जीवन में चहकने और फुदकने के मायने भी हमने गौरैया से सीखे!



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Courtesy Desk
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हेमंत शर्मा। गौरैया, अम्मा और आंगन. मेरे बचपन की ये यादें हैं. अम्मा रहीं नहीं. अब घरों में आंगन भी नहीं रहे. गौरैया भी मेरे घर आती नहीं. मेरी वे यादें छिन गईं, जिन्हें लेकर मैं बड़ा हुआ था। जीवन में चहकने और फुदकने के मायने भी हमने गौरैया से सीखे थे. प्रकृति से पहला नाता भी उसी के जरिए बना था. अब ऊंचे होते मकान, सिकुड़ते खेत, कटते पेड़, सूखते तालाब और फैलते मोबाइल टावरों ने प्यारी गौरैया को हमसे छीन लिया है. पिछले दिनों गौरैया को दिल्ली का ‘राज्य पक्षी’ घोषित किया गया. यह याद करना मुश्किल है कि गौरैया को आखिरी बार मैंने कब देखा था. पक्षी विज्ञानियों की मानें तो गौरैया विलुप्ति की ओर है. उसकी आबादी सिर्फ 20 फीसदी बची है।

चंचल, शोख और खुशमिजाज गौरैया का घोंसला घरों में शुभ माना जाता था. इसके नन्हे बच्चे की किलकारी घर की खुशी और संपन्नता का प्रतीक होती थी. हमारे घरों में छोटे बच्चों का पहला परिचय जिस पक्षी से होता था, वह गौरैया ही थी. उसके बाद कौवे से पहचान होती थी. सुनते हैं कि मेहमान के आने का संदेश देनेवाले काग पर भी अब खतरा है. कौवे भी गायब हो रहे हैं।

मां अकसर इन गौरैयों के ही सहारे रोते बच्चों को चुप कराती थीं. सुबह की नींद टूटती थी गौरैयों की चहक के साथ. मैं अपने आंगन में हर रोज गौरैया को पकड़ने की असफल चेष्टा के साथ ही बड़ा हुआ हूं. कोई पंद्रह सेंटीमीटर लंबी इस फुदकने वाली चिड़िया को पूरी दुनिया में घरेलू चिड़िया मानते हैं. सामूहिकता में इसका भरोसा है. झुंड में रहती है. मनुष्यों की बस्ती के आस-पास घोंसला बनाती है. आज के सजावटी पेड़ों पर इसके घोंसले नहीं होते. इस लिहाज से यह घोर समाजवादी है. दाना चुगती है. साफ-सुथरी जगह रहती है. हाइजीन का खयाल रखती है. पक्षियों के जात-पांत में इसे ब्राह्मण चिड़िया माना जाता है, क्योंकि शाकाहारी है. हर वातावरण में अपने को ढालनेवाली यह चिड़िया हमारे बिगड़ते पर्यावरण का दबाव नहीं झेल पा रही है. जीवन-शैली में आए बदलाव ने उसका जीवन मुहाल कर दिया है. लुप्त होती इस प्रजाति को ‘रेड लिस्ट’ यानी खतरे की सूची में डाला गया है.

हमारी आधुनिक जीवनशैली में गौरैया रूठ गई है, इसलिए अब नहीं आती।

गौरैया हमारी आधुनिकता की भेंट चढ़ती जा रही है. चालीस बरस पहले जब मेरे घर में छत से लटकनेवाला पहला पंखा आया, बड़ी खुशी हुई. लगा, मौसम पर विजय मिली. उसी कमरे के रोशनदान में नन्हीं गौरैया का हंसता-खेलता एक छोटा परिवार रहता था. आते-जाते एक रोज गौरैया पंखे से टकराकर कट गई. मासूम गौरैया घर आई आधुनिकता की पहली भेंट चढ़ी. पंखा तो हट नहीं सकता था, हमने इंतजाम किया कि गौरैया रोशनदान में न रहे. अब घरों से रोशनदान ही गायब हो गए हैं. मेरी मां घर में ही अनाज धोती-सुखाती थीं. आंगन में दाने फटकती थीं. आंगन में चावल के टूटे दाने गौरैया के लिए डाले जाते थे. गौरैया का झुंड पौ फटते ही आता था. चूं-चूं का उनका सामूहिक संगीत घर में जीवन की ऊर्जा भरता था. आज घर में आंगन नहीं है. पैकेट बंद अनाज आता है. वातानुकूलन के चलते रोशनदान नहीं है, माइक्रोवेव उपकरण हैं. इसीलिए गौरैया रूठ गई है, अब वह नहीं आती।

गौरैया समझदार और संवेदनशील चिड़िया है. बच्चों से इसका अपनापन है. रसोई तक आकर चावल का दाना ले जाती है. घर में ही घोंसला बनाकर परिवार के साथ रहना चाहती है. मौसम की जानकार है. कवि घाघ और भड्डरी की मानें तो अगर गौरैया धूल स्नान करे तो समझिए भारी बरसात होनेवाली है. तो फिर आखिर क्यों रूठ गई गौरैया? घरों के आकार बदल गए हैं और जीवन-शैली बदल गई है. दोनों का असर गौरैया के जीवन पर पड़ा है.
तमाम लोकगीतों, लोककथाओं और आख्यानों में जिस पक्षी का सबसे ज्यादा वर्णन मिलता है- वह गौरैया है. महादेवी वर्मा की एक कहानी का नाम ही है- ‘गौरैया’. उड़ती चिड़िया को पहचानने वाले पक्षी विशेषज्ञ सालिम अली ने अपनी आत्मकथा का नाम रखा है ‘एक गौरैया का गिरना’. कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी आत्मकथा ‘नीड़ का निर्माण फिर’ में गौरैया के हवाले से अपनी बात कही है. शेक्सपियर के नाटक ‘हेमलेट’ में भी एक पात्र अपनी बात कहने के लिए गौरैया को जरिया बनाता है. मशहूर शिकारी जिम कॉर्बेट कालाडूंगी के अपने घर में हजारों गौरैयों के साथ रहते थे।

गौरैया के नाम भले ही अलग-अलग हों लेकिन स्वभाव वही है।

पूरे देश में बोली-भाषा, खान-पान, रस्मो-रिवाज बदलता है. पर गौरैया नहीं बदलती. हिंदी पट्टी की गौरैया तमिल और मलयालम में कुरूवी बन जाती है. तेलुगु में इसे पिच्यूका और कन्नड़ में गुव्वाच्ची कहते हैं. गुजराती में यह चकली और मराठी में चीमानी हो जाती है. गौरैया को पंजाबी में चिड़ी, बांगला में चराई पाखी और ओड़िया में घट चिरिया कहा जाता हैं. सिंधी में झिरकी, उर्दू में ‘चिड़िया’ और कश्मीरी में चेर नाम से इसे बुलाते हैं. गौरैया के नाम भले ही अलग-अलग हों लेकिन स्वभाव वही है।

जैव विविधता पर लगातार बढ़ते संकट से न सरकार अनजान है और न समाज. फिर कैसे बचे गौरैया? हम क्या करें? वह सिर्फ यादों में चहकती है. अतीत के झुरमुट से झांकती है. क्यों यह समाज नन्ही गौरैया के लिए बेगाना है? हमें वापस इसे अपने आंगन में बुलाना होगा. नहीं तो हम आनेवाली पीढ़ी को कैसे बताएंगे कि गौरैया क्या थी. उसे नहीं सुना पाएंगे- ‘चूं-चूं करती आई चिड़िया. दाल का दाना लाई चिड़िया.’।

साभार: खबर का मूल लिंक।

URL: The Government is unaware of the ever increasing crisis on diversity !

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