सड़क छाप बिल्डर पत्रकारिता के शिखर पुरुष बन जाते हैं ! क्या वे प्रणय राय जैसे संपादकों से प्रेरित होते हैं जो अपराध के बाद चौथे स्तंभ का कवच ओढ़ लेते हैं!

डेढ़ साल पहले एक पत्रकार मित्र के साथ एक रिजनल चैनल के मालिक संग मुलाकात के बाद ज्यों ही मैं दफ्तर से बाहर निकला अपने पत्रकार मित्र से कहा जल्द ही ये संपादक जेल जाएगा। साथी पत्रकार मेरे स्वाभाव से अवगत थे वे बस मुस्कुरा कर रह गए। मैं कोई भविष्य वक्ता नही लेकिन डेढ़ साल के भीतर ही मेरा कहा सही साबित हो गया। हफ्ते भर पहले उत्तराखंड पुलिस ने गाजियाबाद स्थित उसके घर से एक्सटॉर्शन के आरोप में गिरफ्तार किया बाद में अदालत ने उसे जेल भेज दिया। स्टिंग ऑपरेशन को पत्रकारिता में कमाई का धंधा बनाने का सिलसिला तो कुछ सालों से विराम ले चुका था संपादक जी पर आरोप है कि वे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का स्टिंग करने के लिए दांवपेंच लगाते हुए एक्सटार्शन के धंधे में लिप्त थे। जब धरे गए तो उनके घर से तीस से बत्तीस लाख रुपये बरामद हुए।

अकसर सोचता हूं पत्रकारिता लाभ का वो कौन सा धंधा है जो मालिकाना हक पाते ही एक पत्रकार को करोड़ोपति बना देता है? सत्ता की ताकत तो इनाम में अलग से मिलता है। संदेह के घेरे में होते हुए भी सरकार ऐसे किसी मीडिया संस्थान पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। एनडीटीवी और उसके प्रमोटर प्रणय राय इसके बेहतरीन नमूना हैं जिनके खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय से लेकर सीबीआई तक के पास गंभीर साक्ष्य हैं। वे साक्ष्य अदालत में पेश किए जा चुके हैं लेकिन अब तक सख्त कार्रवाई की हिम्मत सरकारी एजेंसी जुटा नहीं पाई। लेकिन बारह तेरह साल में एक कसबाई स्ट्रिंगर फिर प्रोप्रटी डीलर से एडिटर इन चीफ व चैनल मालिक तक का सफर तय करते हुए वाई श्रेणी का सुरक्षा घेरा हासिल करने वाले पत्रकार का जेल जाने का सफर सवाल पैदा करता है कि कानूनी कार्रवाई सिर्फ छुटभैये संपादकों पर ही संभव है या कानून की नजर में सभी बराबर होते हैं यह फार्मूला पत्रकारिता में पताखा फहरा चुके मठाधीसों पर लागू नहीं होता!

मनीलांड्रिंग के आरोप में प्रणय राय के ठिकानों पर जब छापेमारी हुई तो एक तबका उसे पत्रकारिता पर हमला बताने लगा। जबकि सालों से प्रणय राय के खिलाफ मनीलाड्रिंग और हवाला कारोबार में लिप्त होने जांच एजेंसी के पास साक्ष्य हैं जो अदालत में पेश किए जा चुके हैं। प्रणय राय का एनडीटीवी कभी टीआरपी की रेस में आगे नहीं रहा लेकिन सबसे ज्यादा सैलरी उसी चैनल के स्टाफ पाते रहे। सवाल हमेशा उठता रहा कि आखिर पत्रकारिता के अलावा कोई और लाभ का धंधा न करने वाले प्रणय राय पैसा कहां से लाते हैं जबकि उनके चैनल को उस स्तर का एड मिलता नहीं क्योंकि उनके चैनल को कोई टीआरपी नहीं होती। लेकिन सच यह है कि प्रणय राह का सत्ता में ठसक ऐसा रहा कि उनका कभी कोई बिगाड़ नहीं सका। अब साक्ष्य सामने आने लगे एयरसेल मैक्सिस केस में फसे पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का अवैध पैसा प्रणय राय के एनडीटीवी में ही लगाया गया। लेकिन पत्रकारिता का चोला इतना मजबूत रहा प्रणय राय पर हाथ डालना किसी जांच एजेंसी के लिए संभव नहीं हो सका। यह सवाल करना भी संभव नहीं हो सका आखिर पत्रकारिता वो लाभ का कौन सा धंधा है जहां मालिकाना हक पाया पत्रकार अरबों में खेलने लगता है?

बदलते दौर में प्रणय राय जैसे पत्रकारों ने कई छुटभैया पत्रकारों को भी उगाही के धंधे के लिए पत्रकारिता को हथियार बनाने को प्रेरित किया। उमेश कुमार उसी के मिसाल हैं बस इसलिए क्योंकि वो पकड़े गए हैं। बांकि तो दुध के धुले हैं जब तक उनके पाप से पर्दा नहीं उठता। अब सवाल यह है क्यों मुझे लगा कि उमेश कुमार जेल जाएंगे तब जब मैं उनका तामझाम देखकर तुरंत उनके दफ्तर से बाहर निकला ही था। दरअसल चैनल के दफ्तर पहुंचते ही पचास की संख्या में पुलिस वाले दिख गए। मुझे संदेह हुआ कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं है। बाद में पता चला कि संपादक जी को सरकार ने वाई श्रेणी की सुरक्षा दे रखी है। यह अपने आप में चौकाने वाली बात थी। संपादक जी पत्रकारों के हित में क्रांतिकारी कदम उठाना चाहते थे। वे एक एनजीओ बना रहे थे। मेरे मित्र की सलाह थी कि मैं भी उस नेक काम में सम्मलित हो जाऊं जो पत्रकारिता और पत्रकारों पर हमला के खिलाफ एक आंदोलन है।

बोर्ड रुम में जहां हमारी उनसे मुलाकात हुई वहां संपादक स्तर के कुछ और पत्रकार बैठे थे वहीं चैनल के मालिक ने अपना बखान शुरु कर दिया कैसे उन्हें पीआईबी से मान्यता पाने और प्रेस क्लब का मैंबर बनने के लिए प्रताड़ित किया गया और आज वे किस हालात में हैं। कुछ ही साल में स्ट्रिंगर से एडिटर इन चीफ व चैनल के मालिक बने शख्स से अपनी उपलब्धि बतानी शुरु की तो सब के सब मंत्र मुग्ध थे। मेरे लिए इस तरह के किसी मीटिंग में शामिल होने का पहला अवसर था। चैनल के मालिक संग बातचीत में कभी नहीं लगा कि मेरे सामने सफलता का पताखा फहरा चुका कोई बड़ा पत्रकार बैठा है। लेकिन वक्त उनका था इसीलिए सिर्फ वही बोल रहे थे। सामने बैठे कई पूर्व संपादक उन्हें सुन रहे थे। जितनी तेजी में पत्रकारिता के सफर में उमेश कुमार ने धन और शोहरत हासिल किया वह साफ संकेत दे रहा था कि यह सफर कैसे तय किया गया होगा?

बाद में पता चला कि उनके उपर एक महिला ने बलात्कार का आरोप भी लगाया है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक जिम में काम करने वाली महिला को वो चैनल में बड़ा ओहदा देने के लालच में शाररीक शोषण कर रहे थे। खैर तब मी टू का बाजार गर्म तो नहीं हुआ था लेकिन इस आरोप को हमने गंभीरता से नही लिया। जानता हूं कि इस सवाल के मायने नही लेकिन मन में यह सवाल जरुर उठा कि जिसका पत्रकारिता से कोई लेना देना नहीं उसने यह सफर कैसे तय किया? हाल में सहारा और पी-7 जैसे चिट फंड से चलने वाले कई चैनल बंद हुए लेकिन उन पर पत्रकारिता की आड़ में धंधा ब्लैकमेलिंग या मनीलांड्रिंग का आरोप नहीं था। पत्रकारिता का धंधा उनने अपने मूल धंधे को बचाने के लिए शुरु किया था जिसे बचा नहीं पाए।

जबकि मनीलांड्रिंग के आरोपी प्रणय राय व उमेश कुमार जैसे पत्रकारों का धंधा उससे उलट है। एनडीटीवी के मालिक प्रणव राय के तो ढेर सारे धत्करम हैं जिसकी फाइल पीएमओ में है । इन फाइलों के डर से एनडीटीवी का प्रबंधन सरकार के सामने झुकने को मजबूर हो जाता है। लेकिन कोई कारवाई नहीं हो पाती क्योंकि चौथे स्तंभ हर हमले के आरोप का कहीं सरकार शिकार न हो जाए। ज्ञात हो कि आईआरएस संजय श्रीवास्तव ने प्रणव राय के सारे धत्करम की जांच कर एक विस्तृत रिपोर्ट बनाई थी। इस रिपोर्ट से पता चला कि प्रणव राय ने ढेर सारा ब्लैकमनी को ह्वाइट किया है। साथ ही उन्होंने कांग्रेसी सरकार के जमाने में पावरफुल मंत्री चिदंबरम के साथ मिलकर टूजी स्कैम का पैसा अपने चैनल में लगवाया। जांच करने वाले आईआरएस को प्रणव राय और चिदंबरम ने मिलकर पागलखाने भिजवा दिया और ढेर सारे फर्जी मुकदमें लिखवा दिया ताकि मुंह बंद कराया जा सके। पर वह आईआरएस संजय श्रीवास्तव झुके-टूटे नहीं। उनकी फाइलें आज भी कार्रवाई के इंतजार में पीएमओ में पड़ी हैं।

प्रणय राय पर भले ही कार्रवाई का इंतजार हो लेकिन उमेश कुमार का इंतजार खत्म हो गया। उमेश कुमार पर ब्लैकमेल करने की मंशा से राज्य के मुख्यमंत्री समेत प्रमुख नेताओं का स्टिंग ऑपरेशन करने के लिए अपने एक कर्मचारी पर कथित तौर पर दबाव डालने का आरोप है। इन्हीं आरोप में वे अब सलाखों के पीछे हैं।‘समाचार प्लस’ चैनल उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से संचालित होता है। यह चैनल 2016 में उस वक्त चर्चा में आया था जब उसने उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत का स्टिंग ऑपरेशन किया था। उसमें राज्य विधानसभा में शक्ति परीक्षण से पहले असंतुष्ट विधायकों का समर्थन हासिल करने के लिए उन्हें कथित रूप से रिश्वत की पेशकश करने के लिए एक सौदे पर बातचीत करते दिखाया था। यह समझने के लिए काफी है कि पत्रकारिता लाभ का धंधा कैसे पत्रकारिता को एक्सटार्शन का धंधा बनाने वालों के लिए। लेकिन चोर तो वही जो पकड़ा गया।

URL: ‘Sadak Chhap’ builders become peak of journalism, Are they motivated by editors like prannoy roy

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