“फेक न्यूज” पर बीबीसी का शोध ही बना है फेक डाटा पर!

ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन यानि बीबीसी ने भारत में फेक न्यूज उद्योग को लेकर अपनी एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। बीबीसी फेक न्यूज के खिलाफ अभियान नाम का अपना एक प्रोग्राम भी शुरू किया है। उसकी रिपोर्ट और अभियान न सिर्फ गलत है बल्कि अनैतिक और अवैध है बल्कि फेक न्यूज का एक जीता जागता उदाहरण है। फेक न्यूज पर जारी उसका शोष पत्र तो पहली नजर में ही उसके सेंपल साइज के आधार पर खारिज होता है बल्कि झूठ का सबसे बड़ा स्रोत बन गया है। क्योंकि शोष पत्र के एक भी नियम का पालन नहीं किया गया है। अपने हिसाब से डाटा क्रिएट कर उसक विश्वेषण किया गया है।

बीबीसी, रवीश कुमार, द वायर व वामपंथी गिरोह की प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रवादियों के खिलाफ ‘फेक न्यूज’ के नाम पर बड़ी साजिश देखिये विडियो:

मुख्य बिंदु

* फेक न्यूज के खिलाफ नहीं बल्कि समर्थन में चला रहा बीबीसी अपना अभियान

* शोध की पहली सीढ़ी यानि सेंपल साइज के आधार पर ही खारिज हो जाता है शोध

सर्वे आधारित शोध के बारे में जो भी थोड़ी बहुत जानकारी रखते हैं उन्हें पता है कि इसमें सेंपल साइज ही सबसे महत्वपूर्ण अंग होने के साथ महत्वपूर्ण भी होता है। संख्या के अनुपात में सेंपल साइज जितना बड़ा होगा गलती की गुंजाइश उतनी ही कम होगी। सेंपल साइज जितना छोटा होगा गलती की गुंजाइश उतनी ही अधिक होगी। इसके बाद भी सेंपल साइज का एक मानक तय है। लेकिन फेक न्यूज को लेकर बीबीसी ने जो सर्वे आधारित शोधपत्र तैयार किया है उसमें मानक सेंपल साइज का भी अनुपालन नहीं किया गया है।

आम सर्वे आधारित शोध के लिए एक सौ की संख्या पर मानक सेंपल साइज 50 होना चाहिए। ध्यान रहे इतने सेंपल साइज पर गलती की गुंजाइश 10 फीसद से ज्यादा रहती है। जबकि बीबीसी अपने इस शोध पत्र के लिए सेंपल साइज महज 40 रखा है। कहने का मतलब है कि उसका फेक न्यूज के खिलाफ तैयार उसका शोधपत्र इसी आधार पर खारिज हो जाता है

बीबीसी ने अपने इस शोष को मात्रात्मक की बजाय गुणात्मक बताया है। लेकिन उसके शोधपत्र से नहीं लगता है कि बीबीसी को गुणात्मक शोध की जानकारी भी है। क्योंकि उन्होंने अपने शोध में व्यक्तिपरक शोध किया है, जो मात्रात्मक आधारित होता है। गुणात्मक शोध वह होता है जिसका निष्कर्ष वस्तुपरक हो न कि व्यक्तिपरक। उन्होंने अपने शोध से यह साबित करने का प्रयास किया है कि फेक न्यूज फैलाने में राष्ट्रवाद का समर्थन करने वालों का हाथ है। इसके लिए बजापते उन्होंने फेक न्यूज फैलाने वालों की एक पूरी सूची जारी की। इससे तो साफ होता है कि बीबीसी ने फेक न्यूज के खिलाफ अपना अभियान या शोष पत्र शुरू करने से पहले यह तय कर लिया था कि मुझे यह साबित करना है। जबकि शोध में एकत्रित किए गए डाटा से परिणाम स्वत: सामने आता है। एकत्रित डाटा का विश्लेषण अपने हिसाब से जरूर किया जा सकता है।

इससे साफ है कि बीबीसी ने शोध की तैयारी करने से पहले ही न केवल अपना उद्देश्य तय कर लिया था बल्कि डाटा भी उसी हिसाब से तैयार किया है। सबसे खास बात यह कि बीबीसी ने जो सेंपलों की संख्या के साथ न केवल प्रश्नावली बल्कि टार्गेट ऑडियंस भी पहले तैयार कर लिया था। इसलिए बीबीसी के इस शोध पत्र को न केवल गलत बल्कि कपटपूर्ण तथा अनैतिक कहने में कोई हर्ज नहीं है।

कुछ लोग या फिर कुछ साइटों की सूची जारी कर देने से बीबीसी का शोध पत्र असली और नैतिक नहीं हो जाता है। मीडिया जगत में बीबीसी को फेक न्यूज का माध्यम और स्रोत माना जाता है। इससे साफ है कि अपने ऊपर फेक न्यूज फैलाने के लगे दाग को मिटाने के लिए ही एक साजिश के तहत बीबीसी ने फेक न्यूज के खिलाफ अभियान चलाने का स्वांग रचा है। ताकि लोगों में यह विश्वास पैदा किया जाए कि फेक न्यूज के खिलाफ अभियान चलाने वाला खुद फेक न्यूज का स्रोत कैसे हो सकता है?

फेक न्यूज के खिलाफ अफने अभियान के तहत उन्होंने कार्यक्रम भी शुरू किया है। इसकी शुरुआत लखनऊ से की। इस अभियान के तहत उन्होंने मोदी से घृणा करने वाले एक शख्स ध्रुव राठी का साक्षात्कार प्रकाशित किया है। ध्रुव राठी खुद को एक यू ट्यूबर कहता है, और अच्छा-खासा फॉलोअर होने का दावा भी करता है। लेकिन उसके साथ जिस प्रकार बातचीत हुई है उससे स्पष्ट हो जाता है कि बीबीसी का यह कार्यक्रम फेक न्यूज या उसे फैलाने वालों के खिलाफ नहीं बल्कि राष्ट्रवादियों को गाली देना तता मोदी के खिलाफ जनमत तैयार करना है। अगर ध्रुव राठी का खुद का वीडियों देखेंगे तो पता चल जाता है कि वह किस प्रकार एक खास राजनीतिक पार्टी और उसके अगुवा को स्थापित करने में लगे हुए हैं। आशंका तो यह जताई जा रही है कि उसे देश की ही किसी बड़ी विरोधी पार्टी फंड कर रही है, और उसने फेक फॉलोअर्स के नाम पर राष्ट्रवाद के खिलाफ अभियान चला रखा है। और बीबीसी ऐसे शख्स को मंच प्रदान कर लोकप्रिय बनाने का प्रयास कर रही है।

बीबीसी न केवल फेक न्यूज को प्रचारित करने में लगी है बल्कि कई बार असली न्यूज को भी फेक न्यूज की तरह ट्रीट कर उसकी उपेक्षा कर देती है। उदाहरण के तौर पर कुछ दिन पहले ही एक खबर आई थी कि मोदी सरकार के आईबीसी कानून के भय से 2100 कंपनियों ने 83,000 करोड़ रुपये का अपना पुराना कर्ज बैंकों को लौटा दिया है। यह खबर बिल्कुल फेक नहीं थी लेकिन बीबीसी ने उसे फेक न्यूज के रूप में उपेक्षित कर दिया। बीबीसी सही न्यूज को भी फेक न्यूज बनाने का खेल खेलती है।

इसलिए आज बिगत में प्रतिष्ठित माने जाने वाले मीडिया संस्थानों की मंशा पर भी नजर रखनी जरूरी है। क्योंकि बीबीसी जैसे मीडिया संस्थान अपनी पुरानी प्रतिष्ठा की आड़ में ही राष्ट्रवाद, राष्ट्रवादियों, हिंदू और हिंदुओं के संरक्षकों के खिलाफ फेक न्यूज के सहारे हमला करने में अग्रसर है।

URL: The BBC’s research on “Fake News” has been made on Fake Data

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