Watch ISD Videos Now Listen to ISD Radio Now

नक्सलवाद की जड़ में आखिर कौन? माओवाद प्रेमी प्रोफेसर नलिनी सुंदर, उनके वामपंथी पत्रकार पति सिद्धार्थ वरदराजन और सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला!

दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर और जेएनयू की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद पर आरोप है कि यह बस्तर के जंगलों में सैनिकों का खून बहाने वाले माओवादियों की बौद्धिक साथी हैं। पुलिस में दर्ज शिकायत में इनके अन्य जिन साथियों का नाम आया, उनमें प्रमुख हैं- एनजीओ गिरोह से विनीत तिवारी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी राज्य सचिव संजय पराटे। इन सभी पर यह आरोप है कि इन लोगों ने क्षेत्र में माओवाद व नक्सलवाद को बढ़ावा दिया और जब एक स्थानीय आदिवासी श्यामनाथ बघेल ने इसका विरोध किया तो उसकी हत्या कर दी।

नंदिनी एवं उनके इन साथियों पर नवंबर 2016 में छत्तीसगढ़ के रायपुर स्थित टोंगपाल थाने में एक एफआईआर दर्ज हुआ। इन सभी कथित माओवादियों पर हत्या, साजिश रचने, दंगा भड़काने आदि का आरोप है। यह एफआईआर मृतक आदिवासी श्यामनाथ बघेल की पत्नी की शिकायत पर दर्ज किया गया था।बघेल नामा गांव के निवासी थे। बघेल एवं उनके साथियों ने नामा व पड़ोसी गांव कुमाकोलांग ‘टांगिया (कुल्हाड़ी) समूह’ बनाकर अपने गांव को नक्सलियों से मुक्त कराने के लिए आंदोलन चला रहे थे।

आरोप है कि इसे लेकर माओवादी-नक्सली के साथ-साथ प्रोफेसर नंदिनी सुंदर व अर्चना प्रसाद एवं उनके साथ बघेल को धमका रहे थे कि वो माओवादियों की खिलाफत न करें, अन्यथा बुरा परिणाम होगा। इस बारे में बघेल व उनके साथियों ने मई 2016 में प्राथमिकी भी दर्ज कराई थी कि दिल्ली से आए ये प्रोफेसर व उनके साथी गांव वालों को धमका रहे हैं कि माओवादियों का विरोध न करें, अन्यथा उनके गांव को आग लगा कर जला दिया जाएगा आदि। आरोप के मुताबिक दिल्ली विवि की यह प्रोफेसर नंदिनी सुंदर अपनी पहचान छुपा कर ‘रिचा केशव’ नाम से उस गांव में माओवादियों का प्रवक्ता बनकर गई थी। इस बारे में दिल्ली विवि व जेएयू के उपकुलपति को बस्तर पुलिस ने लिखित में जानकारी भी दी थी कि इन दोनों प्रोफेसरों के खिलाफ जांच की जाएगी।

माओवाद समर्थक पत्नी को बचाने में वामपंथी पत्रकार पति सिद्धार्थ वरदराजन की भूमिका को समझिए…

सुंदर पर कार्रवाई होते देख दिल्ली में बैठी वामपंथी पत्रकार गिरोह देश में ‘आपातकाल थोपा जा रहा’ ‘नागरिक अधिकारों का हनन हो रहा है’, ‘मानवाधिकार का उल्लंघन हो रहा है’ आदि का ऐसा शोर मचाया कि इन गिरोह पर कार्रवाई करने से खुद सुप्रीम कोर्ट ने ही रोक लगा दिया! दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर के पति सिद्धार्थ वरदराजन खुद एक बड़े वामपंथी अंग्रेजी पत्रकार हैं। पहले वो टाइम्स ऑफ इंडिया में रहे और बाद में मशहूर वामपंथी अखबार ‘द हिंदू’ में संपादक रहे और अब ‘द वायर’ नाम से वेब चलाकर माओवादियों-नक्सलियों-वामपंथियों की विचारधारा को प्रोटेक्ट करने में जुटे हैं।

आरोप के मुताबिक वरदराजन के पास अमेरिकी पासपोर्ट है, जिसे डॉ सुब्रहमनियन स्वामी ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके बाद उसे ‘द हिंदू’ से निकलना पड़ा। एनडीटीवी पर बैठकर आजादी, स्वतंत्रता, भगवावाद आदि पर वरदराजन को प्रवचन देते आप सभी ने देखा होगा और ‘द वायर’ के जरिए तरह-तरह का झूठ फैलाते भी आप सभी ने पढ़ा होगा। नंदिनी पर कार्रवाई न हो, इसलिए दिल्ली के अंग्रेजी अखबारों, अंग्रेजी न्यूज चैनलों में बड़े बड़े लेख व शो किए गए, यदि आपको याद हो।

आपको आश्चर्य होगा कि सिद्धार्थ वरदराजन की संपादक पद पर नियुक्ति सीधे द हिंदू के मालिकानों में से एक ने बोर्ड बैठक में की थी। ढेर सारे एकेडमिक अवार्ड के जरिए इंटरनेशनल वामपंथी बिरादरी ने वामपंथी सिद्धार्थ की मार्केटिंग कर रखी है। गुजरात दंगों में मोदी सरकार को गाली देने के बाद तीस्ता, राजदीप, बरखा आदि की ही तरह एकाएक सिद्धार्थ का करियर आगे बढ़ा। उसने ‘गुजरातः एक मेकिंग ऑफ द ट्रेजेडी’ नाम से गुजरात मामले पर एक तरफा पुस्तक लिखी थी, जिसे मशहूर वामपंथी प्रकाशन पेंग्विन ने 2003 में छापा था।

इस पुस्तक के बाद तो देश-दुनिया के वामपंथी संस्थानों ने उस पर पुरस्कारों की बाढ़ लगा दी। सिद्धार्थ को बड़ा बनाने में भारत के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, चिली की वामपंथी बिरादरी रही है और ताज्जुब है इन सभी देशों के तथाकथित मानवाधिकार संगठन भारत के खिलाफ चल रहे नक्सल मूवमेंट को सपोर्ट करते हैं!

नंदिनी सुंदर को बचाने में अदालत की भूमिका को समझिए…

नक्सलियों को समाप्त करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने सलवा-जुडूम नामक एक योजना शुरु की थी, जिसमें आदिवासियों और गांव वालों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया गया था। आदिवासियों को माओवादियों को चिन्हित कर उन्हें अलग-थलग करने की रूपरेखा तैयार की गई और उसे लागू किया गया। गांव वाले हथियारों की के बदौलत नक्सलियों को खदेड़ने लगे, गांव में नक्सलियों को शरण देने से मना करने लगे और यही सब शहरी नक्सलियों को पसंद नहीं आया। यह शहरी नक्सली ग्रुप इसे मानवाधिकारा का मुद्दा बनाकर अदालत में कूद पड़ा।

सलवा जुडूम समाप्त करने के लिए जनहित याचिका डाली गई। जनहित याचिका डालने वालों में एक नंदिनी सुंदर भी थी। जनहित याचिका में कहा गया कि यह राज्य प्रायोजित आतंकवाद है। सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में सलवा-जुडूम को न केवल बंद करने का निर्देश दिया, बल्कि यह भी कहा कि जो लोग भी इससे पीडि़त हुए हैं, उन्हें हर्जाना दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने तो यह तक आदेश दे दिया कि स्पेशल पुलिस ऑफिसर(SPO) के पद को ही समाप्त कर दिया जाए। छत्तीसगढ़ सरकार ने स्थानीय युवाओं की तैनाती स्पेशल पुलिस ऑफिसर के रूप में की थी, जिन्हें भत्ता भी दिया जाता था। नक्सलियों को समाप्त करने में इन स्पेशल पुलिस की बड़ी भूमिका थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे समाप्त कर दिया!

आप आंकड़े उठाकर देख लीजिए जब तक सलवा जुडूम योजना लागू थी, हमारे सैनिक और स्थानीय नागरिकों ने नक्सलियों की समस्या को बहुत हद तक नियंत्रित कर लिया था। ऐसा इसलिए होता था कि गांव वाले भी बस्तर, सुकमा, दांतेवाड़ा आदि के जंगलों से भली-भांति परिचित थे। सुप्रीम कोर्ट ने सलवा-जुडूम बंद किया और उसके बाद से हमारे जवानों पर हमले तेज होते चले गए हैं! नंदिनी पर जिस आदिवासी की हत्या का आरोप है, उसने सलवा-जुडूम के बंद होने पर निजी तौर पर आत्मरक्षा के लिए ऐसा ही ग्रुप बनाया था, लेकिन उसे मार दिया गया!

अब मीडिया-मानवाधिकार आयोग- अदालत का दूसरा खेल समझिए

जिस बघेल की हत्या का आरोप नंदिनी पर लगा था, उसे बचाने के लिए सबसे अधिक एनडीटीवी कूदा। उसने दिखाया कि बघेल की पत्नी ने किसी का नाम नहीं लिया है। नंदिनी ने एनडीटीवी की रिपोर्ट का हवाला भी दिया। इस नेक्सस को ठीक से समझिए! मानवाधिकार आयोग ने बस्तर के उन पुलिस अधिकारियों और सरकार के सचिव को समन भेज दिया, जिन्होने नंदिनी का नाम लिया था। यदि आप-हम में से किसी पर किसी की पत्नी हत्या का आरोप लगा दे तो हमारी सीधी गिरफ्तारी होगी उसके बाद कानूनी कार्रवाई चालू होगी।

लेकिन नंदिनी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को निर्देश दिया कि इस FIR के आधार पर नंदिनी को गिरफ्तार न किया जाए। हद तो यह कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह तक कहा कि यदि छत्तीसगढ़ सरकार किसी भी तरह की जांच करना चाहती है तो उन्हें चार सप्ताह पहले नंदिनी व अन्य आरोपियों को नोटिस देना होगा ताकि वो अदालत से संपर्क कर सकें।

आपको याद होगा कि दंगा पीडि़तों के फंड के गबन का आरोप झेल रही NGO माफिया तीस्ता सीतलवाड़ की गिरफ्तारी पर भी इसी तरह से सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा रख है, जबकि देश की न्याय व्यवस्था में शायद ही किसी आम जनता को ऐसी छूट या किसी सामान्य व्यक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कभी ऐसा आदेश दिया हो! आप सभी इस नेक्सस को समझ कर इतना तो जान गए होंगे कि इस देश में सरकार से भी ताकतवर यदि कोई बिरादरी है तो वह शहरी नक्सल बिरादरी और देश का सुप्रीम कोर्ट है! जारी….

नक्सलवाद की जड़ में आखिर कौन? छत्तीसगढ़ के जंगलों से नक्सलियों का खात्मा उसी दिन होगा, जब देश के संस्थानों और पत्रकारिता से वामपंथियों को मिटाया जाएगा!

आदरणीय पाठकगण,

ज्ञान अनमोल हैं, परंतु उसे आप तक पहुंचाने में लगने वाले समय, शोध, संसाधन और श्रम (S4) का मू्ल्य है। आप मात्र 100₹/माह Subscription Fee देकर इस ज्ञान-यज्ञ में भागीदार बन सकते हैं! धन्यवाद!  

Select Subscription Plan

OR

Make One-time Subscription Payment

Select Subscription Plan

OR

Make One-time Subscription Payment

Other Amount: USD



Bank Details:
KAPOT MEDIA NETWORK LLP
HDFC Current A/C- 07082000002469 & IFSC: HDFC0000708  
Branch: GR.FL, DCM Building 16, Barakhamba Road, New Delhi- 110001
SWIFT CODE (BIC) : HDFCINBB
Paytm/UPI/Google Pay/ पे / Pay Zap/AmazonPay के लिए - 9312665127
WhatsApp के लिए मोबाइल नं- 9540911078

ISD Bureau

ISD Bureau

ISD is a premier News portal with a difference.

You may also like...

Write a Comment

ताजा खबर