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व्यभिचार कानून- मी लार्ड! ये तो कम्प्लीट दिवालियापन है!

अभिरंजन कुमार। धारा-497 के मौजूदा स्वरूप का मैं भी समर्थन नहीं करता, लेकिन अदालत ने इसे तर्कसंगत बनाने के बजाय इसे ख़त्म करके सही नहीं किया है। मेरी राय में अदालत का यह फैसला सही है कि पति पत्नी का मालिक नहीं है और दोनों बराबर हैं। समाज में भेद-भाव को ख़त्म कर समानता कायम करने की चाह रखने वाले किसी भी व्यक्ति को इससे विरोध नहीं हो सकता। साथ ही, धारा-497 का यह प्रावधान भी सही नहीं था कि व्यभिचार के मामले में केवल पुरुष को सज़ा होगी और स्त्री को नहीं।

उचित यह होता कि धारा-497 में संशोधन करके व्यभिचार की स्थिति में स्त्री और पुरुष दोनों के लिए बराबर सज़ा का प्रावधान किया जाता। पत्नी की “मर्ज़ी” के बिना विवाहेतर संबंध पति के लिए भी अपराध होना चाहिए और पति की मर्ज़ी के बिना ऐसा संबंध बनाना पत्नी के लिए भी अपराध होना चाहिए। यहां “मर्ज़ी” की परिभाषा परिस्थितियों की व्याख्या के साथ तय की जानी चाहिए। लेकिन इस कानून में बराबरी लाने वाली व्यवस्था करने के बजाय व्यभिचार को अपराध मानने से ही इनकार कर देना सरासर अनुचित है।

कायदे से सुप्रीम कोर्ट को ऐसे कानून बनाने चाहिए, जिससे समाज में व्यभिचार पर लगाम लगे और विवाह नाम के बंधन में आपसी रज़ामंदी से और एक-दूसरे को पूरा-पूरा भरोसा दिलाकर बंधने वाले स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के प्रति प्रेम-भाव से समर्पित रह सकें। यहां मालिक-नौकर का मामला नहीं है। एक-दूसरे के लिए प्यार और समर्पण का मामला है। एक-दूसरे के साथ शांति और सम्मान से जीवन जीने का मामला है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से समाज में व्यभिचार को बढ़ावा मिलेगा, जिससे अंततः परिवार नाम की संस्था और विवाह नाम की व्यवस्था के सामने गंभीर संकट पैदा हो सकता है। यह कहना पर्याप्त नहीं है कि व्यभिचार तलाक का आधार बना रहेगा। इसका मतलब यह है कि आपकी दिलचस्पी इस बात में नहीं है कि वैवाहिक संबंधों को मज़बूती मिले, बल्कि इस बात में है कि अगर समस्या है या मन बहक रहा है या वासना की भूख जाग गई है, तो तलाक ले लो।

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कोर्ट इस बात को भूल रहा है कि जब कोई विवाह-संबंध कायम होता है तो उसमें केवल एक स्त्री और एक पुरुष ही शामिल नहीं होता। उसमें दो परिवार भी शामिल होते हैं और इस संबंध से बच्चे भी पैदा होते हैं। क्या किसी स्त्री-पुरुष को अपनी किसी आपसी समस्या या वासना की भूख के लिए उस बच्चे का जीवन अनिश्चितता और असुरक्षा में डालने का हक है, जिसे उन्होंने आपसी सहमति से जन्म दिया? इसलिए मैं मज़बूती से यह दर्ज कराना चाहता हूं कि धारा-497 का पुराना स्वरूप डिफैक्टिव था, यह सही है। लेकिन नई स्थिति से समाज में व्यभिचार बढ़ेगा और तलाक के मामले और भी बढ़ेंगे। यह परिवार, विवाह-संबंध, इस संबंध से पैदा हुए बच्चों और यहां तक कि पक्ष व्यक्तियों के अपने जीवन के लिए भी सही नहीं है।

धारा-497 का मामला लॉ कमीशन के पास था और सरकार इस पर ज़रूरी सुधार करने के लिए तैयार थी। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने इंतज़ार करने का धैर्य नहीं दिखाया। अब सरकार को नया कानून बनाना चाहिए। व्यभिचार अपराध था और आगे भी रहना चाहिए। यह सोच से परे है कि व्यभिचार अपराध नहीं रहेगा। अगर यह अपराध नहीं रहेगा, तो भारत में परिवार नाम की संस्था और विवाह नाम की व्यवस्था पर गंभीर ख़तरे उत्प्न्न हो जाएंगे! धारा- 497 पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, जिसे अब तक ‘अवैध संबंध’ कहा जाता है, उसे अब ‘अनैतिक संबंध’ कहना पड़ेगा। लेकिन इस “अनैतिक संबंध” के लिए कानून में कोई रुकावट नहीं रहेगी।

* न तो इसके ख़िलाफ़ व्यक्ति या समाज अपने स्तर पर एक्शन ले सकता है, क्योंकि वह कानून हाथ में लेना होकर ‘अवैध’ हो जाएगा

* न ही इसके ख़िलाफ़ वह कोर्ट में अपील कर सकता है, क्योंकि कोर्ट काना हो गया है, उसे व्यक्ति की सेक्स करने की आज़ादी तो दिख रही है, लेकिन अन्य व्यक्ति, परिवार, बच्चों और समाज के साथ किए गए उसके कमिटमेंट और उस कमिटमेंट को तोड़ने के दुष्परिणाम नहीं दिखाई दे रहे।

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* विवाहेतर अनैतिक संबंध रखने वाले पार्टनर को या तो मन मसोसकर झेलिए या फिर उससे तलाक लेने के लिए कोर्ट में अर्ज़ी डालिए।

* तलाक की अर्ज़ी डालेंगे, तो फिर कोर्ट में वही सालों की अक्षम प्रक्रिया में पकिए और अनैतिक संबंध रखने वाले पार्टनर की मनमानियों के आगे घुटने टेकने के लिए मजबूर रहिए। वह केवल आपको मानसिक तौर पर ही परेशान नहीं करेगा, बल्कि आपको आर्थिक तौर पर भी क्षति पहुंचाएगा।

* कुल मिलाकर, अगर आपका कोई पार्टनर इस तरह के “अनैतिक संबंध” में चला गया, तो आपके सामने बर्बाद होने के सिवा दूसरे विकल्प कम ही बचेंगे।

* कम से कम कानूनी तौर पर तो अब ऐसा कोई रास्ता नहीं बचा कि भटके हुए साथी को सही रास्ते पर लाया जा सके और परिवार नाम की संस्था और विवाह नाम की व्यवस्था के ताने-बाने को बचाया जा सके।

भाई साब, ये तो कम्प्लीट दिवालियापन है!

आज़ादी के 70 साल बाद कभी-कभी महसूस होने लगता है कि हम लोग नाहक ही अंग्रेज़ों को गालियां देते हैं। वे हमसे अधिक संस्कारी थे। उनकी कॉपी करके जो न्याय-व्यवस्था हमने कायम की, उसे भी हम संभाल नहीं पा रहे। करोड़ों पेंडिंग मामले और न्याय के दर पर छले गए लाखों लोग चीख-चीखकर इसकी गवाही देते हैं।

पुराने कानून को ठीक करना तो ठीक है, लेकिन उनकी ज़रूरत होने के बावजूद उन्हें सीधे ख़त्म कर देना कहां से उचित है? केंद्र सरकार को धारा-497 में उचित संशोधन पेश करना चाहिए और कोर्ट के फैसले का पुरज़ोर विरोध करते हुए रिव्यू पीटीशन दायर करना चाहिए। मुझे हैरानी होती है कि चार-पांच लोग खुद प्रोग्रेसिव कहलाने के चक्कर में कैसे देश के करोड़ों लोगों के जीवन में ज़हर घोल सकते हैं, कैसे व्यभिचार को बढ़ावा देने का रास्ता खोल सकते हैं?

भारत के सुप्रीम कोर्ट को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की यह कविता पढ़ाई जानी चाहिए-

परंपरा को अंधी लाठी से मत पीटो।
उसमें बहुत कुछ है
जो जीवित है,
जीवन दायक है,
जैसे भी हो
ध्वंस से बचा रखने लायक है।
पानी का छिछला होकर
समतल में दौड़ना,
यह क्रांति का नाम है।
लेकिन घाट बांध कर
पानी को गहरा बनाना,
यह परम्परा का काम है।
परम्परा और क्रांति में
संघर्ष चलने दो।
आग लगी है, तो
सूखी टहनियों को जलने दो।
मगर जो टहनियां
आज भी कच्ची और हरी हैं,
उन पर तो तरस खाओ।
परंपरा जब लुप्त होती है,
लोगों की आस्था के आधार टूट जाते हैं।
उखड़े हुए पेड़ों के समान
वे अपनी जड़ों से छूट जाते हैं।
परंपरा जब लुप्त होती है,
लोगों को नींद नहीं आती,
न नशा किए चैन या कल पड़ती है।
परंपरा जब लुप्त होती है,
सभ्यता अकेलेपन के दर्द मे मरती है।
कलमें लगना जानते हो
तो ज़रूर लगाओ,
मगर ऐसे कि फलों में
अपनी मिट्टी का स्वाद रहे।

कोर्ट को affidavit दो और उसका उल्लंघन करो तो अपराध, लेकिन समाज को सबके सामने सात फेरे लेकर या निकाह कबूल करके या अन्य तरीकों से affidavit दो और उसका उल्लंघन करो तो कोई अपराध नहीं? आखिर कोर्ट अपने को समाज से ऊपर क्यों मानता है? मेरी राय में कोर्ट समाज के लिए है, न कि समाज कोर्ट के लिए। कोर्ट कैसे इस बात को कानूनी घोषित कर सकता है कि एक स्त्री या एक पुरुष भरे समाज के सामने किया गया वादा तोड़कर एक-दूसरे को धोखा दें?

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यह सही है कि भारतीय न्याय व्यवस्था पश्चिमी न्याय व्यवस्था के अंधानुकरण में तैयार हुई है, लेकिन यह भारतीय समाज, संस्कृति और व्यवस्था को ठेंगे पर कैसे रख सकती है? वो दिन दूर नहीं, जब शिक्षा-मित्रों, न्याय-मित्रों इत्यादि की तर्ज पर भारत में “सेक्स-मित्रों” की बंपर वेकेंसी निकलने वाली है। अदालतें उन्हें सुरक्षा कवच देंगी और सरकारें उनके लिए आरक्षण का अलग से प्रावधान करेंगी। तैयार रहिए। 

URL: Supreme Court cancelled the adultery law, saying it is not a crime-1

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