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Tagged: poem in hindi

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ये विश्वनाथकारीडोर है

अवधेश दीक्षित| येविश्वनाथकारीडोर है जी हुजूर !पुरातन है,संस्कृति की राजधानी है ,दुनियां का आकर्षण हैयुगों- युगों से भोलेनाथ का रहाअब ये ‘चौकीदार’ जी का शहर हैन ‘निगम’ को पता हैन ‘प्राधिकरण’ को खबर हैअधिकारी...

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तलाश

तलाश,पंकज कुमार सिन्हा तू जिंदगी कीतलाश हैमेरी रूह कीतू प्यास हैआज भीतेरे लिएआंखें मेरीउदास है तुझे ढूंढतारहा नजरहर गली डगरहर मोड़ परतुझे दे रहाआवाज दिलतू है कहांहै किसे खबरजब भी कोईआहट हुईदिल में एकहलचल...

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अपमान और सत्य

अपमान और सत्य अनुपमा चतुर्वेदी तुम हो योगी बाबा अधर्मीकहाँ ज्ञानी हो सकते होभगवा पहन कर घूमो भैयाकहाँ डॉक्टर से लड़ते हो ? चाहे जितने पेपर्स लिख लोचाहे जितने अनुसंधान कर लोऔषधि निर्माण का लाइसेन्स है?वैज्ञानिक...

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बचपन

बचपन पंकज कुमार सिन्हा क्या दुनिया थी बचपन काखिलौने खेल छूटपन काछुपा छुपी मै छुप जातेकभी चक्के को दौड़ातेघड़ी वो ताड़ के पत्तेचबाए पान लीची केबेपरवाह दौड़ पड़ते थेकभी साढ़ों के हम पीछेकभी बतू...

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मेरे द्वारा विरचित विरह-शतक से कुछ काव्य-कुसुम

कमलेश कमल. उल्लसित कंठ से करूँ अमियप्रगल्भ-प्रभा का यशोगानतुम उर्वशी, तुम उर्मिला हे प्रियतेरा सबसे गर्वित मान (74) भूल कभी सकता हूँ क्याविरह-विदग्ध विषम यह पीड़ानयनों से मिट सकती है क्यातेरे सुभ्रुवों की कन्दुक-क्रीड़ा...

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पुष्प के सुवास का पता भ्रमर को कौन देता है?

कमलेश कमल. पुष्प के सुवास का पता भ्रमर को कौन देता है? आम्र-मंजरियों का ठिकाना कोयल को कैसे मिलता है? साइबेरिया के प्रवासी पक्षी सहस्त्र-योजन दूर भरतपुर की अनुकूल पारिस्थितिकी को कैसे जान जाते...

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औरत का हौसला

कमलेश कमल. औरत में ख़ून की कमी हो सकती हैहौसले की नहींघर या बाहररसोई या बिस्तरकहीं वह होती नहीं कमतर छूटे अपनोंऔर टूटे सपनों से भीनहीं टूटती औरतसब कुछ झोंकघर बसाती-सजाती हैऔर तो औरघिसती...

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प्रभु जी तुम दीपक हम बाती, जाकी ज्योति बरै दिन-राती’ का वास्तविक अर्थ!

कमलेश कमल. कबीर के समकालीन ही बनारस में एक ऐसे समदर्शी संत हुए, जिनके भक्ति परक अवदान पर तो कार्य हुआ है, लेकिन बौद्धिक-चिंतन और समतामूलक समाज के स्थापन हेतु प्रयासों पर अपेक्षाकृत कम...

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सरस्वती वंदना

कमलेश कमल. शब्द-साधना पथ का मैंएक आश भरा अन्वेषी हूँसतत चलूँ इस पथ पर मैंमाँ, मुझ को आशीष दे। सारी विद्या का कोश खराअमित ज्ञान का सिंधु धराहंस सा पग पाऊँ मैंमाँ, मुझको आशीष...

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ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं राष्ट्रकवि रामधारी सिंह “दिनकर” की रचना

ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहींहै अपना ये त्यौहार नहींहै अपनी ये तो रीत नहींहै अपना ये व्यवहार नहीं धरा ठिठुरती है सर्दी सेआकाश में कोहरा गहरा हैबाग़ बाज़ारों की सरहद परसर्द हवा का...

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मालूम था कि जाना है सबको एक दिन…

मालूम था की जाना तो है सबको एक दिन, लेकिन यूँ अचानक चले जाओगे ये सोचा न था। जीने की सौ वजहें भी क्यों कम सी पड़ गयीं, जान देने की एक ही वजह...

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