द्वारा भारत के विकास की जो धारा जलमार्गों द्वारा निकलती देखी है वो सब 2024 तक पूर्ण हो जायेगी। मोदी जी का 2019 से शुरू होने वाला दूसरा कार्यकाल ऐसा होगा जब भारत की आधारभूत संरचनाओ को लेकर जो उन्होंने काम शुरू किया था वह भारत के धरातल पर दीप्तिमान हो जायेगा और भारत को विश्व की ऊंचाई पर स्थापित करने के कालखंड का शुभारंभ हो जायेगा।

मेरे लिये, नरेंद्र मोदी जी को फिर से भारत का प्रधानमंत्री चुनने के लिये यही कारण काफी है।

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