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बात बात पर देश को नीचा दिखाना मानसिक बीमारी का लक्षण है। और भारत का अभिजात वर्ग इससे बुरी तरह पीड़ित है।

कुछ चरित्र होते हैं, जो हमेशा नकारात्मकता खोजते हैं, हमेशा उन्हें नकारात्मकता चाहिए, जैसे ही कुछ सकारात्मक होता है, ये लोग अपने अपने खोल में चले जाते हैं, और जैसे ही कुछ ऐसा होता है, जिससे जरा सी भी नकारात्मकता फैले तभी ये सब सक्रिय हो जाते हैं। ऐसे लोगों को क्या कहा जाता है, पता नहीं! मगर ये ऐसे लोग होते हैं, जो सभी को हतोत्साहित करते हैं। पिछले दिनों धान के खेतों ने से निकली उड़नपरी ने भारत को विश्व के मानचित्र पर गौरवान्वित किया।

सोशल मीडिया में उसका जी खोलकर स्वागत हुआ। उसने दिखाया कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके सामने बाधाएं कितनी हैं, अगर आप कुछ हासिल करना चाहते हैं, तो आपके लिए आसमान है। जाइए अपने हिस्से का कर लीजिए अपने नाम। मगर इसी के साथ जबसे फीफा के विश्व कप के फाइनल में क्रोएशिया गया है तब से भारत की जनसंख्या को लेकर एक ख़ास वर्ग में लानत मनालत चल रही है। कि कुछ लाख की जनसंख्या वाला देश फीफा के फाइनल में पहुँच गया और हम अरबों की संख्या में हैं तब भी क्वालीफाई नहीं कर पाए।

एक फीफा ही नहीं, बल्कि कई चैम्पियनशिप हैं, जिनमे हमारे खिलाड़ी अच्छा नहीं करते। मगर फिर प्रश्न यही है कि ऐसा कहकर हम किसके प्रति प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं? किसी भी खेल के प्रति हमारी क्या जिम्मेदारी है? अनुभव सिन्हा लिखते हैं कि बयालीस लाख की आबादी वाला क्रोएशिया फीफाकप के फाइनल में पहुँच जाता है और हम यहाँ पर हिन्दू मुस्लिम खेल रहे हैं। हरभजन सिंह भी ऐसा ही कुछ कहते हुए नज़र आते हैं और देश को इस तरह प्रताड़ित करने वाले और नीचा दिखाने वाले ट्वीट को केजरीवाल जी जैसे नेता रीट्वीट करते हैं।

हम सभी को अधिकार है अपने देश की कमियों के बारे में बोलने का, मगर हम सभी को अपने अपने गिरेबान में तो झाँक कर देख लेना चाहिए। परिवर्तन की राजनीति करने वाले तुरंत ही हिन्दू और मुसलमान में बंटते हुए नज़र आ रहे हैं। इतना ही नहीं, राजदीप जी तो फ्रांस की जीत में मुस्लिमों और शरणार्थियों की भूमिका को बताते हुए, भारतीय क्रिकेट टीम में कितने दलित और आदिवासी रहे हैं, इस बारे में सवाल कर रहे हैं। और एक तरफ हमारी किरण बेदी जी हैं जो फ्रांस की जीत में इसलिए खुश हो रही हैं क्योंकि पुद्दुचेरी एक समय में फ्रांस का उपनिवेश रहा था। कई बार ऐसा नहीं लगता कि हम अभी तक मानसिक रूप से कितने गुलाम हैं?

कई बार ऐसा लगता है कि हमारी मानसिकता ही ऐसी हो गयी है कि हम कुछ सकारात्मक स्वीकार कर ही नहीं पाते। हमारी अपनी उपलब्धियां क्या हैं, हम नहीं देखना चाहते हैं। हमारे हॉकी के खिलाड़ी बसों में सफ़र करते हैं, और धक्के खाते हैं, वे फेमस नहीं हैं। और तब हमारे हरभजन जैसे खिलाड़ी उन खिलाडियों के लिए कुछ नहीं कहते। भारत से छोटे छोटे देश फिल्मों में ऑस्कर जीत चुके हैं, तो क्या हम अपने सभी फिल्म निर्माताओं को खारिज कर दें? वैसे भी केवल स्टार किड्स को लेकर सुरक्षित फ़िल्में बनाने वाली इंडस्ट्री में ऑस्कर विजेता फ़िल्में भूल जाइए। समस्याओं पर बात करिए, मगर देश को नीचा दिखाकर नहीं।

URL: talk about problems but not for defaming india

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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