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अप्राकृतिक यौनाचार को पल भर में प्राकृतिक बना देने वाले माई लॉर्ड और उनका खेल!

भारत की सुप्रीम कोर्ट ने एक फूंक मारा और आईपीसी की किताब से अप्राकृतिक यौनाचार की धारा 377 फूर्र हो गया। अब कुछ भी अप्राकृतिक नहीं रह गया! पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने अपने फैसले में कह दिया कि दो वयस्कों का समलैंगिक संबंध ‘राइट टू प्राइवेसी’ के तहत आता है और राइट टू प्राइवेसी तो व्यक्ति का फंडामेंटल राइट है। भारत के मुख्य न्यायाधीश तो एक कदम और बढ़े रिटायर्ड होने के पहले के अपने एतिहासिक फैसले में उन्होंने अपने आदेश में लिखा ‘देश में सबको समानता और सम्मान से जीने का अधिकार हासिल है। कुछ लोग समलैंगिक समाज से बहिष्कार की स्थिति झेलते हैं। पहले हुई गलती को सुधारना ज़रूरी है। जो प्राकृतिक है उसको गलत कैसे ठहराया जा सकता है?’ मतलब यह कि जिसे आजतक ‘अप्राकृतिक’ माना जा रहा था अब ‘प्राकृतिक’ हो गया है।

रुकिए! भारत की सुप्रीम कोर्ट इस मामले को कितनी गंभीरता से ले रही है इसे समझिए! संविधानिक पीठ में शामिल एक मात्र महिला जज ने तो यहां तक लिख दिया कि समलैंगिकों के साथ अब तक जो अन्याय हुआ है उसके लिए समाज को इनसे माफी मांगनी चाहिए। तो क्या माई लॉर्ड! भारत की जनता को यह जानने का हक है कि पांच साल पहले हाईकोर्ट के आदेश को खारिज कर समलैंगिकता के खिलाफ लंबा चौड़ा जजमेंट देने के बाद यकायक यह दर्शन कानून के किस किताब से आया कि आईपीसी की किताब से धारा 377 को यकायक फुर्र कर दिया गया!

माई लॉर्ड आपने अभिव्यक्ति से लेकर विरोध दर्ज करने तक को समाज के लिए सेफ्टिवॉल माना है। उसकी तुलना प्रेसर कुकर से कर दी कि यदि सेफ्टिवॉल न हो तो प्रेसर कुकर फट जाएगा। सुप्रीम अदालत की यह टिप्पणी सब के लिए लागू है न! मतलब कोर्ट ने मान लिया कि समाज बदल रहा है। और इसे स्वीकार किया जाना चाहिए। मगर सवाल यह है कि दो व्यस्कों के बीच बंद कमरे में क्या हो रहा है उसकी शिकायत यदि दोनों में से कोई नहीं करता तो वो कौन सा कानून है जो उस प्राकृतिक या अप्राकृतिक यौनाचार करने वाले को सलाखों के पीछे भेज सकता है! सालों अदालत की रिपोर्टिंग करते हुए हमें अप्राकृतिक यौनाचार के गिनती के मामले मिले। अब जब वो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद प्राकृतिक हो गया तो ऐसे मामले इतिहास बन जाएंगे। लेकिन यही मामला अब बलात्कार की श्रेणी आएगा अदालत ने इसकी व्याख्या नहीं की। हमे समझना होगा कि ईश्वर की बनाई व्यवस्था को दिन के उजाले जिसे हम अप्राकृतिक मानते थे उसे प्राकृतिक साबित कर देने के धरती के भगवान के फैसले से समाज को क्या फर्क पड़ेगा!

सुप्रीम अदालत के फैसले के बाद अब दो समलैंगिक साथ साथ रहेंगे। लिव इन में रहें या पति -पत्नी की तरह उनकी मर्जी होगी। जिनकी वो अपनी दुनिया है उनके मुताबिक होमोसेक्सुअल के मामले में दोंनो पति ही कहे जाएंगे और लेस्बियन के मामले में दोनों ही पत्नि होंगी। ये एक नई सामाजिक व्यवस्था बनेगी। फिर ऐसी व्यवस्था में इन्हें शादी की इजाजत भी देनी होगी। फिर औरत की औरत से शादी होगी। मर्द की मर्द से। यहां तक तो ठीक है लेकिन कानून को अप्राकृतिक से प्राकृतिक बना देने वाले माई लॉर्ड क्या मानवीय शरीर की दैहिक व्यवस्था को ऐसा बना पाएंगे जहां से पुरुष,पुरुष को गर्भवती कर सके और स्त्री ,स्त्री को ! काश हमारी सुप्रीम कोर्ट कुछ ऐसा प्राकृतिक न्याय कर पाती तो इस कानून के मायने बदल जाते !

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तो साफ है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा अप्राकृतिक यौनाचार को प्राकृतिक साबित कर देने से समलौंगिक स्त्री पुरुष मम्मी पापा नहीं बन पाएंगे। तो तय सी बात है कि वो बच्चे पैदा नही कर पाएंगे और बच्चों की चाहत में दूसरों पर आश्रित होंगें। फिर वो बच्चे गोद लेंगे। उन बच्चों की मम्मी कौन होंगी, पापा कौन होंगे, अहम सवाल यह होगा । तो क्या इस बदलते सामाजिक तानाबाना में वह वक्त भी आएगा जब मां बाप के सामने बेटे अपने लिए दामाद लाएगा और बेटी बहु! यह बदलाव आधुनिक सामाजिक व्यवस्था को पूरी तरह से प्रभावित करेगा। सोचिए सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से क्या बदल जाएगा! अभिव्यक्ति और आजादी के जिस नाम पर दो युवाओं के व्यक्तिगत संबंधों को खुला खेलने की आजादी दी गई है उससे क्या बदल जाएगा ! बंद कमरे के संबंध को यदि पति-पत्नी भी खुले में जीना शुरु कर दे तो यह गैरकानूनी है। इसके लिए सजा का प्रावधान है। फिर किसी समलैंगिक को यह आजादी कैसे दी जा सकती है! सच तो यह है कि इस बदले कानून के बाद समलैंगिक देह व्यापार का रैकेट फले फुलेगा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने सही मायने में प्रगतिशीलता दिखाने के चक्कर में समाज को नैतिक और चारित्रिक पतन की ओर ढ़केल दिया है।

दिलचस्प देखिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का श्रेय कांग्रेस और बीजेपी दोनो ने लेना शुरु कर दिया। जबकि दोनों ने सत्ता में रहते इसके लिए न तो बिल लेकर आए न कानून बनाया। दोनों पार्टियों ने कानून बनाने के बदले सब कुछ सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दिया। जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तो कांग्रेस ने एक वीडियो जारी कर साबित करने का प्रयास किया कि भाजपा ने इसका विरोध किया था हमने इसे कानूनी मान्यता दिलाने का प्रयास किया। इसके लिए कांग्रेस ने दिखाया कि कैसे शशि थरुर समलैंगिकता के लिए प्राइवेट बिल ले कर आए थे। दूसरी ओर भाजपा कह रही है कि 2015 में अरुण जेटली ने समलैंगिकता कानून बनाए जाने के खिलाफ 2013 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बदले हाईकोर्ट के फैसले को उदारवादी माना था। दोनो पार्टियां अतित के गर्भ से अपने बयान निकाल कर समलैंगिक समाज को खुश करना चाहती है अनुमान के मुताबिक जिसकी संख्या पांच से सात प्रतिशत है।

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मतलब साफ है कि दोनो सरकार के अहम पार्टी की नजर सिर्फ समलैंगिक समाज के वोट बैंक पर है समाजिक तानाबाना के बिखरने पर रत्तिभर नहीं। इसीलिए तो जो फैसला सरकार को करना चाहिए था वो सुप्रीम कोर्ट से करवाया गया। इसलिए ताकि 90 प्रतिशत से ज्यादा की संख्या वालों को नाराज करने के संकेत से बेहतर है कि पांच से सात प्रतिशत की संख्या वालों के लाभ हानि के गणित की छीना झपटी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद किया जाए।

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URL: URL: Supreme Court said homosexuality is not crime-3

Keywords: Homosexuality, Supreme Court, supreme court judgement, article 377, अप्राकृतिक यौनाचार, समलैंगिकता, सुप्रीम कोर्ट, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले, अनुच्छेद 377

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