संघ परिवार– दो नावों पर सवार

शंकर शरण । संघ परिवार पक्का जातिभेदी भी बन रहा है, और जातियों को खत्म करने का उपदेश भी दे रहा है।…..दुनिया में अंतहीन उदाहरण हैं कि राजनीति कर्म में नीयत या कथनी का कोई मूल्य नहीं। केवल करनी, और करनी का फल ही असली चीज है। लेनिन से लेकर गाँधी, और राजीव से लेकर अटल बिहारी तक ऐसी कथनी-करनियों का इतिहास मौजूद है। जिन्होंने घोषणा एक तरह की, किन्तु उन की करनी का फल कुछ और निकला। अतः धर्म का आडंबर और अधर्म को प्रश्रय देने की चतुराई केवल धर्म की हानि करेगी, और कर रही है। यह हिन्दू समाज पर नित्य बढ़ते शारीरिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक हमलों से भी दिखता है। 

दो समाचार लगभग साथ आए। संघ परिवार के एक नेता ने जाति, वर्ण भुला देने का आवाहन किया। पर उन्हीं के अन्य नेता ने आरक्षण पाने वाली जातियों में अब मुसलमानों, क्रिश्चियनों को भी जोड़ने का मंसूबा दर्शाया। वे पहले भी उन जातियों को विचित्र विशेषाधिकार दे चुके हैं। ऐसी विचित्र व्यवस्थाएं करने के अलावा, भाजपा नेता जातिगत लफ्फाजियाँ भी करते रहते हैं। सो, संघ परिवार पक्का जातिभेदी भी बन रहा है, और जातियों को खत्म करने का उपदेश भी दे रहा है।

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यह दोहरे बोल, डबल-स्पीक, कई अन्य गंभीर विषयों में है। जैसे अपने को ‘सच्चा सेक्यूलर’ कहते हुए ‘प्रोफेट मुहम्मद के रास्ते पर चलने’ का आवाहन करना। अब दूसरों से मुहम्मदी रास्ते पर चलने कहने वाला स्वयं भी चलेगा ही! संघ परिवार के नेता यह ठसक से कर रहे हैं। इस के लिए विशेष साधन-संपन्न एक मुस्लिम मंच भी बनाया हुआ है। साथ ही, अनेक बड़े नेता टीका-तिलक लगाकर मंदिर, गंगा-घाट पर टीवी कैमरों के सामने पूजा-आरती करते हुए पक्के हिन्दू होने का भी दावा करते हैं। यद्यपि किसी हिन्दू-हित प्रसंग पर एक शब्द भी कदापि नहीं बोलते। हिन्दुओं पर कानूनी, सांस्कृतिक, भौतिक, रणनीतिक चोट होते रहने पर भी अनसुना अनदेखा करते हैं। चाहे चोट देश में हो रही हो, या विदेश में।

अतः संघ-परिवार हिन्दू-शत्रुओं के साथ भी है और हिन्दूवादी भी। आखिर पोप और चर्च-मिशनों से लेकर तमाम ईमामों, उलेमा ने कभी छिपाया नहीं कि उन का उद्देश्य भारत में अपने मतवाद का पूर्ण वर्चस्व है। यह हिन्दू समाज को खत्म करने का ही दूसरा नाम है। उन्हीं पोप और मौलानाओं के सामने संघ परिवार के नेता बार-बार सलामी देते रहे हैं। इस्लामी शासकों से लेकर मामूली मुस्लिम महानुभावों के सामने भी गिरने-बिछने जैसी मुद्रा में उन के चित्र और बयान निरंतर दिखते हैं।

उसी तरह, संघ परिवार के नेता एक ओर संविधान को धर्म-ग्रंथ कहते हैं। पर इस्लामी शरीयत को उस से भी ऊपर सुपर-ग्रंथ जैसा मान अपने कार्यकर्ताओं को झुकाने के लिए दबाव भी डालते हैं। जैसा नुपूर शर्मा मामले में पूरी दुनिया ने देखा। संविधान की दृष्टि से नुपूर ने रंच मात्र न कुछ अनुचित कहा, न किया। किन्तु उसे दंडित कर जिहादियों का निशाना बना दिया गया। यहाँ तक कि नुपूर का समर्थन करने के लिए दर्जन भर हिन्दुओं का कत्ल हुआ। किन्तु संघ-परिवार नेताओं न उस की भर्त्सना की, न मकतूल हिन्दुओं के परिवार को सहानुभूति दी। कांग्रेसी नेता निरीह मकतूल कन्हैयालाल के घर गए, पर संघ-परिवार के नेता दूर रहे। अतः वे संविधान की देव-पूजा जैसी भी करते दिखते हैं, और उसे के शत्रु शरीयत के सामने लंबलेट भी रहते हैं। अभी ईरान में स्त्रियों के न्यायोचित आंदोलन को कई देशों के नेताओं संगठनों ने समर्थन दिया है। पर संघ-परिवार के महिला संगठ तक मौन हैं। जबकि संघ नेता दूसरे देशों पर बोलते रहते हैं। अतः ईरान पर बगलें झाँकना केवल शरीयत के सामने झुकने से है। जिस के लिए संविधान और मानवीयता तक पीछे छूट गई!

वही दोहरे-बोल लोकतंत्र और तानाशाही भी इकट्ठे साधने में हैं। संघ-भाजपा में आंतरिक लोकतंत्र कितना है, यह अनुमान का ही विषय है। भाजपा के चार सौ सांसद अब किसी विषय पर मुँह नहीं खोलते। यह उन्हें अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के संवैधानिक, बल्कि सहज मानव अधिकार से वंचित रखना है। यूरोप अमेरिका के लोकतांत्रिक देशों में ऐसा दृश्य नहीं कि जन-प्रतिनिधि और देश-प्रतिनिधि स्वयं अपनी भावना भी व्यक्त न करें! पर यहाँ जब भी किसी भाजपा सांसद ने अपनी अनुभूति का कोई बयान दिया, तो उसे सार्वजनिक फटकार सुनाई गई। नतीजन सब की बोलती बंद है। वे मानो बाड़े में बंद, खाते-पीते, मौन जीवों में बदल कर रह गए हैं। यहाँ संभवतः किसी अन्य दल के लोगों की ऐसी साँसत नहीं कि वे अपने मन की एक भी बात बोलने से बचे!

यह कम्युनिस्ट देशों जैसी हालत है। संघ परिवार में वामपंथी मुहावरों का अनुकरण तो दशकों से था। अब वे सांगठनिक तौर-तरीकों में भी उन जैसे हो रहे हैं। जबकि अन्य दलों को ‘परिवारवाद’ का ताना देकर अपने को लोकतांत्रिक बताते हैं। कांग्रेस को एक परिवार का बंधक बताना, और स्वयं संघ-परिवार के निचले नेताओं, कार्यकर्ताओं की जुबान पर ताला लगाना। संघ-परिवार में इस्लामी और जातिभेदी नीतियों पर क्षोभ को व्यक्त नहीं होने दिया जाता। जबकि कांग्रेसी नेता, कार्यकर्ता असंख्य मुद्दों पर अपनी भावना व्यक्त करते हैं। वस्तुतः, जिस तरह कांग्रेस में अध्यक्षीय चुनाव हो रहा है, उसी तरह भाजपा नेता एक से अधिक उम्मीदवार वाला चुनाव कराना सोच भी नहीं सकते! कम्युनिस्ट सत्ताओं की तरह अब वे अपनी ही तानाशाही से डरे हुए हैं।

दोहरे-बोल का एक विषय आडंबर और विलासिता भी है। पहले संघ-परिवार सादगी को अपनी विशेषता मानता था। उन के अनेक नेता, कार्यकर्ता अभी भी सादगी पसंद हैं। किन्तु संगठन, पार्टी दिनो-दिनों बेहिसाब आडंबर में डूब रहे हैं। स्वयं भाजपा के निचले चुनाव प्रबंधक के अनुसार, उन के नेताओं ने चुनाव को अविश्वसनीय खर्चीला बना दिया है। यह सब सादगी नहीं, बल्कि एक विशिष्ट वर्ग की विलासिता का मार्ग है।

उसी क्रम में, विचारधारा के दंभ के साथ पूरी विचारहीनता भी दर्शनीय है। दिन-दिन बदलते नारों और विचित्र वक्तव्यों से उन के सचेत समर्थकों ही नहीं, कार्यकर्ता भी चकित हैं। इस्लामी राजनीति, हिन्दू धर्म और जातिभेदी राजनीति पर कुछ अरसे से संघ-परिवार की कथनी-करनी ने ऐसे रूप ग्रहण कर लिये हैं जिसे उन के सदस्य भी हक्के-बक्के देख रहे हैं। संगठन/पार्टी पदों पर होने, अथवा पुरानी संबद्धता के कारण वे कुछ कहने में असहाय महसूस करते हैं। किन्तु उन्हें रहस्यमय संकेतों में दी जाती सफाई या दिलासे न प्रमाणिक, न ही जबावदेह है। यह निरी विचारहीनता है, जो आइडियोलॉजी के दंभ के साथ चल रही है।

उन का पुराना राष्ट्रवाद अब रूपाकारहीन, कसौटीहीन, और खोखला शब्द मात्र है। एक आत्मप्रवंचना जो भोले-विश्वासी कार्यकर्ताओं के लिए नशा या छल है। कथित ‘राष्ट्रवादी विचारधारा’ गोलमोल और भ्रामक मुहावरा है। आखिर गाँधी, नेहरू, पटेल, शास्त्री और मनमोहन सिंह तक सभी राष्ट्रवादी ही थे। लेकिन जिस रूप में संघ परिवार ने ‘राष्ट्रवाद’ को अपना पेटेंट-सा बनाया, वह किसी सार-तत्व से खाली है। इस की पिछली हिन्दू-निष्ठा पतली होते-होते लुप्तप्राय हो गई है।

कुल मिलाकर, यह सब दो नावों की सवारी की कोशिश है। यह धर्म और अधर्म को एक साथ साधना भी नहीं। बल्कि अधर्म को धर्म के रूप में प्रस्तुत करके हिन्दू समाज को असहाय बनाना है। यह स्वार्थवश, अज्ञानवश हो या अच्छी नीयत से, इस से अंतर नहीं पड़ता। दुनिया में अंतहीन उदाहरण हैं कि राजनीति कर्म में नीयत या कथनी का कोई मूल्य नहीं। केवल करनी, और करनी का फल ही असली चीज है। लेनिन से लेकर गाँधी, और राजीव से लेकर अटल बिहारी तक ऐसी कथनी-करनियों का इतिहास मौजूद है। जिन्होंने घोषणा एक तरह की, किन्तु उन की करनी का फल कुछ और निकला। अतः धर्म का आडंबर और अधर्म को प्रश्रय देने की चतुराई केवल धर्म की हानि करेगी, और कर रही है। यह हिन्दू समाज पर नित्य बढ़ते शारीरिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक हमलों से भी दिखता है।

साभार

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