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पीठ का दर्द – कारण एवं उपाय!

डॉ़ अरुण भनोट। पीठ का दर्द आमतौर से हमारे पीठ के निचले भाग को प्रभावित करता है। शुरुआत में इसको हम संजीदगी से नहीं लेते और अक्सर लापरवाही कर लेते हैं। इसको हम थकान के कारण होने वाली दर्द समझते हैं, लेकिन ये रोज़मर्रा के कामों में अड़चन एवं बाधा डाल सकता है। यह दर्द हल्का, मध्यम, तेज़ या अत्यधिक गंभीर भी हो सकता है। यह किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है लेकिन वयस्कों को यह ज़्यादा प्रभावित करता है।

कारण

लोगों में ऐसी आम धारणा है कि भारी सामान उठाने से यां लापरवाही से चलने एवं उठने बैठने से पीठ में दर्द पैदा होता है अौर मासपेशियों और लीगमेंट्स (रीढ़ की हड्डीयों को आपस में बांधने वाली रस्सियां) में तनाव होता है, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। पीठ के दर्द का मुख्य कारण हमारे रोज़मर्रा कि ज़िंदगी में होने वाले वियर एंड टीयर (कोशिकाअों की टूट-फूट) होता हैं, जिसका सीधा संबंध हमारी जीवनशैली से होता है। कुछ समय के बाद बार बार होने कि वजह से यह वियर एंड टीयर पीठ को स्थाई रूप से नुकसान पहुंचा सकता है। यह नुकसान डिस्क डीजेनेरेशन (डिस्क का कमज़ोर पड़ना) यां फेसेट जाइंट् आर्थराईटिस (रीढ़ की हड्डी के जोड़ घिस जाना) के रूप में हो सकता है।

कभी कभी यह डिस्क हरनिऐशन(स्लीप डिस्क) जैसी गंभीर समस्या को भी पैदा कर सकता है। इन सब लक्षणों को आम लोग स्पांडिलाईटिस के नाम से भी पहचानते हैं। आगे चल कर जब यह स्लीप डिस्क में बदल जाता है, तब यह रीढ़ की हड्डी में से गुज़रने वाली संवेदनशील नसों (Nerves, Sciatic Nerve) पर दबाव पैदा करके, टांगों में दर्द एवं कमज़ोरी का सबब बन सकता है, जिसे हम आम तौर पर शियाटिका (sciatica) के नाम से जानते हैं। इसके अलावा, वह लोग जिनको घुटनो का दर्द, जोड़ो का दर्द, कूल्हों का आर्थराईटिस इत्यादि होता है, उनको भी पीठ में दर्द हो सकता है।

ओस्टिओपोरोसिस (कमजोर अौर क्षीण हुई हड्डियाँ) के कारण भी पीठ में दर्द होता है। कमजो़र रीढ़ की हड्डी पूरी तरह वज़न लेने में सक्षम नहीं होती और दर्द का कारण बन सकती है। यही हड्डी अपनी आंतरिक कमजो़री की वजह से टूटने व चटकने (फरैक्चर) का कारण भी बन सकती है। एेसे मरीज़ को पीठ में दर्द और तकलीफ का सामना करना पड़ता है। उठने बैठने, चलने फिरने में अौर कई बार बिस्तर में पासा पलटने में भी तकलीफ हो सकती है। स्पाईन टयूमर (रसौली) , इन्फ़ैकशन / संक्रमण और नींद नहीं आने की वज़ह से भी रीढ़ की हड्डी में दर्द हो सकता है।

रोज़मर्रा की जीवनशैली में जैसे की उठने बैठने के गलत ढंग से, लंबे समय तक बैठे रहने से और असावधानी से समान उठाने, घर के काम करते समय झटके से नीचे से समान उठाने में, छोटे बच्चों का ध्यान करने अौर उन को उठाने में रीढ़ की हड्डी पर खिचाव पड़ सकता है जिससे पीठ का दर्द होता है। पीठ के दर्द के कारणों में सुस्ती व आलस पूर्ण जीवनशैली (जिसे अंग्रेज़ी में sedentary life style बोला जाता है), लंबे समय तक कंप्यूटर या मोबाईल का इस्तेमाल करना, किसी भी प्रकार का व्यायाम नहीं करना आदि भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं।

लक्षण

* पीठ में दुखन व खिंचाव

* थोड़ा समय भी बैठने में कठिनाई

* उठने, बैठने व लेटने में दर्द का एहसास और मुश्किल

* दर्द का असर को घुटने, जांघों, टाँगो व कूल्हे में महसूस करना

* टाँगो के निचले भाग तक सनसनाहट होना

* टाँगो की कमज़ोरी या भारीपन (लकवा)

उपचार

आमूमन डॉक्टर पीठ के दर्द का उपचार दवाइयों से, पीड़ित को कुछ समय आराम करने की सलाह देना, खास प्रकार के व्यायाम और फिज़ीओथैरापी से करने की सलाह से करते हैं। ज्यादातर मरीज़ों में यही तरीका सर्वोत्तम माना गया है। अक्सर एंटि इंफलेमेट्री, दर्दनिवारक, मासपेशियों को राहत देने वाली और नसों को राहत देने वाली दवाईयां दी जाती हैं। आमतौर पे होने वाली पीठ के दर्द में अल्ट्रासोनिक मसाज थेरेपी, ऐकयुपेंचर, हीट-थेरेपी, नियमित रूप से सट्रैचिंग अादि लाभदायक सिद्ध होते हैं।

ज्यादातर रीढ़ की हड्डी के बैस्ट स्पैशलिस्ट, बिना आपरेशन के पीठ दर्द का इलाज करते हैं। पीठ के दर्द में राहत के लिए जीवनशैली में बदलाव, सही पोसचर (उठने,बैठने, खड़े होने, लेटने का सही तरीका) को अपनाने की सलाह लगभग सभी अच्छे चिकित्सक देते हैं। कुछ मरीज़ों को जब आराम नहीं मिलता तो डॉक्टर रीढ़ की हड्डी में इंजैक्शन अथवा टीका लगाने की भी सलाह दे सकते हैं।इससे कतई घबराने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि यह बहुत ही सुरक्षित होता है। परंतु टीका लगाने के उपरांत भी कसरत आैर जीवनशैली बदलना आवश्यक रहता है ताकि मरीज़ लंबे समय तक स्वस्थ रह सके।

आपरेशन की सलाह बहुत कम लोगों को दी जाती है। ऐसे मरीज़ जो कि अपने काम से अधिक समय के लिए दूर नहीं रह सकते या जिनको अत्याधिकदर्द होता है और दवाई से दर्द में राहत नहीं हो पाती या टांगों में कमजोरी महसूस होती है, या जिनकी टांगें सुन्न हो जाती हैं, उनको आपरेशन से लाभ मिलता है। श्रेष्ठ डॉक्टर एवं रीढ़ कि हड्डी के विशेषज्ञ मिनिमली इन्वेसिव रीढ़ की सर्जरी की सलाह देते हैं। कीहोल सर्जरी, फुल एंडोस्कोपिक रीढ़ की सर्जरी, स्टिचलेस रीढ़ की सर्जरी जिसमें मात्र 8 mm के कट लगाके सर्जरी करी जाती है अौर निशान भी नाममात्र का आता है।

एंडोस्कोपिक डिसेक्टोमी में रीढ़ की हड्डी के विशेषज्ञ, स्लिप डिस्क को दूरबीन की मदद से नसों से परे हटा देते हैं। बहुत बार इस दौरान मरीज़ को बेहोश भी नहीं करना पड़ता। इस प्रक्रिया से रीढ़ की हड्डी के अंदर दबी हुई नसों को राहत मिलती है। कई बार यह आपरेशन माईक्रोस्कोप का प्रयोग करके माईक्रोडाईसेक्टोमी विधि के द्वारा भी किया जाता है। कुछ स्थितियों में रीढ कि हड्डी में मैटालिक इंप्लांट, आर्टीफिशियल डिस्क, पेडिकल स्क्रू और केज का इस्तेमाल भी किया जाता है। अाज के युग में अधिकतर रीढ् की हड्डी के आपरेशन सुरक्षित अौर कामयाब होते हैं और इनमें लकवा अथवा पैरालिसिस की संभावना न के बराबर होती है।

साभार: डॉक्टर अरुण भनोट (रीढ़ हड्डी सर्जन)

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