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रविशंकर प्रसाद ठीक कहते हैं, अधिसंख्य मुसलमान भाजपा को वोट नहीं करते! राष्ट्र और राष्ट्रवाद के साथ दुनिया में कहीं भी मुसलमान खड़े नहीं हैं!

यदि आप सेक्यूलर या मजहबवाद से पीडि़त हैं तो इस लेख को न पढें! चूंकि मैं सेक्यूलर नहीं हूं, इसलिए पाखंडी बातें भी नहीं लिखता। यह लेख सेक्यूलरों व मजहबियों को चुभ सकता है! आखिर क्या कारण है कि इस देश के कुछ ठेकेदारों ने बाबर को पैगंबर बना डाला है? जैसे मक्का-मदीना का वजूद बिना पैगंबर मोहम्मद के नहीं है, वैसे ही अध्योग्या राम के बिना अधूरी है। याद रखिए, बाबर मुसलमानों का पैगंबर नहीं था, वह एक विदेशी आक्रांता था, इसे जब यहां के मुसलमान समझ जाएंगे, तभी गंगी-यमुनी तहजीब स्थापित होगी, अन्यथा यह केवल किताबी बातें हैं। इसे रटते-रटते सदियां गुजर गई, मजहब के आधार पर देश बंट गया और तब भी कोई समाधान नहीं निकला!

मैं सेक्यूलर नहीं हूं, इसलिए पाखंडी बात नहीं लिखूंगा। और यह अच्छा है कि आजकल लोग सीधे बोलने लगे हैं, पाखंड में लिपटी चासनी को अब जनता ठुकरा रही है। कल केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ठीक कहा कि ‘मुसलमान भाजपा को वोट नहीं करते, इसके बावजूद भाजपा उनका हर तरह से सम्मान करती है।’ थोड़े-बहुत राष्ट्रप्रेमी मुसलमानों को छोड़ दें तो रविशंकर प्रसाद की यह बात एकदम से ठीक है। मुसलिम समाज के लिए मजहब पहले है और राष्ट्र व विकास बाद में। और यही कारण है कि वह दुनिया के किसी भी हिस्से में राष्ट्रवादी पार्टी को वोट नहीं करती, इसलिए भारत में भी बेहद कम मुसलमानों का वोट भाजपा को मिलता है! भाजपा का मूल चरित्र राष्ट्रवाद है, इसे समझने की जरूरत है। हिंदुत्व व राष्ट्र एक है, उसमें कहीं कोई विरोधभास नहीं है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(RSS) के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर जी की जीवनी अभी हाल ही में प्रभात प्रकाशन से छपी है। इस पुस्तक को लिखने के दौरान मैंने शोध में पाया कि इस देश पर हमला करने के लिए मजहब को आधार बनाकर अफगानिस्तान के बादशाह को एक मुस्लिम बुद्धिजीवी ने बुलाया गया था कि आओ, यहां काफिरों का नाश करो और इस्लामी राज्य स्थापित करो! क्या कोई नागरिक विदेशी शासक को पत्र लिखकर अपने देश पर हमला करने के लिए बुलाएगा, वह भी एक मजहबी राज्य स्थापित करने के लिए? लेकिन औरंगजेब की मृत्यु के बाद इस्लामी विद्वान, जी हां, कोई शासक नहीं, बल्कि इस्लामी स्कॉलर शाह वलीउल्लाह ने अफगानिस्तान के शासक अहमद शाह अब्दाली को पत्र लिखकर हिंदुस्तान पर हमला करने को कहा था। यह पूरा पत्र आप मेरी पुस्तक प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित ‘हमारे गुरुजी’ में पढ़ सकते हैं। यानी मजहब पहले और राष्ट्र बाद में, मुसलमानों की सदियों से यही विचारधारा है!

इसके कुछ समय बाद भारत को दारुल हर्ब घोषित कर जेहाद का नारा दिया गया था। और आप जानते हैं यह जेहाद का नारा आज के उत्तरप्रदेश के रायबरेली से दिया गया था। सैयद अहमद बरेलवी ने हजयात्रा की और वहीं अरब में भारत को दारुल इस्लाम बनाने की योजना बनी। उसके बाद महाराजा रणजीत सिंह के खिलाफ लंबे समय तक जेहाद की लड़ाई चलती रही थी। जेहादी युद्ध हुए, जिसकी जानकारी इतिहास की पाठ्य पुस्तकों से गायब कर दी गई है।

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भारत में सुन्नी बहावियों के कट्टरपंथ का विकास, आजादी से पूर्व अलीगढ़ मुसलिम विश्विद्यालय का जेहादी फैक्टरी में तब्दील होना, भारत विभाजन की परिस्थिति और विभाजन का असली कारण-सबकुछ आपको मेरी पुस्तक में मिलेगा। आप पढ़ेंगे तो पाएंगे कि मुसलमानों का बड़ा तबका शुरू से हिंदुस्तान को अपना देश नहीं मानने की मानसिक जड़ता में जीता रहा है और जब आप एक राष्ट्र को राष्ट्र नहीं मानेंगे तो राष्ट्रवादी पार्टी को वोट कहां से देंगे?

भारत में मार्क्सवादी व नेहरूवादी इतिहासकारों द्वारा यह झूठ भी बोला गया कि जिन्हें पाकिस्तान चाहिए था, वो पाकिस्तान चले गए। यह सरासर झूठ है। 1946 का पूरा चुनाव परिणाम मेरी पुस्तक में है। देखिए तो पता चलेगा कि आज का जो पाकिस्तान है, उसने कभी बंटवारा चाहा ही नहीं था। बंटवारा तो उप्र, बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र, उड़ीसा आदि के मुसलमानों ने चाहा था। जिन्ना को इन प्रदेशों के मुसलमानों ने बहुमत दिया था। लेकिन अपनी संपत्ति बचाने के लोभ में वो यहीं रह गए। ऐसे में इनके लिए मजहब से बड़ा राष्ट्र होगा, क्या माना जा सकता है?

कांग्रेस, सपा, बसपा, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, लालू यादव जैसे मुसलिम तुष्टिकरण पर टिकी पार्टियों व नेताओं का चरित्र देखिए, उन्होंने मुसलमानों को हमेशा मजहबी झुनझुना पकड़ाया है, विकास नहीं दी है, इसके बावजूद यदि मुसलमान उनको वोट देते रहे हैं तो केवल और केवल मजहबी आधार के कारण, न कि विकास के लिए!

मुसलमानों के लिए विकास बड़ा मुद्दा होता तो सच्चर कमेटी की रिपोर्ट इनकी दयनीयता बयान नहीं करती? मुसलमानों ने तो हमेशा अपनी पसंद की पार्टियों को वोट दिया है तो क्या कारण है कि उनका विकास नहीं हो सका? और क्या कारण है कि वो आज तक सवाल नहीं पूछ रहे हैं? कश्मीर में 265 मंदिरों को तोड़ना, 3 लाख कश्मीरी पंडितों को वहां से मार कर भगा देना, हर शहर में एक नो-एंट्री जोन का निर्माण करना, ज्यादातर मुसलिम जनसंख्या वाली जगह से अल्पसंख्यकों को पलायन के लिए मजबूर करना, इनकी जनसंख्या की अधिकता वाली जगह पर अपराध का पनपना, समाज में आई कुरीतियों के लिए कभी कोई आंदोलन नहीं चलाना, महिलाओं पर ज्यादती, बात बात में मजहब की दुहाई देना, संगीत, कला, सिनेमा सभी से इस्लाम के खतरे में पड़ने का नारा पीटना, एक देश-एक कानून को लागू न होने देना-आखिर यह सब क्या है?

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भारत में मुसलमानों से बेहद कम जनसंख्या पारसियों और यहूदियों का है। यह मजहब भी भारत में बाहर से आए हैं, इसके बावजूद वो तो बात-बात में मजहब की दुहाई नहीं देते? मजहबी मांग नहीं करते? एक दरबे में दुबके नहीं रहते? आजादी की मांग नहीं करते? उनके बीच से तो कोई दाउद, कोई याकूब, कोई बुरहान वानी नहीं निकलता? तो फिर मुसलमान ही क्यों? देश के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल ने मौलाना आजाद से यही प्रश्न पूछा था और आजादी के 70 साल बाद भी यही प्रश्न खड़ा है। मुसलमान जब तक राष्ट्र और राष्ट्र की मुख्यधारा से खुद को नहीं जोड़ते, न तो उनका मानसिक विकास हो सकता है और न ही उनका भौतिक विकास।

आज मुसलमानों के एक बड़े वर्ग के मजहबी रहनुमा बने उप्र के पूर्व मंत्री आजमखान ने मुसलमानों की कब्रों को खोदकर उस जमीन पर कब्जा कर लिया है। पश्चिम में कोई कार्टून बनने पर, बर्मा में रोहिंग्या मुसलमानों पर हमला होने पर अपने ही देश भारत में अपने पड़ोसी हिंदुओं पर हमला करने वाले, आजाद मैदान में शहीदों का अपमान करने वाले आज क्यों नहीं उतरते आजम खान के खिलाफ? क्या इसलिए कि वह मुसलमान हैं? फिर कहां गया आपका कुराना, आपकी इबादत, आपके पैगंबर की शिक्षा, जिसमें कहा गया है कि एक मुसलमान कब्र में तब तक लेटा है, जब तक कि कयामत नहीं आ जाती। कयामत के बाद पैगंबर मोहम्मद सबको लेकर अल्लाह के पास जाएंगे और उनकी वकालत करेंगे। उस वकालत के आधार पर ही जन्नत और दोजख का फैसला तय होगा। पैगंबर मोहम्मद ने कभी लाउडिस्पीकर लगाने को तो नहीं कहा, लेकिन उसके लिए मुसलमान बवाल मचाते हैं और कब्र में सोए अपने भाईयों की अस्थियां फिंकवाने वाले के खिलाफ चुप्पी साध जाते हैं! इससे पहले गुजरात में तीस्ता सीतलवाड़ ने मुसलमानों का कब्र खोद डाला था, लेकिन वह भी मुसलमानों के आंखों का तारा बनी रही! यह पाखंड ही इस देश के दूसरे समाज के लोगों को अब चुभ रहा है और देख लीजिए, आज आपके वोटों के बिना बहुमत की सरकारों बन भी रही है और चल भी रही हैं!

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इसे जितना जल्दी मुसलमान समझ सकेंगे, उतनी ही शीघ्रता से समाज में सह अस्तित्ववादी राजनीति की शुरुआत हो सकेगी। गंगा-जमुनी तहजीब सिर्फ कहने के लिए है! यदि यह सच होता तो मुसलमान राम मंदिर का विरोध कभी नहीं करते! जैसे मक्का-मदीना का वजूद बिना पैगंबर मोहम्मद के नहीं है, वैसे ही अयोध्या राम के बिना अधूरी है। पहल कीजिए! आइए, हिंदुओं के साथ मिलकर वहां राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कीजिए! याद रखिए, बाबर आपका खुदा या पैगंबर नहीं, वह एक विदेशी आक्रांता था! राम और यहां के हिंदू आपके अपने हैं, इसे आप कब समझेंगे?

मैं आह्वान करता हूं, आइए, देश के विकास में भागीदार बनिए! आपके पासपोर्ट, आधार कार्ड, वोटर आई कार्ड- सब पर भारत लिखा है, सउदी अरब या पाकिस्तान नहीं- इसे जब आप समझ जाएंगे, तभी हम-आप मिलकर इस देश को संवार सकेंगे। हज यात्रा पर आप जाते हैं न? तो देखिए, वहां भारतीय मुसलमानों को इंडियन की श्रेणी में ही रखा जाता है। मुसलमानों से अधिक वहां, एक भारतीय के रूप में आपकी पहचान है-इसे याद कर लीजिए और अपने बच्चों के भविष्य के लिए देश और देश के विकास के साथ चलिए! छोडि़ए अतीत को, आइए भविष्य संवारें!

‘हमारे गुरुजी’ पुस्तक आपको संघ, भारत छोड़ो आंदोलन का सच, भारत विभाजन की मानसिकता का विकास और मूल कारण, कश्मीर समस्या की असली वजह, गांधी हत्या और षड्यंत्र, हिंदू राष्ट्र-जैसे अनेक प्रश्नों का तथ्यपरक उत्तर देगी, ऐसा मुझे विश्वास है। इस पुस्तक को आप- 7827007777 पर फोन कर कैश-ऑन-डिलीवरी, या वीपीपी से छूट सहित प्राप्त कर सकते हैं।

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Sandeep Deo

Sandeep Deo

Journalist with 18 yrs experience | Best selling author | Bloomsbury’s (Publisher of Harry Potter series) first Hindi writer | Written 8 books | Storyteller | Social Media Coach | Spiritual Counselor.

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