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शिव के कोप से मलेच्छों में भय

Sonali Misra. वह शिव हैं, वह भोले हैं, वह सहज अपना त्रिनेत्र नहीं खोलते। वह सुर और असुर सहित सभी के देव हैं। उनसा कोई नहीं है, परन्तु जब उन्हें क्रोध आता है तो वह दक्ष का शीश भी काटने से नहीं हिचकते और न ही वह कामदेव का अहंकार नष्ट करने के लिए उन्हें भस्म कर देते हैं। वह दंड देते हैं।  उनकी कृपा के लिए एक ओर हिन्दू धर्म उन्हें पूजता है तो वहीं कुछ राक्षस ऐसे हैं जिन्हें मात्र अपमान से मतलब होता है। 

शिव धैर्य रखते हैं। क्योंकि ब्रह्मा की बनाई सृष्टि को वह सहज नष्ट नहीं करना चाहते। महाभारत में जब श्री कृष्ण अपने भाई शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा करते हैं तो वह उस धैर्य और शान्ति की परम्परा का परिचय देते है, जो हिन्दू धर्म की पहचान है।  शिव भी संहार के देव होते हुए भी प्रेम के देवता है और जीवन के देव हैं, तभी सृष्टि की रक्षा के लिए विष भी पी जाते हैं, परन्तु अपमान का विष वह नहीं पीते, तथा अपराध का दंड देते हैं, फिर चाहे कोई भी हो।

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देवों को मात्र प्रतिमा समझना मुस्लिम समाज के कुछ युवकों को भारी पड़ गया।  शिव का अवतार माने जाने वाले स्वामी कोरगज्जा के मंदिर में जनवरी में एक घृणित वाकया हुआ था। जनवरी में वहाँ की दानपेटी से एक कंडोम निकलने से हडकंप मच गया था। श्रृद्धालु अपने देव के इस अपमान से बहुत दुखी थे एवं पुजारी भी यद्यपि पुलिस में शिकायत लिखवा आए थे, परन्तु श्रद्धालु एवं पुजारी अपनी आहत और घायल आस्था के लिए प्रकृति का न्याय चाहते होंगे। कितना कठिन रहा होगा उनके लिए अपने प्रभु का अपमान सह पाना।

कितने खून के आँसू उन्होंने पिये होंगे, कितनी बार न्याय की गुहार लगाई होगी। शायद अपनी श्रद्धा को बार बार आजमाया होगा, जब उन्होंने प्रार्थना की होगी कि जिसने भी उनके प्रभु का अपमान किया है, उसे कड़े से कड़ा दंड मिले।  एक प्रश्न यह भी है कि आखिर कब तक हमारे मंदिर इस सर्व धर्म समभाव और गंगा जमुना तहजीब का शिकार होंगे।

वैसे तो गंगा और जमुना दोनों ही हिन्दुओं आराध्य नदियाँ हैं, तो गंगा-जमुना सभ्यता तो हमारे यहाँ सृष्टि के आरम्भ से है।   जिन लोगों ने बार बार हमारे मन्दिरों को अपमानित किया, और तोड़ा, उन सभी को दंड मिला है, प्रकृति ने न्याय सदा किया है। ऐसे में हुंडी में कंडोम डालने वाले बच जाते? यह संभव नहीं था। न्याय हो चुका था, बस  भक्तों को नहीं पता था

जनवरी में हुए न्याय का पता अप्रेल में चला! देवता के आंसू पिघल गए, अपने भक्तों के आंसू देखकर, कौन कहता है श्रद्धा में शक्ति नहीं होती और कौन कहता है कि देवता के साथ घृणित गतिविधि के बाद आप बच सकते हैं, आपको कोई भी नहीं बचा सकता है।

राम जी का मंदिर तोड़ने वाले बाबर का खानदान कहाँ है आज देख लीजिए और हम  भक्तों की श्रद्धा और न जाने कितने जन्मों के त्याग और संघर्ष के बाद हमारा राम मन्दिर अब बनने जा रहा है।  राम की ध्वजा शीघ्र ही लहराने जा रही है, औरंगजेब नहीं रहा, मगर काशी विश्वनाथ में बाबा अपनी पूरी शान के साथ अभी भी हैं। हम जीवन हैं, हम मरते नहीं हैं, हम शाश्वत हैं। 

हम ताबूत में बैठकर कयामत के इंतजार करने वाले नहीं हैं, बल्कि हम तो वह प्रकाशपुंज हैं, जो भक्ति की एक यात्रा एक जन्म में जहाँ समाप्त करते हैं, वहीं से अगले जन्म में आरम्भ करते हैं। हमारे आराध्य हमारी पुकार पर बार बार आते हैं, जैसे मंगलुरु में आए। कैसे रह जाते जब उन्होंने देखा कि तीन मलेच्छों के कारण हज़ारों भक्तों की आँखों में आंसू हैं, और यह आँसू कहाँ पिघल पिघल कर गिरे होंगे, न जाने कितने घरों में इस अपमान के कारण चूल्हा न जला होगा।

देव के कोप का तो भक्तों को तब पता चला जब आज से चार दिन पहले दूसरे समुदाय के दो लड़के पुजारी के पैरों में गिर पड़े और क्षमा मांगने लगे। पहले तो पुजारी को समझ नहीं आया कि अंतत: हुआ क्या है? उन्होंने रोते हुए बताया कि उन्होंने अपनी साथी नवाज के साथ मिलकर इस घृणित घटना को किया था।

परन्तु दुर्भाग्य की बात यह थी कि नवाज इस कुकृत्य की क्षमा मांगने के लिए जिन्दा न था।  उसे उसके कर्मों का दंड तुरंत मिल चुका था। देव अपने भक्तों के आंसुओं और अपने अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए इतने तत्पर थे कि दानपेटी में कंडोम डालने के एक ही दिन बाद खून की उल्टियां हुईं और फिर उसके मल से भी खून निकलने लगा। इतना ही नहीं उसने अपने घर में दीवारों पर सिर पटका और और पटक पटक कर मर गया।

इस घटना का भक्तों को नहीं पता था, वह तो बस पूजा करते रहे और प्रार्थना करते रहे कि उनके देव का अपमान करने वाला दण्डित हों। जबकि दंड एक को मिल चुका था। और शेष दो भी उसी डरे हुए थे कि कहीं उनके साथ भी यह न हो जाए क्योंकि नवाज मरते समय बोलकर मरा था कि स्वामी कोरगज्जा उन लोगों से नाराज़ हैं।  और फिर अब्दुल रहीम में भी वही लक्षण उभरने लगे और फिर वह लोग अपनी जान बचाने के लिए भागे और मंदिर में अपने पाप बताते हुए क्षमा मांगने लगे। पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया और बताया कि यह बहुत ही रहस्य से भरा हुआ मामला है और वह सारे सबूत जुटा रहे हैं। 

यह कहा जाता है कि स्वामी कोरगज्जा अपने त्वरित न्याय के लिए जाने जाते हैं। वह गलत कार्य करने वालों को तुरंत दण्डित करते हैं। शायद तभी उन्होंने इतनी जल्दी दंड दे दिया। इस उदाहरण से मन्दिरों की पवित्रता को भंग करने वालों को सबक मिल जाना चाहिए कि मंदिरों का अपमान करने का क्या फल होता है, हिन्दू आतंकवाद के नाम पर शोर मचाने वाले सभी नेता आज कहाँ हैं, यह सब देख रहे हैं।

एक समय में राम को काल्पनिक कहने वाले मंदिर मंदिर जा रहे हैं, राम मंदिर बनने पर बधाई दे रहे हैं।  लड़के मंदिर में लडकियां छेड़ने जाते हैं कहने वाले वोट के लिए मंदिर मंदिर जा रहे हैं।  कारसेवकों पर गोली चलाने वाले आज गुमनामी की चादर ओढ़े हैं.

जब सब नष्ट हो जाएगा तब भी जो नष्ट नहीं होगा वह है सनातन, जब कुछ नहीं था तब सनातन था।  हम एक पुस्तक का पालन नहीं करते, हम निरंतर हैं।  हमें अपनी शक्ति का अनुभव होना चाहिए, जब देव स्वयं ही दंडित करने लगें तो यह विश्वास स्वयं में जागता है कि मंदिरों में यह कार्य करने के लिए जाने वाले लोग सावधान हो जाएं।

और यही कारण हैं कि हमें अपने मंदिरों में प्रवेश के नियम बनाने के अधिकार चाहिए।  मंदिर पिकनिक का केंद्र नहीं हैं, वह हमारे देवों द्वारा प्रदत्त ऊर्जा केंद्र हैं, जहां से सृजन की ऊर्जा निरंतर प्रवाहित होती है, जिस ऊर्जा को नष्ट करने का प्रयास किया गया, और कश्मीर से कन्याकुमारी तक न जाने कितने मंदिरों को नष्ट किया गया, और अपवित्र किया गया। अब तो स्वयं देव कह रहे हैं, मलेच्छों अपने गंदे इरादों के साथ हमारे मंदिरों से दूर रहो, नहीं तो दंड देने मैं स्वयं आऊँगा

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Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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3 Comments

  1. राघवेंद्र नक्षत्री says:

    ये मेरे गाँव के पास के घटना है,उस मलेंछो के परिवार को अब हर साल उत्सव काल में आना ही होगा,नही तो वंश निर्वंश होने का श्राप सुनाया गया है।

  2. Bikash Kumar ram says:

    जैसी करनी वैसी भरनी ?? just beauuuutiful ❤️

  3. सतीश दळवी says:

    नमो नमः

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