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फ़रेब का सहारा लेकर नफरत मत कीजिये जनाब बड़े पत्रकार!

नफरत किसी के खिलाफ मत पालिए। अँधा विरोध किसी का मत कीजिये। जिसे आप पसंद नहीं करते उसके खिलाफ आपका फर्जीवाड़ा उसे बड़ा बना देता है। हिंदी पट्टी का एक पत्रकार सोशल मीडिया पर आपके विरोध के कारण डर कर भाग गया था। लेकिन आज के दौर में कोई भी बड़ा से बड़ा संपादक सोशल मीडिया के बिना रह नहीं सकता, तो वो भी वापस आ गया। उसी सोशल मीडिया पर जिसे वो पानी पी कर गाली देता था।

आज देखता हूँ सोशल मीडिया में उसके पोस्ट पर उसे महिमामंडन से कई गुना ज्यादा गाली होती है लेकिन वो मासूम बन कर डटा है! भाग नहीं रहा। बल्कि सच कहिये तो आज वो प्यार और नफरत के बीच सबसे चर्चित पत्रकार है और यही उसकी कमाई है जिसका वो आनँद ले रहा है।

नफ़रत में कुछ लोग उसके खिलाफ फ़र्ज़ी फोटोशॉप करते है। झूठ, झूठ होता है। सोशल मीडिया के दौर में ये ज्यादा देर नहीं टिकता फिर वो बड़ा हो जाता है जिसे आप पसंद नहीं करते। झूठ के पाँव नहीं होते। यहाँ तो उसका वजूद ही कुछ पल का होता है। देखिये कुछ मक्कारो, फरेबियों ने उसके खिलाफ फर्जी ट्वीटर पोस्ट बनाया वो सफाई देने आया की उसने पीएम को गुंडा नहीं कहा।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल रिपोर्ट के मुताबिक एसआईटी ने कहा था कि दिल्ली की मीडिया गुज़रात के मुख्यमंत्री के खिलाफ पूर्वाग्रह से ग्रस्त रही है। एक राष्ट्रिय टीवी चैनल और बड़े हिंदी दैनिक ने फ़र्ज़ी खबर चलाई की मोदी ने गुजरात दंगा पर कहा “क्रिया के बराबर प्रतिक्रिया होती है”। जाँच के बाद माफ़ी मांग ली लेकिन हवा में आज भी मीडिया की वो आवाज जनता के बीच है। क्योंकि माफीनामा अख़बार के अंदर के पेज में सिर्फ अहमदावाद संस्करण में छपा। जबकि उस अखबार की खबर को बाद में सभी अखबार ने अपनी खबर बना कर चलाया जैसे उस बड़े अंग्रेजी दैनिक ने एक हिदी
टीवी चैनल के काट कॉपी पेस्ट वाले इंटरव्यू को अपनी खबर बना दी थी। टीवी ने अपनी गलती आयोग के सामने स्वीकार ली लेकिन,सफाई देश के सामने नहीं आई।

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बीजेपी को भी मीडिया का यह फर्जीवाड़ा अपने पक्ष में लगा तो उसका कोई भी प्रवक्ता कभी इस पर कुछ नहीं बोला। यही सच है। जाफरी के बेटी के गर्भ से बच्चा निकलने की फ़र्ज़ी खबर भी इनने मान लिया की गलत थी। पर आज तक किसी अखबार ने टीवी ने सफाई नहीं दी इन खबरों पर।

अब सोशल मीडिया के ज़माने में ये सफाई दे रहे है पीएम को गुंडा नहीं कहा! जब की करीब करीब यही कहा था! लेकिन ये पूरा सच नहीं है। तो जानिये की फ़रेब का जमाना चला गया। जनता के मीडिया के इस दौर में पत्रकारिता किसी की बपौती नहीं। तो जो बोलता है बोलने दिया जाय। वो अपने एजेंडे पर है। सच की लड़ाई तभी लड़ी जा सकती जब आप सच के साथ होंगे। वरना फ़रेब को शक्ति देंगे और खुद इन फरेबियों की तरह बेनकाब होंगे।

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