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सिस्टर लूसी: ईसाईयों की धार्मिक कट्टरता से पीड़ित एक नाम

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Sonali Misra. कल हमने पश्चिम से आया हुआ फादर्स डे मनाया है।  हालांकि वेटिकन में फादर्स डे का आयोजन 19 मार्च को किया जाता है। वेटिकन से याद आया कि वेटिकन में, जो कि विश्व में सबसे छोटा परन्तु सबसे शक्तिशाली देश है और जहाँ से वैश्विक संवेदना और प्रेम और वैश्विक स्वतंत्रता की विमर्श की नदियाँ बहती हैं, और लोगों को लगता है कि कहीं न्याय मिले न मिले, वेटिकन में तो न्याय मिलेगा! मगर वहां पर न्याय केवल इसलिए नहीं मिलता है क्योंकि जिसने अर्जी भेजी है, उसने बलात्कार के आरोपी का विरोध किया है, और साथ ही उसने कविता लिखने की हिमाकत की है!

जी, हाँ, विश्व भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दावा करने वाला वेटिकन केवल इसलिए सिस्टर लूसी की अपील खारिज कर सकता है क्योंकि केरल की सिस्टर लूसी ने बलात्कार के आरोपी बिशप फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ चले विरोध प्रदर्शन में भाग लिया था और उन्होंने उस प्रदर्शन में कविताएँ भी लिखी थीं।

वेटिकन ने उनके कांग्रेगेशन से निकाले जाने को स्वीकृत दी और लिखा कि चूंकि उन्होंने नन की अपनी शपथ को तोडा है और नियम तोड़े हैं, इसलिए उनकी अपील को खारिज किया जाता है। और किया क्या है कि बलात्कार के आरोप में प्रदर्शन किये हैं और साथ ही कविता लिखी है!

अर्थात एक ओर ईरान है जहां पर लड़की खुले सिर नहीं रख सकती और उसे जेल में जाना पड़ जाता है। बुर्के में और पर्दे में एक रिलिजन में ज़िन्दगी सिमट कर रह जाती है तो दूसरा अब्राह्मिक रिलिजन अर्थात ईसाई रिलिजन नन बनने पर जीवन की सारी स्वतंत्रता ही छीन लेता है।

बलात्कार के आरोपी फ्रैंको मुल्क्कल का विरोध कर रही केरल की सिस्टर लूसी को भी यही लगा होगा, क्योंकि भारत में जो कैथोलिक चर्च लीडरशिप है, वह तो उनकी बात सुन नहीं रही थी, और उनसे कान्वेंट खाली कराने का नोटिस आ गया था। जून 2018 में एक 43 वर्षीय नन ने कोट्टयम में पुलिस से यह शिकायत की कि जालंधर के बिशप फ्रैंको मुलक्क्ल ने वर्ष 2014-16 के बीच उनके साथ कई बार बलात्कार किया है।  फिर वर्ष 2018 में फ्रैंको को गिरफ्तार कर लिया गया था। परन्तु शीघ्र ही फ्रैंको को जमानत मिली और जब वह जालंधर पहुंचे तो उनका भव्य स्वागत हुआ।

लड़ाई और तेज हुई और धीरे धीरे उस नन के समर्थन में और भी सिस्टर्स आईं जिनमें सिस्टर लूसी भी थीं। मुख्य गवाह को भी मार डाला गया। फादर कुरियाकोज कट्टुथारा अक्टूबर 2018 में ही पंजाब के होशियारपुर जिले के दसुया में ‘‘रहस्यमय परिस्थितियों’’ मृत मिले थे।

उसके बाद बिशप का विरोध करने वाली चार ननों को ट्रांसफर आर्डर थमा दिए गए, परन्तु विरोधे के बाद चर्च ने फरवरी 2019 में ननों के ट्रांसफर आदेश रद्द कर दिए गए। फ्रैंको अभी भी जमानत पर ही थे और अब उनकी जमानत अवधि छह जनवरी 2020 तक बढ़ गयी थी।

संघर्ष तेज हो रहा था, मगर हर मामले में दखल देने वाला चर्च, अपनी ही नन के खिलाफ जाकर खड़ा था।

सिस्टर लूसी को रोमन कैथोलिक चर्च के अंतर्गत एफसीसी द्वारा वर्ष 2019 में निष्कासित कर दिया था, और कान्वेंट खाली कर देने का नोटिस दिया था। मगर सिस्टर लूसी ने अपील की थी। मगर वह अपील खारिज हुई। मार्च 2020 में दूसरी अपील ख़ारिज हुई थी और अब जून 2021 में वेटिकन ने यह कहते हुए अपील ख़ारिज की है कि वह कई मामलों में सही जबाव नहीं दे पाईं जैसे उनके पास ड्राइविंग लाइसेंस है, वह कार खरीद रही हैं, और वह किताब प्रकाशित करा रही हैं।”

यह बेहद अजीब है कि अपने आपको सबसे ज्यादा प्रगतिशील रिलिजन बताने वाले लोग अपने यहाँ की नन, सिस्टर्स को पर्दे में रखते हैं, उन्हें शारीरिक सम्बन्ध बनाने की आज़ादी तो होती ही नहीं है, अर्थात उनकी पूरी यौन स्वतंत्रता को रिलीजियस चॉइस के नाम पर संस्थागत रूप से नियंत्रित करने के बाद, उन्हें यह भी अधिकार नहीं है कि वह कविता भी लिख सकें! उन्हें गाड़ी चलाने का अधिकार नहीं है! अर्थात उन पर तमाम बंधन हैं। जैसे ही उन्होंने जीवन धर्म के प्रति आधिकारिक रूप से समर्पित किया वैसे ही कविता नहीं लिख सकतीं?

जबकि जिस धर्म को वह कथित पिछड़ा बताती हैं, अर्थात सनातन वहां पर तो भक्ति काव्य धारा बिना मीराबाई, अक्क महादेवी, के पूरी ही नहीं होती हैं, जिन्होनें अपना सब कुछ केवल प्रभु के लिए छोड़ दिया। एक ने कृष्ण को अपना पति माना तो महल आदि सब छोड़ दिए, और दूसरी ने शिव को अपना पति माना तो महल के साथ साथ वस्त्र भी त्याग दिए और बस प्रभु को प्राप्त करने के लिए कर दिया समर्पित जीवन और फिर प्रेम में रचे गीत, प्रेम में रची कविताएँ!

सनातन स्वतंत्रता देता है, ऐसी स्वतंत्रता जिसमें प्रभु और भक्त के मध्य कोई नहीं है। यद्यपि सनातन की तुलना किसी से नहीं की जा सकती है, फिर भी जो लोग केवल अंग्रेजी बोलने और ईसाइयत को ही आधुनिकता मानते हैं, उनके समक्ष यह तुलना करना बाध्यता हो जाती है।

और उधर जो खुद को वैश्विक संवेदना का दादा मानते हैं, वह कविता लिखने पर और बिशप द्वारा एक नहीं दो-दो ननों का बलात्कार का विरोध करने पर अपनी ही नन सिस्टर लूसी को सिस्टम में बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं, यहाँ तक कि सुनवाई का मौक़ा नहीं देते हैं। हालांकि सिस्टर लूसी ने अभी कान्वेंट न खाली करने का निर्णय लिया है और एक और अपील का निश्चय किया है!

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Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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