शौर्य स्मारक भोपाल: भारत के लिए शहीद हुआ हर एक सैनिक यहाँ कहता है अपनी कहानी!

किसी किसी शहर में कदम रखते ही अपनेपन का अहसास होता है, जैसे कोई है, कुछ है जो आपको खींच रहा है। कोई कहानी है, जो आपको कानों में बात कहने के लिए बुला रही है। राजा भोज के नगर भोजपाल अर्थात मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में 31 मार्च को कदम रखा तो गर्मी की तेज लहर ने दिल को सहमा दिया और एक आशंका घर कर गयी कि उफ़, कितनी गर्मी है। दो ही दिन पहले कई न्यूज़ चैनल भयंकर गर्मी की आशंका व्यक्त कर चुके थे और भोपाल में पानी की विकट होती समस्या पर खबरें दिखा चुके थे, तो मन तैयार तो था ही, परन्तु मन और तन के तैयार होने में अंतर होता है।

दिन भर मीडिया महोत्सव में चर्चाओं और विमर्श के उपरान्त अब समय था भोपाल दर्शन का। आयोजकों की तरफ से भोपाल में नव निर्मित शौर्य स्मारक ले जाने का कार्यक्रम था। भोपाल के शांत टीलों पर बना यह शौर्य स्मारक कोई साधारण स्मारक नहीं है। इस स्मारक में एक सैनिक के जीवन के विभिन्न रूपों और पहलुओं को प्रदर्शित किया गया है। इसमें सैनिक का जीवन है, तड़तडाती गोलियों की आवाजें हैं, और मृत्यु का अंधेरा है। यह अँधेरा आपको जीवन की उस सच्चाई से रूबरू कराता है जो हमेशा ही सैनिकों के सामने रहती है। उनके जीवन की अनिश्चितता के साथ ही यह स्मारक सियाचीन के ग्लेशियर की ठंडक से भी पर्यटकों का परिचय कराता है। इस स्मारक में जब आप गोलियों की आवाजों के सामने आते हैं, तो आपको एक सिहरन होती है मगर वह सिहरन आपको उस खून जमा देने वाले क्षणों का अनुमान लगाने में सफल होती है, जो सिहरन हमारे वीर सैनिक सहते हैं।

शौर्य स्मारक

इस स्मारक में शहीदों के नाम से लेकर भारत के राष्ट्रपतियों के चित्र भी हैं। साथ ही यहाँ पर सेना की विभिन्न रेजीमेंटों के झंडे और चिन्ह भी हैं। चित्रों में भारत विभाजन से लेकर 1972 के युद्ध तक के चित्र हैं। जब आप भारत विभाजन को याद करते हैं और उसके उपरान्त अपनी ही भूमि को बनाए रखने के लिए तमाम शहादतों को याद करते हैं, तब आपको याद आता है ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह, इंशाअल्लाह का नारा’ और इस पवित्र स्थान पर आप एक अनकही नफरत और उन लोगों के प्रति एक वितृष्णा से भर उठते हैं। भारत को एक रखने के लिए हमारे सैनिकों ने अपने शीश कटाए हैं, और इन कटे हुए शीशों से टपकता लहू आपको इस शौर्य स्मारक में बार-बार उन कुर्बानियों की याद दिलाएगा।

शौर्य स्मारक 1

शौर्य स्मारक इसलिए जाना आवश्यक है जिससे हम सभी को यह याद रह सके कि कोई है जो हमारी सीमाओं की रक्षा और हमारी रक्षा के लिए अपनी जान मुस्तैदी से देने के लिए तैयार है। कोई है जो यह नहीं देखता कि कितना तापमान है? कहीं सियाचीन ग्लेशियर की बरफ से उसकी उंगलियाँ तो नहीं गल रहीं, कहीं वह किसी बर्फीले तूफ़ान में दब तो नहीं जाएगा? उसका शव सही सलामत तो जाएगा न वापस? उसे कोई चिंता नहीं होती, उसे चिंता होती है तो बस इस बात की कि उसकी भारत माता में स्वतंत्रता की लौ हमेशा जाग्रत रहे। और यही लौ इस स्मारक में प्रज्ज्वलित हो रही है। इस स्मारक में पर्यटक हर शहीद हुए सैनिक से संवाद सा करता है।

अरेरा पहाड़ी पर स्थित लौह-शिल्प आधारित यह शौर्य स्मारक लगभग 51 हजार 250 वर्ग मीटर भूमि पर बनाया गया है। शौर्य स्मारक का निर्मित क्षेत्रफल लगभग 8,000 वर्ग मीटर है। इस शौर्य स्मारक में प्रवेश करने के बाद आप युद्ध और विध्वंस से परिचित होते हैं। युद्ध से हुए विनाश से यह धरती किस प्रकार रोती है, यह आप इस स्मारक में प्रवेश करते ही अनुभव करेंगे। भोपाल में बना यह शौर्य स्मारक संभवतया भारत के शहीदों की याद में बना हुआ प्रथम शौर्य स्मारक है। पृथ्वी पर बना 62 फीट के लगभग लम्बा यह स्तंभ, एक सैनिक के जीवन की उस ऊंचाई के सामने बौना ही है, जो उसने अपनी मातृभूमि की सेवा कर प्राप्त की है। भारत तोड़ो गैंग के प्रति यहाँ आकर नफरत और ही बढ़ेगी, जब आप बंदूकों को पाएंगे और टोप पाएंगे मगर वे जिस सिर पर पहनी जाएँगी, वे सिर नदारद होंगे!

भारत के इन अमर शहीदों को प्रणाम कर हम सब एक बार फिर से आयोजन स्थल की तरफ चल पड़े थे। उस स्मारक में सफ़ेद ही गुलाब थे, सफ़ेद रंग शांति का प्रतीक है, सफ़ेद रंग सज्जनता का प्रतीक है, जो भारत की मूलभूत पहचान है। भारत के सैनिक इस पहचान को अक्षुष्ण रखने के लिए अपना जीवन कुर्बान कर देते हैं, और हम सबके सामने बस यही प्रश्न छोड़ जाते हैं, कि क्यों कुछ लोग उनके मानवाधिकारों के स्थान पर दानवों के मानवाधिकारों की बात करते हैं। गोलियों की आवाजों के बीच यही आवाज़ आती है

“कट गए सर हमारे तो कुछ गम नहीं,
सर हिमालय का हमने न झुकने दिया,
मरते मरते रहा बांकपन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों”

वतन को सम्हालना ही होगा, अपने अपने स्तर पर, अपनी अपनी क्षमता में, राजा भोज की भूमि पर यात्रा अभी जारी थी, मगर नम आँखें कह रही थीं, बस यहीं रह जाएं, कर्ज बहुत है हम पर इन शहीदों के! इन्हें नमन कर कुछ तो कर्ज चुकाया जाए।

URL: Shaurya Memorial: martyrdom for india every soldier says here his story!

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Sonali Misra

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सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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