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शिक्षा प्रणाली में कांग्रेस खेलती रही तुष्टिकरण का खेल!

पी आर बिशनोई। दरअसल बात शिक्षा के बारे में है जो किसी देश के सभी मूल्यों की नींव होती है चाहे वो सांस्कृतिक, नैतिक , धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक हो। और किसी देश की एकता, अखंडता को बनाए रखती है तथा भविष्य की दिशा तय करती है। मैं इस ‘शिक्षा या हिंसा’की बात को दुर्भाग्य ही कहूँगा क्योंकि मुझे धर्मविरोधी, राष्ट्रविरोधी, निकम्मी कांग्रेस समर्थित UPA (2004-14) का कुकृत्य पता चला कि देश में शिक्षा में बेहतर बदलाव के नाम पर अपनी नीति “बाँटो और राज करो” से जो जहर का बीज बोया था वह आज १२ वर्षों बाद एक वृक्ष के रूप में फल फूल रहा है। हालांकि ऐसी देशविरोधी सेक्यूलर शिक्षा की शुरूआत इंदिरा गाँधी के समय से हो चुकी थी जब वामपंथियों के साथ मिलकर भारतीय शिक्षा प्रणाली में घुसपैठ की थी।

2004 में कांग्रेस समर्थित UPA सरकार सता में आई। तब शिक्षा में बेहतर बदलाव के लिए Central Advisory Board of Education (CABE) का पुनर्गठन किया गया। जिसमें उप-समितियाँ भी गठित की गई। जिसके अध्यक्ष तत्कालीन मंत्री कपिल सिब्बल, सदस्यों में तिस्ता सितलवाड़, गोपाल गुरू,समितियों में योगेन्द्र यादव जैसे लोग थे। इस समिति ने NCERT के पाठ्यक्रम में व्यापक तौर पर बदलाव किए।

इस समिति ने १२th की “राजनीतिक विज्ञान” की पुस्तक “Politics in India Since Independence” में जो विषय शामिल किया गया उन पर गौर कीजियेगा :
* अयोध्या ‘ढाँचा’ और बाबरी ‘मस्जिद’
* इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिख-विरोधी ‘हिंसा’ और गुजरात में मुस्लिम-विरोधी ‘दंगें’
* “मूलनिवासी’ का विषय
* पूर्वी राज्यों द्वारा अलग होने की माँग
* कश्मीर में आजादी के लिए संघर्ष के साथ कश्मीर हिंदु पंडितों का इससे बचने के लिए पलायन

शिक्षा में बेहतर बदलाव के नाम पर वर्ग विशेष के तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति के द्वारा जहर के बीज बोए गए। कक्षा बारह की “राजनीतिक विज्ञान” की पुस्तक “Politics in India Since Independence” पृष्ठ संख्या 184 पर अयोध्या में राम मंदिर के लिए ‘ढाँचा’ का और 185 पर बाबरी के लिए ‘मस्जिद’ का जिक्र किया गया। जबकि सर्विदित है कि आक्रमणकारी बाबर ने राम मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाई थी और न्यायपालिका में यह मामला लंबित था। सवाल यह है कि कपिल सिब्बल जैसे कानूनविद के सानिध्य में गठित समिति ने यह विवादस्पद विषय त्रुटिवश लिया हो, बात गले नहीं उतरती!

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ठीक इसी तरह पृष्ठ संख्या 160 पर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिख-विरोधी दंगाें के लिए बड़ी चालाकी से सिख-विरोधी ‘हिंसा’ शब्द का जिक्र और पृष्ठ 187 पर गुजरात में 59 हिन्दू कार-सेवकों को जलाने के कारण उपजे दंगाें के लिए गुजरात में मुस्लिम-विरोधी ‘दंगें’ का प्रयोग किया गया है। जबकि कोर्ट ने अपने एक निर्णय में कहा था कि कार सेवको को जलाने के बाद गुजरात में दंगे भड़के थे। इन दंगों में कांग्रेस के कुछ नेताओं हाथ होना न्यायपालिका ने स्वीकारा था और मामला न्यायालय में लंबित था। कश्मीर में हिन्दू पंडितों को मुसलमानों द्वारा मारे जाने को कश्मीर की आजादी के लिए संघर्ष से उत्पन हिंसा से कारण कश्मीरी पंडितों का अपने बचाव के लिए पलायन का जिक्र किया गया है। और तथाकथित “मूलनिवासीयों का संघर्ष ” और पूर्वी राज्यों द्वारा भारत से अलग होने की माँग काे दर्शाया गया है।

ऐसे विषय जिनका न्यायपालिका से निर्णय आना बाकी था (2002 गुजरात दंगें और अयोध्या के राम मंदिर का मामला जो कि अभी तक लंबित है) उनको पाठ्यक्रम में शामिल कर, क्या न्यायपालिका के निर्णय को प्रभावित करने की कोशिश नहीं की गई ? क्योंकि शिक्षा में न्यायपालिका के निर्णय से पहले अपनी सोच के अनुसार कोई बात का कहना निर्णय को अवश्य ही प्रभावित करेगा क्योंकि इससे जनमानस में न्यायपालिका के निर्णय से पहले चंद लोगों के विचार को निर्णय मान लिया जाएगा कि ये NCERT की पुस्तक में लिखा है जो कि सरकार द्वारा प्रमाणित है। न्यायपालिका के निर्णय से पहले अपनी सोच के अनुसार किसी भी सांप्रदायिक हिंसा को धार्मिक दंगों के रूप में सरकार द्वारा शिक्षा में शामिल करना, क्या यह असंवैधानिक नहीं है ?

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सवाल सिर्फ न्यायपालिका तक सीमित नहीं है बल्कि उससे भी ऊपर है कि बच्चों की शिक्षा में सांप्रदायिक हिंसा को पढा़ना कहाँ तक उचित है ? यदि उचित है सिर्फ दो दंगें को पाठ्यक्रम में शामिल करना कितना तर्कसंगत है? इन दोनों दंगों से कांग्रेस अपना कौन सा राजनैतिक हित साधने में लगी हुई थी जिनमें एक दंगें को ‘हिंसा’ और दूसरे को ‘दंगा’ कहा गया। जबकि DNA की रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रत्येक वर्ष लगभग 700 दंगें होते है। यदि उचित है तो पाठ्यक्रम में यह क्यों नहीं शामिल किया गया कि ऐसी हिंसा को कैसे रोका जा सकता है या इससे कैसे बचा जा सकता है? सांप्रदायिक हिंसा को धार्मिक दंगों के रूप में पढा़ना कहाँ तक उचित है ?

शिक्षा में बेहतर बदलाव के नाम पर जहर रूपी हिंसा को दोगले रवैये से पढा़ना कहाँ तक उचित है? क्या देश में शिक्षा में बेहतर बदलाव के नाम पर सेक्यूलर शिक्षा देकर देश तोड़ने का काम नहीं किया जा रहा है ?आखिर कब तक बहुसंख्यक हिन्दू न्यायपालिका, कार्यपालिका, संविधान व अल्पसंख्यकों से बार-बार मारा जाता रहेगा ? कमी बहुसंख्यक हिन्दू में है जो खुद जातिवाद, भेदभाव, राजनीति के कारण बँटा हुआ है। हाँ मुझे ऐसा महसूस होता है कि हिन्दू स्वंय इन कारणों से बँटा हुआ है। जब मैं इन कारणों को मिटाने की कोशिश करता हूँ तो मुझे अपने घर से ही सामना करना पड़ता है, विरोध झेलना पड़ता है।

अब आप स्वयं विचार कीजिए की ये बुरी परंपरा को विरोध मुझे मेरे घर से झेलना पड़ रहा है तो ये किस प्रकार अपनी जडे़ं जमा चुकी होगी। मेरा निर्णय अटल है मैं बुरी परंपराओं का उन्मूलन मेरे घर से जरुर करूँगा होगी भी क्योंकि पंथ की सर्वमान्य पुस्तक में ऐसी बाते है ही नहीं। वर्तमान NDA सरकार को आए हुए लगभग तीन वर्ष होने जा रहे हैं। जो दल से बडा़ देश को मानती है तो वे क्यों इस तरफ अपना ध्यान नहीं देती शिक्षा प्रणाली में बदलाव कराती?

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नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। IndiaSpeaksDaily इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति उत्तरदायी नहीं है।

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