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अपनी किताब की मार्केटिंग के लिए शहरी नक्सलियों के बचाव में उतरे रामचंद्र गुहा!

गांधी के नाम पर पहले ही दो किताबें ‘इंडिया आफ्टर गांधी ‘ तथा ‘गांधी बिफोर इंडिया’ लिख चुके इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने एक बार फिर नई किताब ‘गाँधी: दि ईयर दैट चेंज्ड दि वर्ल्ड (1914-1948)’ लिखी है। यह 2 अक्टूबर 2018 को न्यूयार्क में लॉन्च होगी। लगता है गांधी उनके लिए वह गाय है जिसके सहारे अपनी किताब की बैतरणी पार कराते रहे हैं। लेकिन इस बार अपनी नई किताब की जिस प्रकार मार्केटिंग की है इससे मार्केटिंग मैन के रूप में उनकी एक नई छवि सामने आई है। उन्होंने गिरफ्तार नक्सल समर्थकों के समर्थन में गांधी के नाम का उपयोग किया है।

उन्होंने गांधी नाम का उपयोग अपने साथी नक्सल समर्थकों के लिए नहीं बल्कि अपनी किताब की मार्केटिंग के लिए किया है। इस तरह उन्होंने विशुद्ध रूप से अवसरावादी होने का परिचय दिया है। गिरफ्तार अपने साथी नक्सल समर्थकों को लेकर उन्होंने ट्वीट में लिखा है कि अगर आज गांधी होते तो वे खुद वकील का काला चोंगा पहनकर कोर्ट में खड़े हो गए होते। अब सवाल उठता है कि जो गांधी जीते जी भगत सिंह जैसे देशभक्त के लिए कोर्ट में अर्जी तक नहीं दे पाए क्या वे देशविरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में कई बार जेल जा चुके इन नक्सली समर्थकों के पक्ष में कोर्ट जाते?

गांधी स्वयं नक्सली समर्थकों को बचाने कोर्ट में जाते कि नहीं जाते इसका उत्तर अब तो मिलेगा भी नहीं लेकिन रामचंद्र गुहा, रोमिला थापर सरीखे इतिहासकार जरूर गांधी को नक्सलियों का प्रेरक और संरक्षक बता देंगे? और यह अच्छा भी होगा। किताब की रिलिज करने की तारीख तय करने से पहले जिस प्रकार नक्सली समर्थकों की गिरफ्तारी का फायदा उठाने की कोशिश की गई है शायद गांधी इस अवसरवाद का शायद ही समर्थन करते हैं। लेकिन ये लोग इतने निर्लज्ज है कि अपनी किताब की मार्केटिंग के लिए कोई भी हथकंडा अपनाने से बाज नहीं आते हैं ।

जो रामचंद्र गुहा अपनी किताब के लिए गांधी और नक्सल समर्थकों का सहारा ले रहे हैं, क्या वे बता सकते हैं कि सोनिया गांधी नियंत्रित पूर्व प्रधानमंत्री डॉं मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान गिरफ्तार नक्सली समर्थकों के लिए कितनी बार गांधी को वकील का काला चोंगा पहनाया था और उन्हें कोर्ट भेजा था। गांधी के नाम पर नई किताव समेत तीन नामी किताब लिख चुके रामचंद्र गुहा बता सकते हैं कि क्या गांधी भी इसी प्रकार के अवसरवादी थे? क्या गांधी भी इन्हीं की तरह अपनी किताब की लॉन्च की तारीख केंद्र में सत्तासीन पार्टी के आधार पर तय करते? क्या वे इस बात के लिए इंतजार करते कि उनकी किताब कब बिकेगी या कब नहीं बिकेगी? रामचंद्र गुहा जी कब तक गांधी का नाम बेचकर खाओगे, समय बदल रहा है समाज बदल रहा है साथ ही साथ देश बदल रहा है। समाज को बांटकर अपना उल्लू सीधा करना छोड़ कर समाज और देश को जोड़ने के लिए अगर गांधी को भी छोड़ना पड़े तो छोड़ो।

URL: Ramchandra Guha in the defense of the urban naxals for marketing his book on mahatma gandhi

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