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मनोरोगियों की लिखी किताबें बच्चों को इतिहास कहकर पढ़ाना बन्द हो

रामेश्वर मिश्र पंकज। आज बाबू सरस्वती प्रसाद हम से मिलने आए थे।। हमारे बहुत पुराने मित्र। देश दुनिया की बातों में बड़ी रुचि रखते हैं। आज हमने उनसे निजी बात की। हमने कहा कि आपके घर के सामने तो एक बरगद का बहुत बड़ा पेड़ है और आपके घर के पिछवाड़े एक झील है और आपके सारे घर में पानी भरा रहता है और आप लोगों को बहुत कष्ट है और रहने के लिए बहुत थोड़ी सी जगह है और आपका परिवार बड़े कष्ट में है।बड़े दुःख की बात है।मुझे बडी चिन्ता रहती है आजकल।

इस पर वे तमतमा गए और उन्होंने कहा कि आप किसी मनोचिकित्सालय में तुरंत भर्ती होइए या मैं ही ले चलता हूं आपको। लगता है आपका मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया है। इस पर मैंने बताया कि नहीं आपके घर में एक बार बाहर से आया एक सब्जी बेचने वाला 1 दिन गया था। वह वइस इलाके का नहीं है ।मुसलमान हैं और वह बहुत दूर रहता है पर उस दिन अचानक इस इलाके में आ गया था और वह आपको एक लौकी देने गया था ।आप ने पुकारा तो ठेले से लौकी लेकर आपके घर गया और फिर वह चला गया ।

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वह मुझे आज रोशनाबाद में मिला था और आज उसने बताया कि आपके घर का क्या हाल है।तो मुझे बड़ी चिंता हुई । इस पर वे और भड़क उठे । उन्होंने कहा: आप इतने बरसों से हमारे मित्र हैं। 50 बार हमारे घर में आए हैं और इस तरह बोल रहे हैं सर जी ।आप । निश्चित रूप से आपका मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया है। इस घर को आपने स्वयं देखा है ।जहां आप बेरोकटोक आ जा सकते हैं ,जहां आपका भरपूर स्वागत होता है।

हमारे परिवार के सारे लोग आपको जानते हैं। आपके परिवार के सारे लोग मुझे जानते हैं । उस घर के विषय में आप कभी एक बार हमारे यहां आए हुए अनजान व्यक्ति का विवरण सुनकर उसके आधार पर हमारे घर की चिंता कर रहे हैं ,चर्चा कर रहे हैं और उसका विवरण बता रहे हैं । कृपा करके उठे और तत्काल मानसिक चिकित्सालय चलें। चिंता की बात है ।आप जैसा मेधावी और विद्वान व्यक्ति इस मन: स्थि,ति में रहे यह मुझे सुहाता नहीं ।मेरी छाती फटी जा रही है मुझे निराला जी और राहुल सांकृत्यायन ज्यादा याद आ रहे हैं ।उनकी यही दशा हो गई थी ।मैं नहीं चाहता कि आप उस पर से गुजरे।

कृपा कर चलिए और आप नहीं चलेंगे तो हम आप को जबरन ले चलेंगे ।। इस पर मैं ठठा कर हंसने लगा । तब वे भी थोड़े चकित हुए।। मैंने कहा,:- श्रीमान यही फॉर्मूला तो आप लोग भारत के इतिहास के विषय में लागू करते हैं ।। आप अच्छी तरह जानते हैं कि भारत के हर राज्य में व्यवस्थित अभिलेख रखा जाता था।
भारत के इतिहास के अत्यंत प्रामाणिक ग्रंथ मौजूद हैं। महाभारत है ,वाल्मीकि रामायण है ।

सारे पुराण हैं जो इतिहास का मूल आधार है और यह कुल मिलाकर लाखों पन्नों की प्रामाणिक first hand सामग्री भारत के प्रत्येक राज्य अभिलेखागार में विद्यमान है।अत्यंत प्रामाणिक वहां का इतिहास है। इसके विषय में स्वयं विदेशियों ने लिखा है और भारत के लोग भी जानते हैं। आप स्वयं जानते हैं कि भारत के हर राज्य में अभिलेखागार होते थे और बड़े विस्तार से सारी महत्वपूर्ण घटनाएं सुरक्षित रखी जाती थी और हमारे शासक 1947 ईस्वी तक जो हिंदू राजा रानी हुए, वे बहुत अधिक अध्ययन शील थे और निरंतर शास्त्रों का और दुनिया का भी अध्ययन करते थे।

इतिहास का अध्ययन करते थे ।साहित्य और धर्म शास्त्र का अध्ययन करते थे और अपनी बड़े-बड़े विद्वानों को रख रखा था और उनके यहां विधिवत प्रशस्त अभिलेखागार थे। परंतु उनका कोई भी अभिलेख पढ़ने देखने की जगह बाहर से जो डच पुर्तगीज फिरंगी आदि आदि लोग यहां आए दो पैसा कमाने और जो यहां की भाषा नहीं जानते थे ,जिनको ठीक से बोलना नहीं आता था और जिन्होंने लौट के डींग मारते हुए अपने देश में कुछ सच्ची कुछ झूठी बहुत सी बातें लिखदीं तो आप लोग उसी को भारत का इतिहास मानते हैं ,बताते हैं और लिख कर बताते हैंऔर इसके बाद आप लोगों को किसी को मानसिक चिकित्सालय में आज तक भर्ती नहीं किया गया ।

अभी तो ऐसे सभी मनो रोगियों की पुस्तकें भारत के विद्यार्थियों को चार चार पीढ़ियों से इतिहास कह कर पढ़ाई जा रही हैं। कृपा कर सबसे पहले तो यह मांग करिए कि भारत में इतिहास समाजशास्त्र और साहित्य तथा राजनीति शास्त्र एवं अर्थशास्त्र के क्षेत्र में विगत 75 वर्षों से जिन जिन लोगों ने पुस्तकें लिखी हैं और जिन्होंने शिक्षा मंत्रालय और शिक्षा अधिकारी शिक्षा सचिव के रूप में उन पुस्तकों को पाठ्यक्रम में रखवाया है और बेचारे अध्यापकों को पढ़ने पढ़ाने को विवश किया है,

उन सब लोगों को मनोरोगी घोषित कर उनकी पुस्तकें तत्काल प्रतिबंधित की जाए ।उन्होंने भारत के मेधावी बच्चों को अपने मनोरोग से बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है ।उनके चित्त को अस्थिर और संकीर्ण बनाया है। इसकी क्षतिपूर्ति भी उनमें से जो लोग सक्षम हैं,उनसे वसूली जाए और इन पागलों की किताबें पढ़ना पढ़ाना बंद कीजिए। तब वे बात को समझें और ठठाकर हंसने लगे।

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