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फिल्म उद्योग का दुःसाहस अब ‘पद्मावत’ से बढ़कर ‘कैलाश’ तक आ गया है

कैलाश पर्वत को भारत क्या संसार के हिंदू एक देवालय मानते हैं। ध्यान से देखा जाए तो काले पत्थर से निर्मित कैलाश एक स्वयंभू शिवलिंग ही है। संसार में ये मानने वालों की कमी नहीं है, जो कैलाश को शिव के स्थान के साथ-साथ एक शिवलिंग भी मानते हैं। कैलाश पर्वत मंगलवार के बाद से फिर चर्चा में आ गया है। मंगलवार को महेश भट्ट ने अपनी फिल्म ‘सड़क-2’ का पोस्टर जारी किया। पोस्टर में कैलाश पर्वत दिखाई दे रहा है। ये फिल्म सन 1991 में प्रदर्शित हुई ‘सड़क’ का सिक्वल है। इसके बाद फिल्म के निर्देशक महेश भट्ट, आलिया भट्ट और निर्माता मुकेश भट्ट पर प्रकरण दर्ज किया गया है।

सन 1991 में प्रदर्शित ‘सड़क’ में लड़की अपहरण कर वैश्यालय ले जाई जाती है। उसे प्रेम करने वाला टैक्सी ड्राइवर वैश्यालय की किन्नर मालकिन ‘महारानी’ से टकरा जाता है। ये फिल्म उस दौर में बेहद सफ़ल हुई थी। संजय दत्त के कॅरियर की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में इसे शामिल किया जाता है। अब 29 साल बाद महेश भट्ट की फिल्म में खलनायक बदल गया है।

‘महारानी’ की जगह एक आश्रम का गुरु लेने वाला है। आलिया भट्ट का किरदार बरखा दत्त की शैली में फर्जी संत का भंडाफोड़ करता है। 29 साल बाद भारत इतना बदल गया कि महेश भट्ट की फिल्म का विलेन भी बदल गया। गौरतलब है कि महेश भट्ट उस तथाकथित गैंग के मुख्य सदस्य हैं, जो अपनी फिल्मों और बयानों से सदा ही हिंदुत्व विरोधी कमेन्टरी करते रहे हैं।

क्या ‘सड़क-2’ पद्मावत और पीके जैसी फिल्मों की राह पर है। फिल्म की विषयवस्तु देखकर तो यही लग रहा है कि महेश भट्ट विवादों की आंच पर रोटी सेंकना चाहते हैं। आलिया भट्ट ने कैलाश पर्वत की तस्वीर लगाने पर तर्क दिया है कि ‘कैलाश पर्वत पर देवताओं और ऋषियों के पदचिन्ह हैं। सड़क 2 प्यार की राह है। यह सीक्‍वल आपको सभी तीर्थों की मां तक ले जाएगा।’

आलिया की मासूमियत पर क्या कहा जाए। परेशानी ये है कि आलिया के पिता ने उन्हें कभी कैलाश पर्वत के बारे में बताया ही नहीं है, तो उनके मुंह से ऐसी ही बातें निकलेंगी। आलिया और उनके पापा को छोड़ सब जानते हैं कि आदियोगी से ही ये सृष्टि शुरू हुई थी तो सबसे बड़ा तीर्थ तो कैलाश ही होता है। आलिया से कोई ये पूछे कि ‘तीर्थों की माँ क्या होती है।’

संदिग्ध मौत मरे सुशांत सिंह राजपूत की मौत की काली छाया भी ‘सड़क-2’ पर पड़ रही है। ‘आशिकी 2’ हाथ से फिसल जाने के बाद सुशांत को ‘सड़क-2’ में काम करने का मौका मिल रहा था। सुशांत इस फिल्म को करने के लिए इतने उत्साहित थे कि महेश भट्ट से कई बार मुलाक़ात कर चुके थे। इसके बावजूद महेश भट्ट ने सुशांत को किनारे कर आदित्य रॉय कपूर को मेन लीड में अनुबंधित कर लिया।

सुशांत की मौत की कई परतें अभी खुलना बाकी है। अब पता चल रहा है कि नेपोटिज़्म ने सुशांत के कॅरियर पर कितना बुरा असर डाला था। बॉलीवुड में नेपोटिज्म को नापने के लिए सुशांत के जीजा विशाल कीर्ति ने एक ‘नेपोमीटर’ लॉन्च किया है। इस नेपोमीटर में उन्होंने ‘सड़क-2’ को 98 प्रतिशत ‘नेपोटिस्टिक’ बताया है क्योंकि फिल्म के कलाकार, निर्माता, निर्देशक, तकनीशियन एक ही परिवार के हैं।

महेश भट्ट की ‘सड़क-2’ का प्रीमियर ओटीटी प्लेटफॉर्म पर होने जा रहा है। वे जानते हैं कि थियेटर्स में अभी उनकी फिल्म रिलीज होना संभव नहीं है और इस फिल्म को लेकर दर्शकों में कोई हाइप नहीं दिखाई दे रही है। संजय दत्त भी बॉक्स ऑफिस पर बड़ा नाम नहीं रहे हैं और खुद महेश भट्ट बीस साल बाद निर्देशन में वापसी कर रहे हैं।

 कहने का मतलब ये कि उनकी फिल्म को न मीडिया हाइप दे रहा था, न ही सोशल मीडिया। लीजिये एक पोस्टर रिलीज करने के बाद सब दूर उनकी फिल्म की चर्चा हो रही है। संजय लीला भंसाली इस अदा में माहिर हैं। वे अपनी फिल्मों के प्रदर्शन से पूर्व विवाद पैदा कर देते हैं और फायदा फिल्म को होता है। महेश भट्ट का ये कारनामा बता रहा है कि फिल्मों को चलाने का ये सस्ता आयडिया उन्हें संजय लीला भंसाली से मिला है।

हम भूले नहीं है कि किस तरह से संजय लीला भंसाली की ‘पद्मावत’ को थियेटर्स में पुलिस द्वारा सुरक्षा प्रदान की गई थी। जबकि वह फिल्म फर्जी तथ्यों के आधार पर बनाई गई थी। न्यायालय ने उक्त फिल्म के प्रदर्शन के लिए राज्य  सरकारों को निर्देश दिए थे। क्योंकि न्यायालय उसी इतिहास पर विश्वास करता है जो पूर्व इतिहासकार लिखकर चले गए और देश में हमेशा के लिए ये विवाद पैदा कर गए।

क्या महेश भट्ट की इस फिल्म से ‘पद्मावत’ का इतिहास दोहराया जाएगा। महेश भट्ट ने तो पोस्टर जारी कर अपनी मंशा प्रकट कर ही दी है। स्टोरी लाइन से समझ आ रहा है कि हिंदू धर्म पर भट्ट साहब कीचड़ मलने की तैयारी कर चुके हैं। हमेशा की तरह सूचना व प्रसारण मंत्रालय शक्तिशाली बॉलीवुड के समक्ष घुटने टेक देगा और इस विवादित फिल्म की निष्कंटक रिलीज के लिए आदेश दे देगा। फिल्म उद्योग का दुःसाहस अब ‘पद्मावत’ से बढ़कर ‘कैलाश’ तक आ गया है। इस दुःसाहस का कोई इलाज है क्या।

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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