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सबा नकवी: नेताओं द्वारा घर पर सिलेंडर मंगवाने, अपनी किताब का जावड़ेकर से विमोचन करवाने से लेकर महादेव पर अपमान जनक ट्वीट करने तक! आईडब्ल्यूपीसी का ऑर्गनाइजिंग बोर्ड आया साथ, परन्तु साथियों ने किया विद्रोह!

Sonali Misra. सबा नकवी, जिन्होनें अभी तक भारतीय जनता पार्टी का विरोध करते हुए, हिन्दू विरोधी वातावरण बनाते हुए भी प्रकाश जावड़ेकर के हाथों अपनी किताब का विमोचन कराया था और कोविड काल में तो उनके यहाँ सिलिंडर की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए धर्मेन्द्र प्रधान जो उस समय पेट्रोलियम मंत्री थे, ने स्वयं प्रयास किए थे और इन प्रयासों को सबा ने ट्विटर पर बताया भी था।

सबा नकवी का कद राष्ट्रवादी सरकार के नेताओं के मध्य बहुत बड़ा है, तभी साधारण जनता के स्थान पर उनकी सुनवाई तेजी से होती है। “यह हम नहीं कह रहे, धर्मेन्द्र प्रधान के उसी ट्वीट पर लोगों ने कहा था।”

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खैर, अब उससे आगे बढ़ते हैं। इन दिनों सबा नकवी फिर से चर्चा में हैं। परन्तु इस बार दूसरे कारणों से चर्चा में हैं। इस बार चर्चा में रहने का उनका कारण है कि महिला पत्रकारों का जो क्लब है अर्थात आईडब्ल्यूपीसी, जहाँ पर हाल ही में चुनाव हुए थे और लेफ्ट समर्थक पत्रकार जीते थे, तो उन्होंने उसी आईडब्ल्यूपीसी से अपने उस कुकृत्य के लिए हुई एफआईआर पर समर्थन पत्र जुटाया है, जो उन्होंने पत्रकार सबा नकवी नहीं बल्कि “कट्टर इस्लामी सबा नकवी” के रूप में किया था।

सबा ने महादेव का मजाक उड़ाते हुए यह ट्वीट किया था:

यद्यपि मामला बढ़ने पर आलोचना होने पर उन्होंने अपना यह ट्वीट डिलीट कर दिया था, परन्तु यह उनकी कट्टरपंथी इस्लामी मनोदशा को समझाने के लिए पर्याप्त था। और मजे की बात यही है कि यही सबा नकवी नुपुर शर्मा के सिर के पीछे पड़ी हैं, कि उसने इनके नबी का अपमान किया!

क्या सबा का कार्य ईशनिंदा की सीमा में नहीं आता? सबा को एक नियम अपने लिए और एक नियम नुपुर शर्मा के लिए क्यों चाहिए? सबा के मन में इतना श्रेष्ठता बोध क्यों है? क्या वही 1400 वर्ष पूर्व वाली इस्लामी मानसिकता है कि काफिरों का क्या मान और अपमान? काफिर तो होते ही हैं अपमान या मार के लिए!

खैर, संभवतया यह वही अरबी गुलामी वाली मानसिकता है, जो अपने देश में रहने वाले हिन्दुओं का अपमान करना अपना सबसे बड़ा कर्तव्य समझती है। और वही सबा इतनी श्रेष्ठ हैं भी क्योंकि तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री भी उनकी बात सुनते ही थे।

नुपुर शर्मा को लेकर सबा नकवी से लेकर राना अयूब तक सभी ने एक स्वर में कहा कि नुपुर शर्मा को सजा मिलनी चाहिए, भारत में मुस्लिम और उनके नबी का अपमान होता है आदि आदि! परन्तु किसी ने भी सबा की आलोचना नहीं की कि आखिर सबा ने ऐसा क्यों किया?

खैर, जब सबा पर एफआईआर की तलवार लटकी, तो सबा ने यह कहते हुए मामला शांत करने का प्रयास किया, या फिर कहें कि स्वयं को क़ानून के फंदे से बचाने का प्रयास करते हुए ट्वीट किया कि अब हमें इस मामले पर आगे नहीं बढ़ना चाहिए। और उन देशों के समर्थन पर इतराना नहीं चाहिए जिनका मानवाधिकार का रिकॉर्ड खराब है। और ब्लेसफेमी अर्थात पैगम्बर की बेअदबी का मामला नाजुक मोड़ पर पहुँच गया है तो अब एक बहु सांस्कृतिक देश होने के नाते हमें यह सब अवॉयड करना चाहिए!

संभवतया सबा को यह आभास हो चला था कि महादेव का अपमान करने को लेकर वह भी ईशनिंदा के क़ानून के दायरे में आएंगी! इसलिए वह मामले को शांत करने की बात करते हुए यह कह रही थीं कि अब सोशल मीडिया से दूर जाने का समय आ गया है।

परन्तु वह सोशल मीडिया पर आईं! वह सोशल मीडिया पर एक दो दिनों में ही वापस आती हैं और लाती हैं अपने साथ आईडब्ल्यूपीसी का पत्र, जिसमें लिखा होता है कि आईडब्ल्यूपीसी सबा नकवी पर दर्ज एफआईआर का विरोध करती है।

जैसे ही यह पत्र आता है, वैसे ही हडकंप मच जाता है। क्योंकि इस पत्र की भाषा ही आनन फानन के पत्र की भाषा थी। यह समझ में आ गया था। परन्तु जैसे ही यह पत्र सामने आया वैसे ही लोगों ने प्रश्न उठाने आरम्भ कर दिए। क्योंकि जो एफआईआर थी, वह सबा नकवी द्वारा व्यक्तिगत दायरे में रहकर किये गए ट्वीट के आधार पर की गयी थी। वह सबा के किसी पेशेवर काम से सम्बन्धित नहीं थी, बल्कि उनके मजहबी विचारों को बताने वाला था।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या आईडब्ल्यूपीसी किसी भी हिन्दू-विरोधी पत्रकार के निजी उन ट्वीट्स और विचारों के प्रति भी जिम्मेदार है जो दूसरों की आस्था का अपमान करने के लिए किए जाते हैं?

क्या मुस्लिम पत्रकार होने का अर्थ यह है कि आपको हर अपराध से बरी कर दिया जाए? क्या आप पर कोई भी एफआईआर भी न होने पाए? क्या आईडब्ल्यूपीसी, जिसके ओर्गानिज़िंग बोर्ड का हाल ही में चुनाव हुआ था और जहां पर पहली बार कोई ऐसा पैनल भी चुनाव में खड़ा हुआ था, जिसमें वामपंथी विचारों का दूर दूर तक कोई लेनादेना नहीं था, इस बात से डर गया है कि उसके विरुद्ध विशुद्ध गैर वामपंथी विचार भी सिर उठा सकते हैं, तो वह या तो इतनी छवि खराब कर दे इस संस्थान की कि सरकार स्वयं ही कोई ऐसा कदम उठा दे, जिसके कारण यह संस्था समाप्त हो जाए या फिर जनता में महिला पत्रकारों की छवि ही हिन्दू-विरोधी प्रमाणित कर दे!

दूसरे विकल्प की आशंका अधिक है क्योंकि अब पत्रकारिता भी समावेशी विचारों से भरी हुई है, जहाँ पर एकतरफा वाम और इस्लामी विचार लेकर आप नहीं चल सकते! तो फिर क्या हुआ?

आईडब्ल्यूपीसी की ही सदस्य उतरीं इसके विरोध में

जैसे ही यह पत्र वायरल हुआ, वैसे ही आईडब्ल्यूपीसी की सदस्य ही इस निर्णय के विरोध में आ गईं। सभी की आपत्ति इसी बात को लेकर थी कि आखिर कैसे आईडब्ल्यूपीसी बोर्ड एक तरफ़ा वक्तव्य जारी कर सकता है। वरिष्ठ पत्रकार सर्जना शर्मा से हमने जब इस विषय में बात की तो उन्होंने कहा कि यह गलत है और इस प्रकार बिना चर्चा के बोर्ड वक्तव्य जारी नहीं कर सकता है। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपना विरोध दर्ज कराया है और यह भी कहा है कि ऐसे वक्तव्यों के लिए उन सदस्यों के हस्ताक्षर लेने चाहिए, जो इससे सहमत हैं।

वरिष्ठ पत्रकार एवं कई पुस्तकें लिख चुकी प्रितपाल कौर ने भी कहा कि वह इस वक्तव्य के साथ नहीं हैं। क्योंकि उनकी तरह कई और पत्रकारों को यह वक्तव्य जारी करते हुए विश्वास में नहीं लिया गया। और न ही बोर्ड मीटिंग बुलाई गयी। उन्होंने कहा कि पहले यह तो पता चले कि आखिर सबा का वह वक्तव्य क्या है जिसके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है?

कई महिला पत्रकारों ने यह भे प्रश्न किये कि क्या सबा नकवी पर एफआईआर उनके काम को लेकर दर्ज हुई है? सबा नकवी पर एफआईआर दर्ज हुई है महादेव का अपमान करने को लेकर, और वह किसी भी पत्रकारिता का हिस्सा नहीं था, वह उनके किसी पेशेवर विश्लेषण या रिपोर्ताज का हिस्सा नहीं था, तो फिर ऐसे में उन पर एफआईआर दर्ज होने पर आपत्ति क्यों हो? सबा ने अपना ट्वीट डिलीट किया, क्योंकि उन्हें यह पता था कि इससे समस्या आएगी और वह भड़काने वाला ट्वीट है।

एक दो महिला पत्रकारों ने यह असंतोष व्यक्त करते हुए प्रश्न किया कि यह तो पता चले कि आखिर आईडब्ल्यूपीसी किसके लिए है? क्या बोर्ड ने कभी महिला पत्रकारों की बुरी स्थिति पर बात की? महिला पत्रकारों की सुरक्षा पर बात करने के स्थान पर राजनीतिक दाँव खेले जा रहे हैं।

आशाखोसा, मोना पार्थसारथी, संध्या जैन आदि पत्रकारों ने भी इस वक्तव्य से स्वयं को अलग किया। आशा खोसा ने कहा कि वह आईडब्ल्यूपीसी प्रबंधन समिति की निर्वाचित सदस्य हैं और वह महादेव के प्रति किये गए सबा नकवी के इस ट्वीट से आहत हैं और आईडब्ल्यूपीसी के इस वक्तव्य के साथ नहीं हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संध्या जैन ने भी twitter पर लिखा कि वह महादेव का अपमान करने वाले उस ट्वीट से आहत हैं और सभी पत्रकारों का धन्यवाद देती हैं, जिन्होनें उसका विरोध किया।

printindia में कार्यरत पूजा मेहरोत्रा ने भी स्वयं को इस वक्तव्य से अलग किया:

वरिष्ठ पत्रकार और आईडब्ल्यूपीसी की सदस्य रिचा अनिरुद्ध ने भी ट्वीट किया कि वह इस वक्तव्य का समर्थन नहीं करती हैं और ऐसा कोई भी पत्र जारी करने से पहले सदस्यों को विश्वास में नहीं लिया गया था।

 चित्रा नारायण ने कहा कि हालांकि उन्हें लगता है कि सबा के खिलाफ एफआईआर जरूरी नहीं है, फिर भी आईडब्ल्यूपीसी के निर्वाचित सदस्य होने के नाते यह वक्तव्य उन्हें इसलिए परेशान कर रहा है क्योंकि सदस्यों के साथ बातचीत नहीं की गयी थी

वहीं नेशनल हेराल्ड की समाचार सम्पादक और आईडब्ल्यूपीसी की सदस्य एश्लिन मैथ्यू ने कहा कि ओर्गानिज़िंग बोर्ड को सभी सदस्यों के सहयोग से चुना गया है, और जीबीएम की सदस्यों की भलाई के लिए काम करता है, तभी यह वक्तव्य जारी किया गया है!

परन्तु एश्लिन मैथ्यू भी यह बताने में यह सक्षम नहीं है कि क्या किसी पत्रकार के व्यक्तिगत विचार पर दर्ज एफआईआर भी आईडब्ल्यूपीसी के दायरे में आएगी? या फिर एश्लिन के लिए भी हिन्दुओं के देव महादेव का अपमान छोटी चीज है!

यह प्रश्न तो है ही कि यदि नुपुर शर्मा ने कथित रूप से मजहब विशेष के पैगम्बर को अपमानित किया है, और वह भी उनकी ही किताब से पढ़कर, जिसे स्वयं जाकिर नायिक सहित कई इस्लामी लोग अपने वीडियो में बता चुके हैं, वह अपमान हो गया और सबा, जिसने खुले आम अपमान किया है, वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता? यह आईडब्ल्यूपीसी का दोहरा मापदंड क्यों है?

क्या उनके सदस्य होने के नाते सबा को हर प्रकार का अपमान करने की छूट है?

शोभना जैन, जो आईडब्ल्यूपीसी की इस बार की अध्यक्ष हैं, उनके इस निर्णय के विरुद्ध कई पत्रकार खुलकर सामने आई हैं। दरअसल एक और समस्या आईडब्ल्यूपीसी के सामने मुंह बाए खड़ी है।

खाली करना है बँगला:

दरअसल आईडब्ल्यूपीसी को जो परिसर या बँगला मिला हुआ है, उसे खाली करने के लिए सरकार की ओर से नोटिस जारी किया जा चुका है। यह बंगला उन्हें 31 जुलाई 2022 तक खाली करना है। दरअसल यह बंगला 13 मई 1994 को महिला पत्रकारों को आवंटित हुआ था, परन्तु अवधि समाप्त होने के बाद 6 फरवरी 2021 को उन्हें यह खाली करना था।

शोभना जैन ने कुछ समय माँगा था, जो 31 जुलाई के रूप में उन्हें प्राप्त हुआ था।

भारत के नेता नहीं, पाकिस्तान के डिप्लोमेट के सम्मान में होता था डिनर

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि आईडब्ल्यूपीसी के परिसर में कहने के लिए गैर राजनीतिक लोग ही अपनी बात रखने के लिए आ सकते हैं, परन्तु फिर भी कई बार देखा गया कि योगेन्द्र यादव जैसे लोग अपनी बात रखने के लिए आईडब्ल्यूपीसी में गए थे। सरकार का विरोध करने के लिए कई बार बात की गयी। खैर, वह तो आतंरिक बातें हैं। परन्तु समस्या यह है कि आईडब्ल्यूपीसी में पाकिस्तान डिप्लोमेट के सम्मान में भी डिनर दिया जाता था।

वहां पर अशोक वाजपेई को बुलाया जा सकता था, परन्तु कभी नरेंद्र कोहली या राष्ट्रवादी विचारकों को बुलाया गया हो, यह दिखाई नहीं दिया।

पिछले वर्ष अगस्त में पाकिस्तानी डिप्लोमेट ख्वाजा माज तारिक जो पाकिस्तान उच्च न्यायालय में प्रेस में कार्यरत था, उसके सम्मान में आईडब्ल्यूपीसी ने पार्टी दी थी।

आईडब्ल्यूपीसी ने मूल मुद्दे शायद ही उठाए

आईडब्ल्यूपीसी महिला पत्रकारों के लिए ही बनाई गयी संस्था है, यह हाल फिलहाल के कई मामलों को देखकर पता नहीं चला। पाठकों को तरुण तेजपाल के पक्ष में आया हुआ निर्णय याद ही होगा। जिस लड़की के साथ तरुण तेजपाल ने अभद्रता की थी, वह भी महिला पत्रकार थी। जब इस मामले को लेकर शोर मचा था तो एक दो दिनों के बाद तरुण तेजपाल की रिहाई के विरोध में पत्र लिखकर विरोध व्यक्त किया था।

परन्तु आईडब्ल्यूपीसी उन सभी महिला पत्रकारों के साथ हुए उत्पीडन पर चुप ही रहा था, जो किसान आन्दोलन के समय भीड़ का शिकार होते होते बची थीं। india today की प्रीति चौधरी ने यह ट्वीट भी किया था उनकी टीम की महिला पत्रकारों के साथ ऐसी घटनाएं हो रही हैं, इसके विरोध में सभी आवाज उठाएं

परन्तु आईडब्ल्यूपीसी ने कभी ऐसा कोई वक्तव्य जारी किया हो, ऐसा नहीं लगता!

परन्तु वह सबा के पक्ष में पत्र जारी कर सकती हैं, कल को कोई महिला पत्रकार अपनी व्यक्तिगत क्षमता में किसी व्यक्ति का कत्ल भी कर देती है तो भी आईडब्ल्यूपीसी यह कहते हुए उस महिला पत्रकार के साथ खड़ा हो जाएगा कि “इन्हें वैचारिक मतभेदों के आधार पर जानबूझकर फंसाया जा रहा है!”

सबा के पक्ष में जारी यह पत्र जहां आईडब्ल्यूपीसी की प्रतिबद्धता व्यक्त करता है तो वहीं महिला पत्रकारों द्वारा किया जा रहा विरोध यह बताता है कि अब एकतरफा विमर्श नहीं चलेगा, अब पत्रकारिता में भी समावेशी विचार ही चलेंगे!

परन्तु एक बात समझ से परे है कि हिन्दुओं और हिन्दू आराध्यों को कोसने वाली सबा नकवी के प्रति  सरकार के नेता क्यों इतने प्रतिबद्ध होते हैं कि इतने विष के उपरांत भी उनकी किताब का विमोचन प्रकाश जावेडकर करते हैं और धर्मेन्द्र प्रधान सिलिंडर की आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं।

क्या इसलिए कि सबा के जहरीले विचारों के कारण हिन्दू कंसोलिडेट होकर इन्हें वोट देता है? प्रश्न कई है, परन्तु इस विशेषाधिकार पर प्रश्न अधिक हैं, कि क्यों देश को बदनाम करने वाले पत्रकारों को सरकार के स्तर पर वह सुविधाएं प्राप्त होती हैं जो देश और संविधान का सम्मान करने वाले आम नागरिक को कठिनाई से प्राप्त होती हैं?

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Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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