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गणतंत्र विशेष : देश के सर्वोच्च सम्मान अब राष्ट्र निर्माण के नायकों को खोजने लगे हैं

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के कुछ लोगों को अहसास था कि हम वास्तविक रुप में अब भी स्वतंत्र नहीं हैं। कुछ लोगों को आज भी ये लगता है कि भारतवर्ष एक आदर्श राष्ट्र बनने की यात्रा में है। सैंतालीस के बाद उसके घाव भरने में समय लगा लेकिन भारतवर्ष पुनः चल पड़ा। भारत की हैसियत विश्व समुदाय में एक अनुभवी बुजुर्ग की है। उसकी बुजुर्गियत के तजुर्बे सारी दुनिया पाना चाहती है।

इस बात को भला कौन स्वीकार नहीं करेगा कि स्वतंत्रता पश्चात इस अनुभवी वृद्ध के पचास वर्ष तो एक परिवार की चाकरी करने में निकल गए। वह लोकतंत्र था लेकिन उसके भीतर से राजतंत्र की तीखी गंध आती महसूस होती थी। ऐसा लगता है कि पिछले दस वर्ष की यात्रा में भारत में जागरण हुआ है। भारत के लोग अब इसे देश बनाने की बात करने लगे हैं। विश्व का सबसे सुसंगठित लोकतंत्र आज अपना दिन मना रहा है।

इस लोकतंत्र ने कोरोना काल में सिद्ध किया कि शताब्दियों की आयु वाला भारत विश्व के अन्य देशों से अधिक अनुभव रखता है। कोरोना काल में भारत के नागरिक सबसे धैर्यवान सिद्ध हुए हैं। पिछली फरवरी में हम एक अँधेरी सुरंग में दाखिल हुए थे। हमारे साथ इस सुरंग में संपूर्ण विश्व यात्रा कर रहा था। आज हम एक वर्ष बाद विजय की चमकीली धूप देख पा रहे हैं। चीन में पैदा हुए इस सूक्ष्म वायरस से हमने श्रेष्ठतम युद्ध किया है। इस बात के लिए विश्व हमें बधाई भी दे रहा है।

वह देख रहा है कि भारत की संस्कृति का कवच आखिर कैसे बनाया गया है। क्यों हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में इस वायरस को पराजय स्वीकार करनी पड़ी। अब भारत की इम्युनिटी पर शोध प्रारंभ हो गए है। निश्चय ही भारतवासियों को इस उपलब्धि पर गर्व होना चाहिए। भारत स्वयं को नए रुप में गढ़ रहा है। मुझे इस बात की बहुत प्रसन्नता है कि पद्म विभूषण जैसे पुरस्कार स्वयं को प्रतिष्ठित अनुभव कर रहे हैं। ये राष्ट्रीय महत्व के पुरस्कार अब उन लोगों को दिए जा रहे हैं, जो एक नया भारत गढ़ने में लगे हुए हैं।

इस देश में कभी ऐसी भी सरकार थी, जो एक ऐसे अभिनेता को पद्म श्री दे देती थी, जिसने मसाला फिल्मों में अभिनय करने के सिवा और कुछ नहीं किया। उन सरकारों को पद्मश्री और फिल्मफेयर अवार्ड के अंतर का ही पता नहीं था। इस वर्ष देश का दुसरा सर्वोच्च सम्मान चर्चा में है। ये पुरस्कार अब ऐसे नायकों को दिए जा रहे हैं, जिनको पहचानने वाले इस देश में बहुत कम हैं। ये हमारे मीडिया का प्रताप है कि वह चंद्रशेखर कम्बार और रजनीकांत देवीदास के ऊपर अक्षय कुमार को रखता है।

अक्षय नायक इसलिए है क्योंकि वह अपनी एक दिन की कमाई दान कर देते हैं। इस वर्ष चंद्रशेखर और रजनीकांत जी को पुरस्कार देने की घोषणा हुई है। चंद्रशेखर कन्नड़ भाषा के कवि और लोक साहित्यकार हैं। रजनीकांत देवीदास ‘रज्जू’ ने  गुजरात के वापी शहर को बसाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कर्नाटक के प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ बेल्ले मोनप्पा हेगड़े को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया है। 99 वर्षीय पुरातत्वविद बी.बी. लाल को भी पद्मविभूषण दिया गया है।

लाल एक प्रसिद्ध पुरातत्वविद हैं। बृजबासी लाल ने सन 1950 में हस्तिनापुर उत्खनन में सबसे अहम भूमिका निभाई। बाद में उन्होंने बाबरी मस्जिद के नीचे दबे राम मंदिर के प्राचीन अवशेषों को अध्ययन के बाद मंदिर का हिस्सा बताया था। इसके लिए उन्होंने ‘स्तम्भों का सिद्धांत’ प्रस्तुत किया था। अब ये सम्मान योग्य व्यक्तियों तक पहुँच रहे हैं। इसके बहाने भारत अपने असली हीरोज को पहचान रहा है। उसे समझ आ रहा है कि हीरो का अर्थ सलमान और अक्षय नहीं होता।

देश अब हीरो शब्द के सही मायने जानने लगा है। भारत सरकार अब ऐसे नायकों पर भी ध्यान दे, जिन्होंने तकनीक में नवाचार किये हैं। जैसे मात्र 26 वर्ष की आयु में गुजरात के बिनेश देसाई को ‘रिसाइकल मैन ऑफ़ इंडिया’ कहा जाने लगा है। ये उपाधि उन्हें दिवंगत अरुण जेटली जी ने दी थी। बिनेश की कंपनी इंडस्ट्रियल कचरे से बिल्डिंग मटेरियल बनाती है। उनकी कंपनी बायोमेडिकल कचरे से ईंटे भी बना रही है। 

पर्यावरण सुधार की दिशा में बिनेश एक अनुकरणीय कार्य कर रहे हैं। उनकी सोच युवाओं को प्रभावित कर सकती है। ऐसे नायकों को भी पुरस्कार मिले, ताकि देश के प्रतिभाशाली युवा जान सके कि असली नायक कैसे होते हैं। जिस ढंग से जापान के पूर्व प्रधानमंत्री को सम्मान दिया गया है, वैसे ही अमेरिका स्थित अनिरुद्ध शर्मा और निखिल कौशिक को सम्मान दिया जाना चाहिए। इन दोनों भारतीयों ने तो चमत्कार कर दिखाया है।

इनकी कहानी आपको न्यूज़ चैनल्स में नहीं मिलेगी। अनिरुद्ध और निखिल ने पर्यावरण सुधार के लिए एक अनूठा आविष्कार किया है। इन्होंने प्रदूषण से बनने वाली कालिख से स्याही बनाकर दिखा दी है। ये कुछ ऐसा है कि प्रदूषण नामक दैत्य को हवा में घुलने से पहले ही पकड़कर डिब्बे में बंद कर देना। प्रदूषण का ये दैत्य अब स्याही बनकर चित्रकारों के कैनवास पर चिपका हुआ है।

अब इनकी कंपनी ‘एयर इंक’ ऐसे गैजेट बना रही है, जिसे कार के धुआं छोड़ने वाले नोज़ल पर फिट करना होगा। ये दोनों भारतीय निःसंदेह देश से सम्मान पाने के अधिकारी हैं। क्षितिज पर ऐसे कई सितारें टिमटिमा रहे हैं, जो मौन के साथ देश को बनाने में लगे हुए हैं। राष्ट्रीय पुरस्कार अब उन नायकों का पता जानने के ज़रिया बन गए हैं। आओ उन्हें खोजे। उन शिल्पियों को लाकर नया भारत गढ़े।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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