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फिल्म समीक्षा: शाहरुख की ‘ज़ीरो’ को सिंगल थिएटर के दर्शक ने नकार दिया

नासा वैज्ञानिक आफिया एक चिम्पांजी को प्रशिक्षण देकर मंगल ग्रह पर जाने के लिए तैयार करती है। चिम्पांजी एन वक्त पर धोखा दे जाता है और आफिया के प्रेम में पागल बउआ सिंह चिम्पांजी की जगह स्पेस शिप में बैठकर मंगल ग्रह चला जाता है। निर्देशक आनंद एल राय की फिल्म ‘ज़ीरो’ एक गजब की वाहियात फिल्म है। ये फिल्म एक अच्छे स्क्रीनप्ले, बेहतर कास्टिंग और अचूक निर्देशन के गुरुत्व बल से पूरी तरह मुक्त होकर हवा में स्वछंद विचरण करती है, जहाँ तक दर्शक का दिमाग नहीं पहुँच पाता।

निर्देशक आनंद एल राय असफल प्रेम कहानियों को श्रेष्ठता के साथ परदे पर पेश करने के लिए जाने जाते हैं। प्रेम त्रिकोण पर फिल्म बनाना उनकी विशेषता है। तनु वेड्स मनु और रांझणा उनकी मास्टर पीस मानी जाती है लेकिन ज़ीरो को वे अपनी पसंदीदा लाइब्रेरी में कतई रखना नहीं चाहेंगे। फिल्म मूलतः तीन किरदारों पर टिकी हुई है। तीनों ही किरदारों में कोई न कोई कमी है। बउआ सिंह बौना है। आफिया सेरेब्रल पाल्सी नामक बीमारी से पीड़ित है। बबिता कुमारी की ज़िंदगी में प्यार की कमी है। बउआ बबिता के पीछे पागल है लेकिन समझ नहीं पाता कि प्यार आफिया से करता है।

निर्देशक से एक नहीं कई गलतियां हुई हैं। सबसे पहली गलती एक प्रेम कथा को विज्ञान में उलझाने की हुई है। दूसरी गलती कास्टिंग में हुई है। शाहरुख़ खान इस किरदार के प्रति जरा भी न्याय नहीं कर सके। अनुष्का शर्मा के व्यक्तित्व के मुताबिक आफिया का किरदार था ही नहीं। कटरीना कैफ के किरदार को संशयपूर्ण रखा गया। आखिर तक जाहिर नहीं होता कि वे वाकई प्रेम में टूटी हुई युवती हैं या नाटक कर रही हैं। इन सबसे ऊपर दर्शक को मनोरंजन नहीं मिलता, जिसके लिए उसने मल्टीप्लेक्स में महंगी टिकट खरीदी थी। आनंद राय का मानस ‘ज़ीरो’ बनाते समय गुरुत्वहीन वातावरण में विचरण कर रहा था इसलिए जमीन पर खड़ा दर्शक उनके स्तर को समझ नहीं पाया।

‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ का राहुल शाहरुख़ खान की छवि से इस कदर चिपक गया है कि उनकी तकरीबन सभी फिल्मों में हमे राहुल की रिपिटेशन अनिवार्य रूप से दिखाई देती है। उनका निभाया हर  किरदार राहुल से प्रभावित है। डीडीएलजे के बाद के सालों में वे शाहरुख़ न होकर ‘राहुल’ ही बन चुके हैं। बउआ सिंह के किरदार में भी यही बात दिखाई देती है। इस किरदार के लिए उन्होंने कोई खास होमवर्क नहीं किया। उनका कमज़ोर ‘मेकओवर’ भी राहुल की पुरातन छवि तोड़ने में मदद नहीं कर पाता। दर्शक ये सोचकर फिल्म देखने गए थे कि उन्हें नए विषय पर बनी यूनिक फिल्म देखने को मिलेगी लेकिन मिला वही ‘डीडीएलजे का राहुल’।

इस बोझिल फिल्म में मनोरंजन के लम्हे गिने चुने ही मिलते हैं। श्रीदेवी, दीपिका पादुकोण, जूही चावला और करिश्मा कपूर के केमियो रोल दर्शक के मन में कोई उत्साह नहीं जगा पाते। निर्देशक ने कहानी बेहतर चुनी लेकिन ट्रीटमेंट में चूक कर गए। स्क्रीनप्ले में बहुत सारे झोल है। इश्क एक रूहानी अहसास है लेकिन इसे टिकने के लिए तार्किक धरातल की आवश्यकता होती है। ऐसा धरातल इस प्रेम कथा को नहीं मिल सका। लगातार नाकामी झेल रहे शाहरुख़ के लिए ज़ीरो की असफलता सदमे की तरह है। निर्माता-निर्देशक की ये अर्थहीन ‘ज़ीरो’ 200 करोड़ की लागत से बनी है। 200 करोड़ का ये ज़ीरो अधिक से अधिक सत्तर करोड़ का लाइफ टाइम बिजनेस दे सकेगा।

एक अजीबोग़रीब प्रेम कहानी जो मेरठ की गलियों से शुरू होकर मंगल ग्रह तक जा पहुंचे, उसे देखने की सलाह मैं नहीं दूंगा। देश में 8100 थिएटर्स हैं, जिनमे छह हज़ार सिंगल थिएटर्स हैं। ये एकल सिनेमाघर ही हिंदी बेल्ट में किसी भी फिल्म की सफलता/असफलता के लिए जिम्मेदार होते हैं। शाहरुख की ‘ज़ीरो’ को इसी सिंगल थिएटर के दर्शक ने नकार दिया है। यदि आप शाहरुख़ खान के बहुत बड़े प्रशंसक हैं तो उनका नुकसान पूरा करने के लिए टिकट खरीद सकते हैं। बाकी दर्शक इसे टीवी पर भी झेल सके, इसमें मुझे शक है।

URL: Zero movie opened to mixed reviews today

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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