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सेवा धर्म नहीं है,बल्कि धर्म सेवा है: ओशो

मैं नहीं कहता हूं कि सेवा धर्म है। मैं जरूर कहता हूं कि धर्म सेवा है।


अगर कोई व्यक्ति धर्म को उपलब्ध हो, तो उसके जीवन में जो भी है, वह सब सेवा बन जाता है। लेकिन तब वह कांशस नहीं होता; तब वह सुबह से निकलता नहीं है खोज करने कि किसकी सेवा करें। तब वह जीवन में जीता है, और उसके जीने से, जितना भी उसका जीना है, उसकी चर्या है, उसकी श्वास भी लेनी है, वह सब अनजाने ही, बिना पता चले, सेवा बन जाती है।

जहां हृदय में प्रेम है, वहां व्यक्ति में सेवा है। फिर वह सेवा दिखाई पड़े, अखबारों में उसकी खबर छपे, फोटो निकाला जाए, फोटोग्राफर तैयार रहे जब सेवक सेवा करता हो। क्योंकि आजकल कोई सेवक बिना फोटोग्राफर के सेवा नहीं करता, यह आपको मालूम है। फोटोग्राफर को पहले खबर कर आता है कि आज हम सेवा करने जा रहे हैं। फिर इसी तरह के धोखेबाज सेवकों की जमात नेता हमेशा बन जाती है।

हम तो देख रहे हैं, हिंदुस्तान में यह हो गया। जिनको हम उन्नीस सौ सैंतालीस के पहले सेवक की तरह जानते थे, उन्नीस सौ सैंतालीस के बाद एक आधी रात के परिवर्तन में, पंद्रह अगस्त के बाद वे सब एकदम मालिक हो गए। और तब उनका असली रूप हमें दिखाई पड़ा कि ये जो सेवक मालूम पड़ते थे, ये सुबह बैठ कर चरखा चलाते थे, हरिजन कालोनी की सफाई करते थे, ये आदमी बिलकुल दूसरे सिद्ध हुए। जब इनके हाथ में ताकत आई, तो ये आदमी बिलकुल और हो गए। इनको पहचानना मुश्किल हो गया कि वे वही लोग हैं! यह कैसा चमत्कार हो गया!

यह पंद्रह अगस्त की रात बड़ी मिरेकल्स, बड़ी चमत्कारी मालूम पड़ती है। और अंग्रेज बड़े जादूगर थे, मालूम होता है। जरा सी तरकीब और हिंदुस्तान के सारे सेवक क्या से क्या हो गए! नहीं, यह आकस्मिक नहीं है। लेकिन न गांधीजी इस बात को पहचान पाए और न भारत अभी इस बात को पहचान पाया है कि सेवा करना भी प्रिस्टीज, इज्जत पाने की तरकीब है। और अगर दूसरी तरकीब मिल जाए इज्जत पाने की तो सेवक फौरन सेवा छोड़ कर मंच पर आसीन हो जाएगा, कुर्सियों पर बैठ जाएगा।

वह सेवा भी अहंकार की तृप्ति का मार्ग है। इसलिए दो सेवकों से अगर आप कह दो कि फलां सेवक आपसे बड़ा सेवक है, तो उसे दुख हो जाता है, कि यह कैसे हो सकता है कि मुझसे बड़ा कोई सेवक हो। सेवक भी मानता है कि मुझसे बड़ा कोई भी नहीं है। यह सब अहंकार की चेष्टा है। अहंकार से जब सेवा पैदा होती है, तो सेवा सिर्फ बहाना है। अंततः भीतर गहरे में यशाकांक्षा,पद-प्रतिष्ठा, अस्मिता, अहंकार की ही यात्रा चलती है।

नहीं, ऐसी किसी सेवा के मैं पक्ष में नहीं हूं।


मैं जरूर उस सेवा के पक्ष में हूं जो व्यक्ति के आत्मिक रूपांतरण से उपलब्ध होती है, जो सहज हो जाती है। उसे पता भी नहीं चलता। उसे पता भी नहीं चलता कि वह सेवा कर रहा है। अगर आप उससे कहने जाएं कि आप सेवा कर रहे हैं तो वह हैरान होगा।

वह कहेगा, कैसी सेवा? मैंने तो कुछ भी नहीं किया। मैं जो कर सकता था, वह हुआ है।


मैंने सुना, एक संन्यासी भारत आया। वह अफ्रीका में था। वह हिमालय की यात्रा, बद्री-केदार की यात्रा को गया। जब वह पहाड़ चढ़ रहा था, तेज धूप थी, आकाश से आग बरसती थी, पहाड़ की चढ़ाई थी, हांफ रहा था, पसीना बह रहा था। तभी उसे एक पहाड़ी लड़की भी दिखाई पड़ी, जो पहाड़ चढ़ रही है। वह लड़की की उम्र ज्यादा नहीं है, तेरह-चौदह साल की होगी।


बहुत नाजुक,उसके चेहरे पर आग झलक रही है, पसीना बह रहा है, वह थक गई है, वह हांफ रही है और कंधे पर अपने भाई को बिठाए हुए है। वह भी तगड़ा है, छोटा है लेकिन मजबूत और वजनी। संन्यासी उसके पास पहुंचा, तो सिर्फ दयावश उसने कहा कि बेटी,बहुत बोझ लग रहा होगा तुझे?

उस लड़की ने बहुत चौंक कर संन्यासी को देखा और कहा, स्वामी जी, बोझ आप लिए हुए हैं;यह तो मेरा छोटा भाई है। बोझ आप लिए हुए हैं। संन्यासी अपना बिस्तर-विस्तर बांधे हुए है। यह मेरा छोटा भाई है, बोझ नहीं!

संन्यासी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मेरी जिंदगी में मुझे इतना अमृत-वचन पहले कभी सुनने को नहीं मिला था। बहुत शास्त्र मैंने पढ़े थे, लेकिन यह अदभुत! पहली दफे मुझे पता चला, उस पहाड़ी लड़की ने कहा, यह भाई है मेरा छोटा, यह बोझ नहीं है!

छोटा भाई बोझ नहीं होता। तो इस कंधे पर छोटे भाई को ले जाना सेवा भी नहीं हो सकती। यह सिर्फ प्रेम का कृत्य है। इसमें कहीं कोई सेवा नहीं है।
इस छोटी लड़की को पता भी नहीं है कि वह सेवा कर रही है। जिस दिन सेवा इतनी अनकांशस, इतनी सहज, बिना जाने, बिना पता चले जब सेवा होती है तो वैसी सेवा धर्म है।


लेकिन वैसी सेवा तभी होती है जब भीतर धर्म का उदय हो। भीतर धर्म का जागरण हो तो जीवन सेवा बन जाता है। लेकिन इधर उलटा चल रहा है। इधर समझाया जा रहा है कि तुम बाहर जीवन को सेवा का बना लो तो भीतर धर्म का जन्म हो जाएगा। यह सरासर व्यर्थ और गलत बात है। ऐसा कभी नहीं हो सकता। आप लाख सेवा करो, मन धार्मिक नहीं हो जाएगा।

जीवन में जो क्रांतियां हैं, वे बाहर से भीतर की तरफ नहीं होती हैं। जीवन की सारी क्रांतियां भीतर से बाहर की तरफ होती हैं।
अगर हम यहां एक दीया जलाएं इस भवन में, तो अंधेरा बाहर निकल जाएगा, यह सच है। लेकिन अगर कोई यह कहे कि तुम अंधेरा बाहर निकाल दो, तो दीया जल जाएगा, तो वह बिलकुल ही फिजूल बातें कह रहा है।

न तो आप अंधेरे को बाहर निकाल सकते हैं, और अंधेरे को आप कितना ही बाहर निकालने की कोशिश करें, अंधेरा बाहर नहीं निकलेगा। और निकल भी जाए तो भी दीया नहीं जल जाएगा, दीया जल जाए तो अंधेरा बाहर निकल जाता है। लेकिन अंधेरा बाहर निकलने से कोई दीया नहीं जलता है।

भीतर प्रकाश जले धर्म का तो उसकी किरणें जीवन को, आचरण को सेवा बना देती हैं। लेकिन इस भूल में आप मत रहना कि हम जीवन को सेवा बना लेंगे और भीतर की आत्मा रूपांतरित हो जाएगी।

लेकिन यह बहुत बुनियादी भूल है। और यह बुनियादी भूल इस देश के चरित्र को हजारों साल से विकृत कर रही है।

ओशो
देख कबीरा रोय10

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