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बीजेपी एवं संघ की वैचारिक धारणा पर शंकर शरण का कालजयी लेख। आप सब आवश्य पढ़ें।

शंकर शरण। अक्सर सुनने को मिलता है कि कांग्रेस ने जो गड़बड़ियाँ 70 साल में की, उसे ठीक करने में समय तो लगेगा। यह दलील इतने विश्वास से दी जाती है कि हैरत होती है! पहले, मान लिया जाता है कि गड़बड़ियों की लिस्ट बनी हुई है, जिसे ठीक किया जा रहा है। जबकि इस का कोई संकेत नहीं। ले-देकर केवल ‘कांग्रेस’ से देश को मुक्त करने का आहवान हुआ। लिहाजा साँप-सीढ़ी खेल जैसी चुनावी उठा-पटक चलती रहती है। पर गड़बड़ियाँ यथावत रहेंगी, क्योंकि वे निशाने पर ही नहीं हैं। दूसरे, कांग्रेस का 70 साल अखंड-सा दिखाया जाता है। जबकि इस बीच लगभग 20 साल दूसरों का शासन रहा।

तीसरी, सब से महत्वपूर्ण, कि गड़बड़ियों को कभी चिन्हित नहीं किया जाता कि वे क्या हैं, कब हुईं, किस के शासन में हुईं, किन के समर्थन से हुईं? यदि इन के उत्तर ढूँढें, तो तस्वीर गड्ड-मड्ड हो जाती है। क्योंकि नेहरू व इंदिरा काल में जो गड़बड़ियाँ हुईं, उन में कई को विपक्षी दलों का भी समर्थन था। अतः वे गड़बड़ियाँ जितनी कांग्रेस की हैं, उतनी ही उस पर चुप्पी रखने या ताली बजाने वालों की भी!

जबकि नेहरू, इंदिरा कोई खूनी तानाशाह नहीं थे! उन की नीतियों के विरुद्ध जिन्हें बोलने, लिखने की जरूरत लगी, वे मजे से बोलते लिखते रहे। के. एम. मुंशी, एन. वी. गाडगिल, राम मनोहर लोहिया, महावीर त्यागी, सीताराम गोयल, राज थापर, आदि। किसी को खरोंच तक नहीं आई थी। अतएव, जो नेता या संगठन नेहरू-इंदिरा नीतियों पर चुप रहे, या उन की बड़ाई और नकल करते रहे, उन का उन गड़बड़ियों में उतना ही दोष है।

अब विचारें कि नेहरू के आलोचकों में किसी जनसंघ नेता का नाम क्यों नहीं आता? जबकि नेहरू-नीति के विरोध में ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ बनाया था। मगर पार्टी बनाने के एक ही वर्ष बाद उन के देहांत (1953) बाद कोई जनसंघ नेता नहीं जिस ने तिब्बत, चीन, स्तालिन, सुरक्षा परिषद्, अमेरिका विरोध, सोवियत अंधानुकरण, शिक्षा का हिन्दू-विरोधीकरण, आदि किसी मुद्दे पर नेहरू के विरुद्ध आवाज उठाई हो। तब इन गड़बड़ियों का श्रेय उन्हें भी देना होगा, जो इस में मौन-मुखर शामिल थे। आखिर, दिनकर ने ही लिखा था, ‘‘जो रहे मौन, समय लिखेगा उन का भी अपराध’’। अतः नेहरू को अपना आदर्श बताने वाले जनसंघ के नेताओं का भी खाता देखना चाहिए।

इस क अलावा, स्वतंत्र भारत में दो सबसे घातक सामाजिक-राजनीतिक गड़बड़ियाँ गैर-कांग्रेस दलों ने की, जिन में जनसंघ भी शामिल था। एक, संविधान में ‘सेक्यूलरिज्म’ व ‘सोशलिज्म’ जोड़ना। यह क्रमशः इस्लाम और कम्युनिज्म को विशिष्ट बल प्रदान करना था, और सीधे हिन्दू धर्म-समाज के विरुद्ध था। वह कार्य कांग्रेस ने 1976 में इमरजेंसी की तानाशाही से किया। लेकिन जिस 42वें संविधान संशोधन द्वारा इसे किया गया, उस की अनेक बातें 44वें संशोधन (1978) द्वारा जनता पार्टी सरकार ने खत्म कर दीं, जिस में जनसंघ सब से मजबूत घटक था। लेकिन ‘सेक्यूलरिज्म’ व ‘सोशलिज्म’ को यथावत् रहने दिया। सो, वह गड़बड़ी कांग्रेस की नहीं रही। वह पूर्णतः जनता पार्टी की हो गई।

आखिर, जनता पार्टी सरकार ने जिस गड़बड़ी को हटाना चाहा उसे हटाया, जिसे रखना चाहा रखा। अतः हिन्दू धर्म-समाज के खिलाफ सब से घातक हथियार खुद जनसंघ के सहयोग से बना है – यह देखना चाहिए। जनसंघ द्वारा विरोध करने पर वह बचा नहीं रह सकता था!

दूसरी घातक गड़बड़ी हिन्दुओं को नए स्वार्थों में बाँटकर तोड़ना था। यह भी कांग्रेस ने नहीं, जनसंघ समेत जनता पार्टी ने किया! 1979 में नितांत अपरिभाषित ‘पिछड़े वर्गों’ के हित में मंडल कमीशन बना। जिस में बी.पी. मंडल जैसे घोर बदनाम, मामूली व्यक्ति को अध्यक्ष बनाया गया। जनसंघ नेताओं ने इतना कष्ट भी न किया कि कम से कम किसी योग्य जिम्मेदार व्यक्ति – नेता, विद्वान या न्यायाधीश – को कमीशन अध्यक्ष बनाने को कहते।

जनता पार्टी सरकार जैसे चल रही थी, उस में प्रधान मंत्री विभिन्न घटकों द्वारा खींचा जाता था। उस हाल में, सबसे बड़े घटक जनसंघ द्वारा किसी रजनी कोठारी, जस्टिस अजित नाथ रे, जैसे किसी प्रतिष्ठित, जानकार महानुभाव का नाम कमीशन के लिए सहज स्वीकार्य होता। मगर मंडल की अध्यक्षता वाला कमीशन बनने दिया गया, जिस की मंशा तभी संदिग्ध थी।

उस मंडल कमीशन ने उस से भी अधिक बुरा किया जिस का डर था। उस ने हिन्दू धर्म-समाज के विरुद्ध चर्च-मिशनरियों वाला विषैला प्रचार अपनी रिपोर्ट में हू-ब-हू भर दिया! हिन्दू धर्म को नीच, ब्राह्मणों को जुल्मी, आदि कह कर कुछ खास मजबूत जातियों को विशेष सुविधाएं देने का तर्क गढ़ा। क्या जनसंघ और फिर भाजपा रूप में गठित नेताओं ने वह रिपोर्ट कभी पढ़ी भी? उसे नकारना तो दूर रहा। फिर, 1989 में उसी मंडल रिपोर्ट को वी.पी. सिंह सरकार ने लागू किया, जो भाजपा समर्थन से सत्ता में थी। उस सरकार ने ब्राह्मणों के विरुद्ध मिशनरियों वाला विद्वेष खुल कर फैलाया। हिन्दू धर्म-समाज के विरुद्ध यह बहुत बड़ी चोट थी।

इस प्रकार, चर्च-मिशनरियों का हिन्दू विरोधी दुष्प्रचार भारत सरकार का दस्तावेज बन गया! यह भी कांग्रेस ने नहीं, जनता दल और उस के समर्थक भाजपा एवं कम्युनिस्ट दलों के हाथों हुआ। अब किसी को हिन्दू-विरोधी जहर फैलाने के लिए बिल्बरफोर्स को उद्धृत करने की जरूरत नहीं रही। वह सीधे भारत सरकार द्वारा स्वीकृत मंडल रिपोर्ट का सहारा ले सकता है। जिस पर भाजपा समर्थन की मुहर लगी है!

अतः स्वतंत्र भारत में सत्तर सालों की गड़बड़ियों में दो सबसे बड़ी – और अत्यंत घातक – हिन्दू-विरोधी गड़बड़ी कांग्रेस द्वारा नहीं की गई। वह खुद को हिन्दुओं का एकाधिकारी, अघोषित हितैषी कहने वाले संघ-परिवार के हाथों हुई है। सक्रिय, निष्क्रिय, दोनों रूपों में।

फिर जब 1989-90 में कश्मीर से हिन्दुओं को सामूहिक संहार, अपमान और अत्याचार द्वारा मार भगाया गया, तब भी केंद्रीय सत्ता पर कांग्रेस नहीं थी। बल्कि भाजपा और कम्युनिस्ट समर्थन से जनता दल सरकार थी। यदि उस ने श्रीनगर स्थित सेना को आदेश दिया होता, तो चार दिन में वह हिन्दू-विनाश रुक जाता। आखिर देश-रक्षा, जन-रक्षा तलवार से ही होती है। वरना सेना रखने की जरूरत ही क्या!

अतः यदि कांग्रेस सत्ता के समय हुई गड़बड़ियों के लिए कांग्रेस को दोष दिया जाता है, तब जनसंघ-भाजपा सत्ता या समर्थित सत्ता के समय हुई गड़बडियों का दोष किस के माथे जाएगा?

जनसंघ-भाजपा के बचाव में जो भी झूठ-सच दलीलें दी जाएं, वैसी ही कांग्रेस के बचाव में भी दूसरे देते हैं। बल्कि, कांग्रेस द्वारा हिन्दू-हित में किए गए काम भी गिना सकते हैं। जैसे, जस्टिस नियोगी कमीशन बनाना; छल-बल से हिन्दुओं के धर्मांतरण पर रोक लगाने का कानून बनाना; अयोध्या में राम-जन्मभूमि का ताला खोलना; फिर राम-मंदिर का शिलान्यास कराना। पुरानी मध्यमार्गी होने के कारण कांग्रेस को कुछ मुसलमानों, कुछ हिन्दुओं को देने में कोई समस्या नहीं रही है। यह उस की परंपरा है।

पर भाजपा सत्ताओं के लिए ‘इंडिया शाइनिंग’, ‘विकास’, ‘बेटी बचाओ’, ‘स्वच्छता’, ‘गरीबों’, ‘दलितों’ की सेवा के दावे, आदि ही चलता रहा है। गड़बड़ी दूर करने के नाम पर गत वर्ष अनुच्छेद 370 हटाने के सिवा उन के खाते में कुछ ठोस नहीं है। वह भी राष्ट्रीय अखंडता की बात थी जिसे सभी दलों का समर्थन मिला। खालिस हिन्दू-हित में कोई काम करने का उदाहरण मिलना अभी शेष है। उल्टे आज भी हिन्दू-विरुद्ध राजकीय, धार्मिक, शैक्षिक, कानूनी भेद-भाव जारी हैं। जिस की कोई कैफियत नहीं दी जाती। यानी सब से बड़ी गड़बड़ी खत्म करना तो दूर, वह एजेंडे से ही गायब है! संघ के आधिकारिक पदों पर आसीन लोगों से बिंदुवार जवाब की अपेक्षा रखता हूं।

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1 Comment

  1. Dr. Uttam Mohan says:

    किंचित आप श्यामाप्रसाद मुखर्जी के बाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के भाषणों ओर लेखों को पढ़ते, यह बात सत्य है कि अटल जी व्यवहार रूप में एक प्रकार से साम्यवादी थे किंतु बहुत से लोग संस्कृतिवादी रहे।
    संवेधानिक संशोधन के विषय मे आपको अवगत होगा कि जनसंघ को साम्यवादी ओर समाजवादियों ने किस प्रकार से दबाव बना कर रखा था, दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर ही जनता पार्टी सरकार गिरवाई गई।
    आपका यह लेख ओर इसकी सामग्री 50% तो सटीक है किंतु यह एक पक्षीय सी लगती है।
    आपकी विद्वत्ता को में प्रणाम करता हु, आपकी लेखनी का प्रशंसक हु, आपकी बेबाकी-निडरता का अभिनन्दन करता हु। किन्तु में विगत 21 वर्षों से जिस संघ का स्वयंसेवक हु उस पर आपके आरोपो को में अस्वीकार करता हु।
    प्रणाम

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