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भारतीय दर्शन और संस्कृति की सनातन परम्परा को पुनर्जीवन दे रहे हैं प्रो. ऋषिकांत पाण्डेय

आदित्य जैन । वर्तमान समय में भारत के विश्वविद्यालयों में ऐसे शिक्षक दुर्लभ हैं जो अपने विद्यार्थियों से असीम प्रेम करते हो , अपने विषय के प्रकांड विद्वान हो तथा भारतीय दर्शन और संस्कृति को अपने आचरण में साक्षात् प्रकट करते हो। इलाहाबाद ( प्रयाग ) विश्वविद्यालय के दर्शनशास्र विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष और वर्तमान में प्रोफेसर ऋषिकांत जी का व्यक्तित्व कुछ ऐसा ही है । प्रोफेसर नामक शब्द को हिंदी भाषा में ‘ आचार्य ‘ कहा जाता है । आचार्य का अर्थ है – ‘ अपने आचरण से शिक्षा देने वाला ‘ । भारतवर्ष की सनातन परम्परा के अंतर्गत आचार्य अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से ही अपने शिष्यों को शिक्षा प्रदान करते थे। आचार्य का व्यक्तित्व इतना अधिक तेजस्वी होता था कि प्रत्येक शिष्य अपने आचार्य की तरह बनना चाहता था।

तेजस्विता का प्रयोग एक विशेष संदर्भ के लिए किया जाता है। तेजस्विता का तात्पर्य है – जिसके सम्मुख दुष्ट भी अपनी दुष्टता को त्यागकर विनयशील हो जाता है या शांत हो जाता है । दुष्ट को शांत तो तेजस्विता कर देती है , लेकिन उसके जीवन में रूपांतरण लाने के लिए ओजस्विता नामक गुण की आवश्यकता होती है । जैसे बुद्ध भगवान के सम्मुख डाकू का संत में और वैश्या का साध्वी में रूपांतरण हो जाता है। इसी प्रकार भारत के आचार्यों और गुरुओं में तेजस्विता और ओजस्विता का गुण अनिवार्य रूप से पाया जाता था। लेकिन कालांतर में , यह लुप्तप्राय – सा हो गया है। प्रोफेसर ऋषिकांत जी अपने नाम के ही अनुरूप न सिर्फ ऋषि की कांति रखते हैं , बल्कि तेजस्विता और ओजस्विता को भी धारण करते हैं।

दर्शनशास्र के मर्मज्ञ प्रोफेसर ऋषिकांत की कक्षा में विद्यार्थी भरे रहते हैं। जिन कक्षाओं में सभी प्रोफेसरों की कक्षाएं चलती हैं , वहां ऋषिकांत जी की कक्षाएं लगाने में मुश्किल होती है , क्योंकि विद्यार्थियों की संख्या 300 से 500 होती है। केवल दर्शनशास्र विषय के विद्यार्थी ही उनकी कक्षा में आने को उत्सुक नहीं रहते हैं , बल्कि जिन विद्यार्थियों ने दर्शनशास्र का चयन अपने विषय के रूप में नहीं किया है , उनकी भी बस एक ही इच्छा रहती है कि किसी तरह ऋषिकांत जी की कक्षा में बैठने का स्थान मिल जाए । अन्य प्रोफेसरों की कक्षाओं में जहां 50 विद्यार्थी भी मुश्किल से आते हैं , वहां ऋषिकांत जी पर विद्यार्थी अपना प्रेम खूब लुटाते हैं। इसका कारण ऋषिकांत जी का सनातनी दार्शनिक व्यक्तित्व है ।

प्रोफेसर ऋषिकांत जी समय के जितने पक्के हैं , उससे अधिक पक्के अपने अध्यापन कौशल में हैं। दर्शनशास्र की विभिन्न शाखाओं यथा – भारतीय दर्शन , पाश्चात्य दर्शन , समकालीन दर्शन , तर्कशास्त्र और धर्म दर्शन के क्षेत्र में उनका कोई विकल्प ही नहीं है। विभिन्न राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में सैकड़ों की संख्या में उनके लेख हैं , वह पत्रिकाओं का संपादन भी करते हैं , संपूर्ण भारतवर्ष में दर्शन के विषयों में व्याख्यान भी देते हैं , लेकिन इससे भी अधिक वह सनातन परम्परा के ऋषियों – सा , आचार्यों – सा , गुरुओं – सा जीवन जीते हैं। उनके संपर्क में आने वाले प्रत्येक विद्यार्थी के मन में भारतीय संस्कृति , दर्शन और अध्यात्म की परम्परा के प्रति गौरव का भाव जागृत हो जाता है।

ऋषिकांत जी की अध्यापन शैली बहुत विशिष्ट है। धारा प्रवाह व्याख्यान के साथ संवाद सत्र , प्रश्नोत्तर सत्र , लेखन सत्र आदि भी चलते हैं। कक्षा पूर्ण होने के बाद आचार्य कक्ष में भी विद्यार्थियों की जिज्ञासु भीड़ लगी रहती है। स्नातक , परास्नातक , शोध के छात्रों से लेकर कई प्रोफेसर भी उनके भक्त , प्रशंसक व अनुगामी हैं । विश्वविद्यालय की कई प्रशासनिक जिम्मेदारियों को संभाल चुके ऋषिकांत जी के जीवन में रूपांतरण तब घटित हुआ , जब वह अपने गुरुदेव से मिले। रामाश्रम सत्संग , मथुरा के समर्थ गुरु श्री चतुर्भुज सहाय जी के आशीर्वाद और अहैतुकी कृपा से ऋषिकांत जी जब प्रयाग संगीत समिति में प्रति वर्ष गीता जयंती पर अपना व्याख्यान देते हैं तो संपूर्ण सभागार में स्तब्धता छा जाती है और श्रोताओं के अश्रुओं से उनका ही मन शुद्ध हो जाता है।

लगभग हर बार ही अपने व्याख्यानों से वह अध्यात्म का बोध जागृत करते हैं और श्रोताओं के गालों को भिगो देते हैं। अध्यात्म को अपने जीवन का मूलमंत्र मानने वाले श्री ऋषिकांत पाण्डेय जी का एकमात्र उद्देश्य विद्यार्थियों के जीवन को कल्याण के पथ पर अग्रसर करना है। आज उनके कई शिष्य गांव के प्रधान से लेकर प्रोफेसर व प्रशासनिक अधिकारी हैं और उन सभी शिष्यों के जीवन में अध्यात्म , दर्शन और भारतीय संस्कृति युक्त जीवन शैली का विशेष स्थान है।

ऋषिकांत जी ने कोरोना काल में अपनी कक्षाएं यूट्यूब ( Prof Rishikant Pandey ) पर लाइव आकर ली। बहुत ही कम प्रोफेसर यूट्यूब पर लाइव आकर पढ़ाने की हिम्मत कर पाते हैं। ज़ूम या गूगल मीट पर कक्षाएं लेना तो सरल है लेकिन ओपन सोर्स से यूट्यूब के माध्यम से इलाहाबाद विश्वविद्यालय में लाइव कक्षा लेने का यह दूसरा उदाहरण मेरे मस्तिष्क में आता है। इसके पूर्व भोगूल विभाग के प्रोफेसर ओझा जी ही यह हिम्मत कर पाए थे। खैर , ऑनलाइन कक्षा लेने के साथ अपनी ऋषि परंपरा , अध्यात्म और भारतीय सनातन ग्रंथों के प्रति हज़ारों विद्यार्थियों में रुचि जगाने वाले प्रोफेसर ऋषिकांत जी को मैं नमन करता हूं और ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि सारे प्रोफेसर ऋषिकांत जी की तरह हो जाए , जिससे भारत पुन: अपने शिखर को प्राप्त कर सके।

।। जयतु जय जय सनातन ऋषि – आचार्य – गुरू परम्परा ।।

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