भीमा-कोरेगांव मामले में एसआईटी गठन की मांग को वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने बताया बेतुका और गैरवाजिब, सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला!

भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में नजरबंद शहरी नक्सलियों के मामले में एसआईटी गठन करने को लेकर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ की पीठ ने तीन पक्षों के वकीलों की दलील सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित करने का निर्णय किया। पीठ ने कहा कि इस पर फैसला बाद में सुनाया जाएग। वहीं सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार की तरफ से एएसजी तुषार मेहता तथा मुख्य शिकायतकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे तथा शहरी नक्सलियों के पक्ष में याचिका दारय करने वाली मुख्य याचिकाकर्ता रोमिला थापर की ओर से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलीलें पेश की। सुनवाई के दौरान जहां तुषार मेहता और हरीश साल्वे ने एसआईटी गठित करने की मांग को ही बेतुका तथा गैरवाजिब बताया वहीं सिंघवी ने एक बार फिर एसआईटी गठित करने की मांग दोहराई।

मुख्य बिंदु

* एएसजी तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान कोर्ट बताया कि नजरबंद शहरी नक्सलियों के खिलाफ हैं पुख्ता सबूत

* वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कोर्ट के सामने याचिकाकर्ता रोमिला थापर की याचिका पर उठाया सवाल

गुरुवार को इस मामले में हुई सुनवाई के दौरान एएसजी तुषार मेहता ने कोर्ट को आश्वस्त करते हुए कहा कि नजरबंद शहरी नक्सलियों के खिलाफ उनके पास पुख्ता सबूत मौजूद है। उन्होंने सुनवाई कर रही पीठ के जजों को कई अहम सबूतों पर ध्यान आकृष्टि किया। उन्होंने तीनों जजों को शहरी नक्सलियों के बीच हुए पत्रचार के कई अंश भी पढ़ के सुनाए जिससे साबित होता है कि उनकी सीधी संलिप्तता थी। और इसी वजह से उनकी गिरफ्तारी जरूरी थी। इस मामले की जांच सही दिशा में आगे बढ़ रही है। ऐसे में इस समय एसआईटी गठित करने का मतलब जांच को प्रभावित करना होगा। ये लोग यही चाहते हैं कि सही जांच न हो और उनकी करतूत लोगों के सामने न आ पाए। इसी कारण ये लोग एसआईटी की मांग कर रहे हैं।

वहीं मुख्य शिकायतकर्ता की ओर से साल्वे ने दलील देते हुए कहा कि अभी एसआईटी गठन करने का आदेश देने का साफ मतलब यही होगा कि हमें सीबीआई, पुलिस तथा अन्य जांच एजेंसियों तथा इन सवैंधानिक संस्थाओं पर कोई भरोसा नहीं है। इसलिए जब इस मामले की जांच सही दिशा में हो रही है तो फिर इसे बंद कर एसआईटी गठित करना बिल्कुल उचित नहीं होगा। साल्वे ने तो मुख्य याचिकाकर्ता के वकील की एसआईटी गठित करने की मांग को बेतुका और गैरवाजिब बताया। साल्वे ने तो मुख्य याचिकाकर्ता रोमिला थापर की याचिका दायर करने पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जब अभी तक किसी नजरबंद शहरी नक्सलियों ने अपनी गिरफ्तारी के खिलाफ जमानत के लिए आवेदन तक नहीं दिया है। क्योंकि वे जानते हैं कि उनके खिलाफ एकत्रित सबूत सही हैं। ऐसे में किसी तीसरे पक्ष द्वारा याचिका दायर करना समझ से परे है।

वहीं रोमिला थापर की ओर से पेश हुए वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा चूंकि यह मामला उस पत्र पर आधारित है जिस पर किसी के हस्ताक्षर तक नहीं हैं, इसलिए इसकी निष्पक्ष जांच के लिए एसआईटी का गठन अनिवार्य है। उन्होंने सुनवाई के दौरान सरकार और पुलिस पर पतिशोध के तहत कार्रवाई करने का आरोप लगाया। अपनी दलील में उन्होंने पुणे पुलिस द्वारा पत्र बांटने के मामले को भी उठाया।

तीनों पक्ष के वकीलों की दलील सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाली खंड पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट ने ही पांचों गिरफ्तार शहरी नक्सलियों को नजरबंद रखने का आदेश दिया था। अभी तक वे लोग अपने घरों में नजरबंद हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक वे लोग नजरबंद ही रहेंगे।

सुप्रीम कोर्ट में जिस प्रकार एएसजी तुषार मेहता और वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने दमदार दलील दी है उससे स्पष्ट लगता है कि गिरफ्तार शहरी नक्सलियों को आसानी से संकट से निजात नहीं मिलने वाला है।

URL: Senior lawyer Harish Salve said demand for SIT in Bhima-Koregaon case is absurd

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