सिंधु-गंगा की घाटियों से जो संपत्ति गजनवी ने लूटी, वह राख में बदल गई

अंग्रेज़ों के टुकड़ों पर पले और वामपंथी सोच के इतिहासकारों ने महमूद गजनवी के बारे एक झूठ प्रचारित किया है कि भारत में उसके सत्रह हमलों का उद्देश्य इस्लाम का प्रचार नहीं बल्कि हमारे भव्य नगरों को लूटना था। इस झूठ को वे लगातार प्रचारित करते आए हैं लेकिन इतिहास के वातायनों से मुस्लिम आक्रांता का क्रूर चेहरा स्पष्ट दिखाई देता है। सनातन धर्म को जड़ से मिटा देने की चाह में उसने भारत के वैभवशाली शहरों को जड़ से मिटा दिया लेकिन भविष्य में वे फिर उठ खड़े हुए। उनके पुरुत्थान पुनः उतने वैभवशाली ढंग से नहीं हो सके लेकिन उन शहरों ने अपना अस्तित्व नहीं मिटने दिया।

महमूद गजनवी मूर्तियों से बहुत घृणा करता था। वह जितना बड़ा लुटेरा था, उससे भी बड़ा मूर्ति भंजक सिद्ध हुआ। अब से ठीक एक हज़ार साल पहले गजनवी ने मथुरा पर आक्रमण किया था। 2 दिसंबर 1017 ई. को उसने मथुरा पर धावा बोला। आशा के विपरीत उसे मथुरा के शासक कुलचंद्र से कड़ी चुनौती मिली।

महमूद के मीरमुंशी ‘अल-उत्वी’ ने अपनी किताब  ‘तारीखे यामिनी’ में लिखा है ‘कुलचंद विशाल राज्य, अपार वैभव, हजारों की संख्या वाली सेना, विशाल हाथी और मजबूत किलों का स्वामी था। वह अपने सैनिक और हाथियों के साथ गजनवी का मुक़ाबला करने के लिए तैयार हो गया। वीरतापूर्वक युद्ध करने के बाद  लगभग पचास हज़ार सैनिक उस युद्ध में मारे गये या नदी में डूब गये, तब कुलचंद्र ने हताश होकर पहले अपनी रानी और फिर स्वयं को भी तलवार से समाप्त कर दिया।’

इस हमले से पहले भी गजनवी भारत में आकर लूट मचाता रहा। अफगानिस्तान और पंजाब के क्षेत्रों में उसने लाखों लोगों को मौत के घाट उतार दिया और असंख्य मंदिर नष्ट कर दिए थे। जब 3 दिसंबर 1017 को वह मथुरा में प्रविष्ट हुआ तो नोंच डाली गई असहाय नगरी सामने थी। स्थानीय नागरिक मथुरा छोड़ चुके थे।

पवित्र धरती भाड़े के सैनिकों की क्रूरता का गवाह बन गई थी। अल-उत्वी ने लिखा है ‘इस शहर में सुल्तान ने पत्थरों से बना अत्यंत सुंदर भवन देखा। स्थानीय लोग बताते थे कि ये भवन मनुष्यों ने नहीं बल्कि देवताओं ने बनाया है। नगर का परकोटा पत्थर का बना हुआ था, उसमें नदी की ओर ऊँचे तथा मजबूत आधार-स्तंभों पर बने हुए दो दरवाजे स्थित थे। शहर के दोनों ओर हज़ारों मकान बने हुए थे जिनमे लगे हुए देवमंदिर थे। ये सब पत्थर के बने थे।

उत्वी आगे लिखता है ‘ शहर के बीच में सभी मंदिरों से ऊँचा एवं सुन्दर एक मन्दिर था,जिसका पूरा वर्णन न चित्र बनाकर किया जा सकता है न लिखकर इसकी सुंदरता के बारे में बताया जा सकता है। यदि कोई ऐसी संरचना बनाना चाहे तो दस करोड़ दीनार की जरूरत होगी और बनाने में 200 साल लग जाएंगे चाहे विश्व के योग्य इंजीनियरों को इस काम में लगा दिया जाए। महमूद की आज्ञा से सभी मंदिरों को जलाकर राख कर दिया गया।

बीस दिनों की लूट में  सोने की पाँच बड़ी मूर्तियाँ महमूद के हाथ लगी, जिनकी आँखें बहुमूल्य माणिक्यों से जड़ी हुई थीं। केवल एक सोने की मूर्ति का वज़न ही चौदह मन था। इन मूर्तियों तथा चाँदी की बहुसंख्यक प्रतिमाओं को सौ ऊँटो की पीठ पर लाद कर ग़ज़नी ले जाया गया।’ गजनवी ने कहा था ‘मैं यहाँ मंदिर तोड़ते-तोड़ते थक चुका हूँ। जितने तोड़ते हैं उतने ही मिलते जाते हैं।’ जिस मुख्य मंदिर को बनाने में लगभग दो सदियां लगी थी, वह दो दिन में जमींदोज कर दिया गया।

गजनवी की क्रूरता यही नहीं थमी। उसकी सेना मथुरा के निर्दोष नागरिकों पर टूट पड़ी। हजारों लोग मार दिए गए। बच्चों और औरतों को उनसे अलग कर दिया गया। गजनवी दो लाख महिलाओं और बच्चों को गुलाम बनाकर गजनी ले गया। गजनी में उन दिनों ऐसा लगता था कि ‘मिनी हिंदुस्तान’ बन गया है। हर ओर भारत से लाए गए गुलाम दिखाई पड़ते थे। गजनवी की तलवार की प्यास यहीं ख़त्म नहीं हुई। गंगा के किनारों पर बने सात मजबूत किले ध्वस्त कर दिए गए। उन किलों में बने अत्यंत प्राचीन दस हज़ार मंदिर धूल में मिला दिए गए। बताया जाता है कि ये मंदिर बीस से तीस हज़ार वर्ष पुराने थे।

जो बेहिसाब सम्पत्ति महमूद गजनवी लूट कर ले गया था, वह एक सदी भी टिक न सकी। गजनवी की मौत के बाद अलाउद्दीन गौरी ने गजनी पर हमला किया। गजनवी द्वारा लूटी संपत्ति फिर से लूट ली गई। एक सप्ताह तक शहर आग में जलता रहा।  जज्जुनी अपनी तबकात – इ – नसीरी में लिखते हैं ‘सिंधु-गंगा की घाटियों और गुजरात से लूटी गई संपत्ति राख में बदल गई।’ नियति का खेल देखिये कि जो शहर उसने लूटकर नष्ट कर दिए, वे फिर से बसा लिए गए लेकिन महमूद की क्रूरता का प्रतीक ‘गजनी’ अब एक भूला जा चुका शहर है। किसी शहर को उजाड़कर नया शहर नहीं बसाया जा सकता।

ख़ास बातें

– नवंबर 1001 में पेशावर की लड़ाई में जयपाल को हराने के बाद महमूद ने चार लाख सोने के सिक्कों की लूट की। हर सिक्के का वजन 120 ग्राम था। लूटे गए जवाहरात का वजन दो लाख सोने के सिक्कों के बराबर था। स्वतंत्र करने के एवज में राजा को लगभग ढाई लाख सोने के सिक्कों का भुगतान अलग से करना पड़ा था। इस लूट की कुल कीमत एक अरब अमेरिकी डॉलर के बराबर आंकी जाती है।

– आनंदपाल के पुत्र आनंदपाल ने राज्यभार संभाला और बदले की भावना से मुल्तान पर हमला कर महमूद को परेशान कर दिया। महमूद ने फिर से पेशावर पर हमला किया। अबकी बार उसने 70 लाख चांदी के सिक्के,  कई सौ किलो वजन की सोने और चांदी के सिल्लियां और बहुमूल्य रत्न जडित गहने लुटे।

– भीमनगर किले में एक भवन था, जिसकी लम्बाई 30 गज और चौडाई 15 गज थी, इस भवन की छतें चांदी की थीं, जो दो सोने के और और दो चांदी के खम्बों पर टिकी हुई थी, उस पर भी कब्जा कर लिया गया। ये लूट इतनी भीषण थी कि आज जयपाल युग का एक सोने सिक्का भी विश्व के किसी संग्रहालय में नहीं पाया जाता।

– महमूद का मुख्य लक्ष्य सोमनाथ का मंदिर था। वह जानता था कि गजनी से सोमनाथ के बीच उसकी राह में बहुत से कांटे हैं। उसने एक अनुभवी रणनीतिकार के समान 25 वर्षीय योजना बनाई और धीरे धीरे उस पर अमल शुरू किया। उसने सोमनाथ जाने वाले रास्तों पर कब्जे किये। रास्ते में पड़ने वाले शहरों को लूटा। बड़ी तादाद में स्थानीय  नागरिकों को गुलाम बनाया। लूटे हुए धन का इस्तेमाल युद्ध जीतने के लिए किया।

– हरियाणा में घुग्गर नदी के किनारे बसा थानेसर गजनवी के सातवें आक्रमण का शिकार हुआ। यहाँ की सभी मूर्तियां तोड़ दी गई। मुख्य मूर्ति के अवशेष गजनी की मस्जिद की सीढ़ियों पर लगा दिए गए। लूट में एक ऐसा माणिक्य प्राप्त हुआ, जिसका वजन दो किलो था।

– थानेसर के राजा ने न आत्मसमर्पण किया, न ही इस्लाम कबूल किया। जिन हिन्दुओं ने इस्लाम कबूल नहीं किया उनको मार दिया गया। इतना खून बहाया गया कि नदी का पानी भी रक्तिम हो गया।चक्रस्वामी का विशाल मंदिर नष्ट हो गया और उसकी मानवाकार कांस्य प्रतिमा गजनी ले जाकर पानी में फेंक दी गई।

– महमूद ने लाहौर, कन्नौज, मेरठ, बुलंदशहर, मथुरा, सहारनपुर और ग्वालियर को लूटा। महमूद ने बुलंदशहर से 10 लाख चांदी के सिक्के लूटे, मंदिरों से पांच सोने की और 200 चांदी की मूर्तियों के अलावा, कन्नौज, मुंज, आसनी, शर्वा और अन्य स्थानों से 30 लाख चांदी के सिक्कों की लूट की। बड़ी संख्या में लोगों को गुलाम बनाकर गजनी ले जाया गया।

– महमूद का सोलहवां आक्रमण उसका मुख्य लक्ष्य था। इस मंदिर की रक्षा में पचास हज़ार हिन्दुओं ने प्राण त्याग दिए। महमूद ने मुख्य मूर्ति को तोड़ दिया। वह सोने, चांदी, हीरे और बहुमूल्य रत्नों के साथ लौटा, जो अनुमानित 20 मिलियन सोने के सिक्के थे। उसके सभी हमलों में उसके द्वारा एकत्र की गई यह सबसे बड़ी लूट थी। लेकिन वापसी में जाट और भट्टी योद्धाओं ने उसकी सेनाओं को बहुत नुकसान पहुँचाया।

URL :  ancient city of Mathura was attacked by Mahmud Ghazni
Keywords: Mathura, Mahmud, ruler of Ghazni, Lord Krishna, destruction

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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