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यदि आरएसएस के खिलाफ खबर सही है और आउटलुक झूठा नहीं है तो फिर वह डर क्यों रहा है?

वर्तमान समय सचमुच डरा रहा है! जिस तरीके से अंग्रेजी व वामपंथी मीडिया वर्तमान केंद्र सरकार, संघ परिवार और उससे जुड़े संगठनों के खिलाफ बिना किसी बुनियाद के प्रोपोगंडा चला रहा है, वह साफ तौर पर एजेंडा जर्नलिज्म का हिस्सा है! अंग्रेजी व वामपंथी मीडिया की दिक्कत यह है कि वह अपने लिए तो अभिव्यक्ति की आजादी की वकालत करता है, लेकिन दूसरे की अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलना चाहता है! अंग्रेजी आउटलुक यही कर रहा है!

वर्तमान में आउटलुक ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर ‘आॅपरेशन बेबी लिफ्ट’ नामक एक कवर स्टोरी की! हर तरह की स्टोरी करना मीडिया की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और इसे सभी मानते हैं! लेकिन स्टोरी में जिसकी मानहानि की गई है, उस व्यक्ति या संस्था को भी यह अधिकार है कि वह इसे चुनौती दे सके! आरएसएस ने इस कवर स्टोरी को झूठ करार देते हुए एक प्राथमिकी दर्ज कराई है और यह आरएसएस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है! लेकिन आरएसएस के इस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से आउटलुक और उसके संपादक कृष्णा प्रसाद को आपत्ति है! इसे ही अंग्रेजी और वामपंथी मीडिया का दोगलापन कहते हैं!

आउललुक ने 29 जुलाई की अपनी कवर स्टोरी ‘आॅपरेशन बेबी लिफ्ट’ नाम से की, जिसमें आरएसएस पर यह आरोप लगाया गया कि वह ‘मानव व्यापार’ में संलिप्त है! इस खबर में यह दर्शाया गया कि संघ परिवार ने 31 लड़कियों की तस्करी आसाम से बाहर की है! संघ परिवार पर हर तरह से हमला करने को तैयार अंग्रेजी मीडिया, वामपंथी बुद्धिजीवी और कांग्रेस पार्टी ने इसे हाथों-हाथ लिया! आरएसएस ने इस पूरी खबर को मानहानि मानते हुए आसाम में आउटलुक के खिलाफ एफआईआर करवाया है। एफआईआर करवाते ही आउटलुक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत उल्टी दिशा में मुड़ गई और उसने इसे पत्रकारिता पर हमला करार दिया! दिल्ली के अंग्रेजी पत्रकार एक सुर में इसे पत्रकारिता पर हमला करार देने के लिए चिल्ला उठे!

आउटलुक के संपादक कृष्णा प्रसाद ने एक अंग्रेजी वेबसाइट को साक्षात्काार दिया, जिसमें उन्होंने कहा- ‘यह पत्रकारिता पर हमला है। यह ट्रेंड मैंसेंजर को शूट करने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। राष्ट्र फासिवाद की ओर बढ़ रहा है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरा है!’ अब सवाल उठता है कि कृष्णा प्रसाद और उनकी पत्रिका किसी की मानहानि करें तो वह फ्री स्पीच है, लेकिन जब उसी फ्री स्पीच पर चलते हुए मानहानि का शिकार व्यक्ति या संस्था उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत करे तो यह फासीवाद हो जाता है! कृष्णा प्रसाद यह आपका कैसा दोगलापन है? कौन कितना सही है और कितना गलत, इसका निर्णय तो अदालत करेगी! लेकिन अदालती निर्णय से पहले ही पीड़ित संस्था को अपना अपना पक्ष स्पष्ट नहीं करने देना, उसे कानून की शरण में नहीं जाने देना- यह कृष्णा प्रसाद की फासिवादी सोच है, जो आउटलुक और उसके दोगले साथी अपना रहे हैं!

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यह कोई पहली बार नहीं है! बल्कि वाजपेयी सरकार को बदनाम करने और गिराने के लिए उस दौर में कांग्रेसी पत्रकारिता करने में आउटलुक और तहलका सबसे आगे रहा था! दरअसल वामपंथी सोच कभी भी एक राष्ट्रवादी सरकार को बर्दाश्त नहीं कर पाती है, इसलिए जब भी कांग्रेस के उलट कोई सरकार, खासकर भाजपा की सरकार आती है, आउटलुक, तहलका, इंडियन एक्सप्रेस, एनडटीवी एवं अन्य वामपंथी व अंग्रेजी पत्रकारिता उसे बदनाम करने और उसे गिराने की साजिश में जुट जाते हैं!

आउटलुक वैसे भी एक कांग्रेसी बिल्डर और बिजनसमैन का खड़ा किया साम्राज्य है, जिसका हित कांग्रेस सरकार में ज्यादा जुड़ा है! अभी हाल ही में गांधी परिवार की बपौती वाली ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र’ का अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय जी को बनाया गया! आउटलुक ने उनके खिलाफ भी साजिश की और उनके सामान्य बातचीत को साक्षात्कार बनाकर छाप दिया! रामबहादुर राय जी ने जब इस पर सवाल उठाया तो वहां भी अपने लिए यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत करने लगा, लेकिन जब इसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर सामने वाला इनसे सवाल पूछने लगता है तो यह तत्काल इसे पत्रकारिता पर हमला करार देते हैं!

लेनिन व स्टालिन की मानसिकता के लोग, जो अपने लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए चिल्लाते तो हैं, लेकिन दूसरे को यही स्वतंत्रता देना नहीं चाहते! यह फ्री स्पीच को एकतरफा ट्रैफिक पर दौड़ाए रखना चाहते हैं। अभी हाल ही में एनडीटीवी के प्रणव राय ने पूर्व सूचना प्रसारण मंत्री अरुण जेटली से आॅन स्क्रीन सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने की मांग की, उसी एनडीटीवी के रवीश कुमार जो रोज ज्ञान बांचते रहते हैं, पूरे सोशल मीडिया को गुंडा तत्व से भरा करार देते हैं! चूंकि सोशल मडिया ने हर मोबाइल धारक जनता को यह ताकत दे दिया है कि वह इन एक तरफा अभिव्यक्ति की वकालत करने वालों से सवाल पूछे, और यही यह नहीं चाहते हैं! इसीलिए न तो आरएसएस के द्वारा प्राथमिकी दर्ज कराना इन्हें पसंद आता है और न ही इनके विचारधरा के उलट विचारधारा वालों का प्रश्न इन्हें सहज रख पाता है! पूरे इतिहास को उल्टा कर देख लीजिए, वामपंथी विचारधरा से दोगली विचाराधा कहीं नजर नहीं आएगी!

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दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल पांडेय कहते हैं, अगर हम वाकई पत्रकारों का हित चाहते हैं तो हमें विचारधारा के खेंमे से निकल कर सोचना होगा। आउटलुक पत्रिका की आरएसएस पर विवादित स्टोरी के मामले में अनिल पांडेय ने सुझाव दिया कि यह मामला पत्रकारिता के किसी तरह के उत्पीड़न का नहीं है। अकसर अखबारों और मीडिया घरानों पर गलत स्टोरी का आरोप लगा कर लोग मुकदमें दर्ज कराते रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है। आरएसएस ने भी आउटलुक के बारे में गलत और भ्रामक स्टोरी प्रकाशित करने को लेकर मामला दर्ज कराया है। यह किसी का भी कानूनी हक है। कोई भी संस्था ऐसा कदम उठा सकती है। फैसला अदालत करेगा कि कौन सही है कि कौन गलत। इसलिए इसे अदालत पर छोड़ देना चाहिए। उन्होंने कहा कि आउटलुक की विश्वसनीयता संदिग्ध है। पहले भी वह विवादों में रही है। प्रसिद्ध पत्रकार राम बहादुर राय ने भी इस पर उनका फर्जी इंटरव्यू छापने का आरोप लगाया था।

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