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देखते जाइये आगे क्या-क्या होता है, अभी तो समलैंगिकता वैध हुई है बहुत जल्द जगह-जगह गे बार खुलेंगे!

समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम नहीं है। इस फैसले को सात सदस्यीय संविधान खंडपीठ के माध्यम से पलटा जा सकता है। यह बात भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद सुब्रमनियन स्वामी ने कहा है। उन्होंने समलैंगिकता को एक अनुवांशिक विकार बताया है जिसे चिकित्सा शोध के माध्यम से इलाज किया जा सकता है। स्वामी ने समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को सामाजिक बुराइयों और यौन संक्रमित’ बीमारियों को बढ़ावा देने वला बताया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को अमेरिका का खेल भी बताया है। साथ ही कहा है कि अभी तो समलैंगिकता को वैध करार दिया गया है, आगे देखिए बहुत जल्द ही अब देश में जगह-जगह गे बार भी खुलेंगे।

मुख्य बिंदु

* समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अंतिम नहीं है, सात सदस्यीय संविधान खंडपीठ इस फैसले को उलट सकता है

* समलैंगिकता एक अनुवांशिक विकार है जिसे सुधारने के लिए चिकित्सा शोध की जरूरत है

समलैंगिकता एक अनुवांशिक विकार है जिसे सुधार की जरूरत है कानून की नहीं

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के संदर्भ में भारतीय जनता पार्टी के राज्य सभा सांसद सुब्रमनियन स्वामी ने कहा कि इसमें कोई दो मत नहीं है कि किसी के निजी जीवन में क्या होता है इससे किसी का कोई लेना देना नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि इस मामले में किसी को दंडित भी नहीं किया जाना चाहिए। स्वामी ने समलैंगिकता को मूल रूप से आनुवंशिक विकार बताया है। उन्होंने कहा जिस प्रकार किसी की छह अंगुलियां होती है, ठीक उसी प्रकार यह एक जन्मजात विकार है जिसे सुधारने के लिए चिकित्सा शोध की जरूरत है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने धारा आईपीसी की धारा 377 में शामिल किसी जानवर के साथ यौन संबंध बनाए जाने को लेकर कोई हस्तक्षेप नहीं किया है। इस मामले को अभी तक अपराध ही माना गया है। उन्होंने इस मामले में सवाल करते हुए कहा है कि क्या यह मौलिक अधिकारों में हस्तक्षेप करता है?

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सुप्रीम कोर्ट का समलैंगिकता पर फैसला अंतिम नहीं

स्वामी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का समलैंगकता पर दिया गया फैसला अंतिम नहीं। इस फैसले को ‘सात जजों वाली संविधान पीठ से पलटा जा सकता है। स्वामी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सामाजिक बुराइयों और यौन संक्रमित’ बीमारियों को बढ़ावा मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाली संविधान पीठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को न केवल अतार्किक और एकांगी कानून करार दिया है बल्कि इसे स्पष्ट रूप से मनमाना बताते हुए उसे रद्द भी कर दिया है। पता हो कि इस धारा के तहत समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कई लोगों की समझ में अभी तक नहीं आया है। इसी संदर्भ में भाजपा के वरिष्ठ नेता तथा लीगल एक्टिविस्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को अमेरिका का एक खेल बताया है। उन्होंने कहा है कि अभी तो देश में समलैंगिकता को वैधानिक करार दिया गया है बहुत जल्दी ही देश में अब जगह-जगह गे बार भी खोले जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने 158 साल पुराने औपनिवेशिक कानून को रद्द किया

गुरुवार को ही सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से 158 साल पुराने उपनिवेशवादी समलैंगिक कानून को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है। संविधान पीठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को समानता के अधिकार को उल्लंघन करने वाला बताते हुए उसे रद्द कर दिया है। ज्ञात हो कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत सहमति से किया गया अप्राकृतिक सेक्स एक अपराध था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से इसे अपराध की श्रेणी से हटाकर उसे कानूनी रूप दे दिया है। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाली जिस संविधान पीठ ने यह फैसला दिया है उसमें उनके अलावा न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन, न्यायमूर्ति एम खानविल्कर, डीवाई चंद्रचूड़ तथा इंदू मल्होत्रा शामिल थीं। सभी जजों ने एकमत से आईपीसी की धारा 377 को समानता के अधिकार तथा गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन माना और उसे रद्द करने का फैसला सुना दिया।

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URL: URL: Supreme Court said homosexuality is not crime-4

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