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Movie Review: जैविक हथियार द्वारा संक्रमित ज़ॉम्बी सेना से प्रचंड रण की कहानी

मूवी रिव्यू : आर्मी ऑफ़ डेड

विपुल रेगे। हॉलीवुड के सितारा निर्देशक जैक स्नाइडर की कोई फिल्म प्रदर्शित हो और उसका कोई शोर न मचे, ऐसा होना तो मुश्किल है। वंडर वुमन, जस्टिस लीग, बैटमैन जैसे कई नामी प्रोजेक्ट पर फिल्म बना चुके जैक स्नाइडर अपनी नई फिल्म ‘आर्मी ऑफ़ डेड’ लेकर आए हैं। इस बार उन्होंने सुपरहीरोज को छोड़कर हॉरर/एक्शन/थ्रिलर में हाथ आज़माया है। विश्वभर के दर्शकों ने फिल्म को मिश्रित प्रतिक्रियाएं दी हैं। समीक्षकों की भी यही राय है कि ये फिल्म और बेहतर बनाई जा सकती थी। ‘आर्मी ऑफ़ डेड’ थियेटर के  साथ नेटफ्लिक्स पर प्रदर्शित की गई है।

 अमेरिकन सेना द्वारा एक जैविक हथियार बनाया गया है। एक एलियन के डीएनए से बायोइंजीनियर्ड कर बनाया गया ये बॉयो वेपन एक मनुष्य के रुप में किसी स्थान पर ले जाया जा रहा है। इस जैविक हथियार को ले जा रहा काफिला दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है। अब जैविक हथियार स्वतंत्र है। वह एक पूरे शहर को संक्रमित कर वहां अपना साम्राज्य स्थापित कर लेता है।

लॉस वेगस नामक इस शहर को सीलबंद कर परमाणु से उड़ाने की तैयारी है। लॉस वेगस के जुआघर की तिजोरी में अरबों डॉलर रखे हुए हैं। एक धनवान व्यक्ति कुछ योद्धाओं को ये पैसा लाने का काम देता है। शहर ज़ॉम्बीज से घिरा हुआ है। इनको शहर पर परमाणु फेंके जाने से पूर्व वह पैसा निकालकर लाना है। ये एक कैची स्क्रीनप्ले था लेकिन स्नाइडर इसके जैसी कैची फिल्म बनाने से चूक गए हैं।

निश्चय ही स्क्रीनप्ले में ताज़गी थी लेकिन निर्देशक के दिमाग में सुपरहीरोज दौड़ रहे थे। ढाई घंटे की ये फिल्म अत्यंत रक्तपात वाले दृश्यों से भरी हुई है। इसके कुछ दृश्य इतने वीभत्स हैं कि बच्चें इस फिल्म से दूर ही रहे तो बेहतर होगा। कई समीक्षक लिख रहे हैं कि ज़ॉम्बी में बुद्धिमता कैसे आ सकती है, वह तो जीवित लाश होते हैं। उसके लिए निर्देशक बता चुका है कि ये बॉयोवेपन एक एलियन के रक्त से तैयार किया गया था।

सन 2007 में विल स्मिथ की एक यादगार फिल्म प्रदर्शित हुई थी। इसका नाम था ‘आय एम लीजेंड’। इस फिल्म में भी ज़ॉम्बीज के समूह का मुखिया बुद्धिमान बताया गया था। फिल्म की अच्छी बात ये है कि ये दर्शक का मनोरंजन करती है। ये दर्शक को कुछेक दृश्यों में आनंद का अनुभव भी करवाती है। विजुअल्स अच्छे हैं। निर्देशक की कल्पनाशीलता कुछ आगे गई है। उसने एक शेर को भी ज़ॉम्बी के रुप में प्रस्तुत किया है।

इसके दो तीन दृश्य दर्शक के पैसे वसूल करवा देते हैं। मुझे इसके अंत से बहुत शिकायत है। ये एक ब्रेनलेस अंत था। इस फिल्म में सुखांत का न होना भी इसके विरुद्ध जाता है। ऐसे खतरनाक मिशन को अंजाम देते नायकों से दर्शक को अपेक्षा होती है कि उसके हीरो ज़ॉम्बीज़ को पीटते हुए वापस लौटे और रात की विजेता शैंपेन साथ में खोले।

हालांकि निर्देशक ने ऐसे सुखद अंत के बारे में नहीं सोचा। ये फिल्म परिवार के साथ बैठकर  देखने योग्य नहीं है। यदि आप अत्यंत रक्तपात देख सकते है तो ही इस फिल्म को देखने के बारे में सोचे। बच्चों और महिलाओं को इस फिल्म से दूर रहना चाहिए।

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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