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लक्ष्मी बम से ‘बम’ शब्द हटाया लेकिन दर्शक का गुस्सा बरक़रार है

अक्षय कुमार ने दर्शकों के विरोध से घबराकर अपनी फिल्म का नाम बदल दिया है। अब उनकी फिल्म का नाम लक्ष्मी बम के बजाय लक्ष्मी होगा। अक्षय कुमार की ये फिल्म डिज़्नीप्लस पर रिलीज हो रही है। अक्षय कुमार चाहते हैं कि अब दर्शक उनकी फिल्म देखें क्योंकि उन्होंने इसमें से बम शब्द हटा दिया है।

क्या अक्षय कुमार को लगता है कि रूठे हुए दर्शकों को मनाना इतना आसान होगा? क्या दर्शकों की नाराज़गी केवल इसलिए थी कि अक्षय की फिल्म में लक्ष्मी के साथ बम जुड़ा हुआ था। अक्षय कुमार तथ्यों को जानबूझकर अनदेखा कर रहे हैं। क्या वे भूल गए कि दर्शकों की उनसे नाराज़गी की असली वजह क्या थी।

सुशांत सिंह राजपूत की हत्या पर एक माह तक अपनी चुप्पी को वे भूल गए। फिल्म में लव जेहाद का  एंगल भी वे भूल गए। वे ये भी भूल गए कि देश के सबसे ख्यात पत्रकार अर्नब गोस्वामी के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट जाने वालों में वे और उनका हरिओम प्रोडक्शन भी शामिल था।

अक्षय कुमार को अपनी फिल्म की कितनी चिंता है कि वे रिलीज से दस दिन पूर्व इसका नाम बदलने को तैयार हो गए। हालांकि उनको फिल्म चलानी है तो डबिंग भी फिर से करनी पड़ेगी। फिल्म में उन्होंने अपना नाम आसिफ रखा है, जिस पर दर्शकों को घोर आपत्ति है। क्या वे डबिंग कर इस नाम को भी बदलेंगे।

चलिए आपने डबिंग में नाम भी बदल दिया तो क्या फिल्म चल सकेगी। क्या अक्षय कुमार सीबीआई से मांग करेंगे कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के केस को हत्या के एंगल से जाँच करें। क्या वे हाईकोर्ट में अर्नब के खिलाफ दी गई सामूहिक याचिका से अपना नाम हटाने की कोशिश करेंगे। अक्षय कुमार कैसे सोच सकते हैं कि फिल्म के शीर्षक से बम शब्द हटा देने भर से दर्शक उन पर फिर से सिक्कों की बरसात कर देंगे।

अक्षय कुमार को पता करना चाहिए कि सुशांत की हत्या के बाद उनके जैसे फ़िल्मी सितारों की बेईमानी ने फिल्मों के प्रति दर्शकों के मन में कितनी घृणा भर दी है। अक्षय ही क्यों, अन्य फिल्म निर्माता भी अपनी फिल्मों की रिलीज की बड़ी तैयारी कर रहे हैं।

वे दर्शकों के आक्रोश को समझना ही नहीं चाहते हैं। अपने दर्शकों से बहुत दूर बैठे ये फिल्मकार समझ नहीं पा रहे हैं कि अब माहौल सर्वथा उनके विपरीत हो चला है। अक्षय कुमार जैसे सितारें ये क्यों नहीं समझते कि उन्हें अपनी फिल्म लेकर दर्शक की अदालत में पेश होना है।

माहौल ऐसा बन चुका है कि अगले एक वर्ष तक शायद ही किसी फ़िल्मी सितारे को जनता की कोर्ट से जमानत मिल सकेगी, रिहाई तो दूर की बात है। लक्ष्मी को घर बुलाने के लिए अक्षय ने अपनी फिल्म से बम शब्द हटा लिया है लेकिन इस वर्ष लक्ष्मी बॉलीवुड के दरवाज़े नहीं जाएगी। जिन दरवाजों पर खून के धब्बे और नशे के चिराग जलते हो, वहां लक्ष्मी कैसे पधारेगी।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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1 Comment

  1. Deepak Hindu says:

    इसतरह के फिल्म मुस्लिमो/ क्रिस्चियन में हिन्दू धर्म के प्रति गलत चित्र बनाते है फिर पालघर में साधुओ को बच्चा चोर समजा जाता है

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