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संघ-सत्ताधारियों ने दशकों से केवल नेहरूवादी काम ही किए हैं!

शंकर शरण। बंगाल की घटनाओं ने फिर दिखाया कि बड़ी कुर्सी पर बैठ जाना बल का पर्याय नहीं होता। राष्ट्रीय या राजनीतिक, दोनों सदंर्भों में बल का पैमाना भिन्न होता है। जिस में संघ-परिवार सदैव दुर्बल रहा है। तुलना में वामपंथी अधिक आत्मविश्वासी रहे हैं। संघ-भाजपा कुर्सीधारी भी उन से बचते हैं। फिर भी यदि यहाँ इन की दुर्गति नहीं हुई, तो कारण अभी भी बचा पारंपरिक हिन्दू समाज है। वह बीच में अवरोध बन कर संघ-भाजपा कुर्सीधारियों को बचाता है। पर कब तक? जिस तरह संघ-परिवार ने हिन्दू समाज को भ्रमित, विश्वासघात भी किया, तथा केवल अपनी परवाह की, जबकि सभी हिन्दू-विरोधी शत्रु निरंतर चोट कर रहे हैं; उस से यह समाज स्वयं क्षीण हो रहा है।

सही दृष्टि के बिना कुर्सी से कुछ नहीं होता।  जैसे, हथियार चलाना न जानने वाले को हथियार देना व्यर्थ है! उस के भरोसे रक्षा की आस करने वाला मारा जाता है। अभी बंगाल में यही हुआ। यही पहले कश्मीर में पूरा हो चुका। परन्तु संघ-भाजपा का पुराना रोग है:  गंभीरतम मामलों को भी न तो जानना; न जानने की चिंता। फलतः संघ-परिवार एक विचारहीन, और नीतिहीन समूह रहा है।

वह हर मुद्दे पर वामपंथी-इस्लामी आक्रमणों का उत्तर देने से बचता है। उलटे उन्हीं के मुहावरे अपना लेता है। ठसक से कि, ‘हम भी वही बोल रहे हैं’। मानो वे बड़ी अच्छी बातें हों! सोशलिज्म, सेक्यूलरिज्म, सोशल-जस्टिस, मायनोरिटी, जेंडर, आदि। सभी विभिन्न साम्राज्यवादी मतवादों के हिन्दू-विरोधी मुहावरे।

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सो, हिन्दू समाज को तोड़ने के लिए गढ़े गए नारे खुद संघ-परिवार उठा लेता है! अपने अज्ञान को चतुराई समझता है। सच्चिदानन्द वात्स्यायन (अज्ञेय) के शब्दों में कहें तो, यह ‘‘अंधे के हाथ में आग होने’’ जैसा है। जो अनजाने कहीं भी आग लगा देगा, और समझेगा भी नहीं कि उस ने क्या कर डाला! संघ के कई ‘थिंक-टैंक’ और मुस्लिम मंच नियमित वही कर रहे हैं! वे हिन्दू समाज की जड़ में मट्ठा डाल रहे हैं। पर उसे दूध समझते हैं!

इस प्रकार, ‘आइडियोलॉजी’ का दावा करने वाला संघ-परिवार वस्तुतः आइडिया-विहीन है! यह राष्ट्रीय संकट है, क्योंकि उसे हिन्दू नेतृत्व माना जाता है। संकट इस से और विकट बनता है कि उसे इस का बोध भी नहीं! उन के नेता तमाशा-लफ्फाजी करते, और कार्यकर्ता झूमते रहते हैं। गलतियों के उल्लेख पर नाराज होते हैं। भारत में हिन्दुओं के लिए कोई पार्टी नहीं, इसे वे अपने एकाधिकार का और आलोचना रोकने का तर्क बनाते हैं: ‘‘हम में कमी हो, तो क्या आप कांग्रेस को पसंद करेंगे?’’

इस तरह, हर बात ‘कुर्सी पर कौन रहे’ पर ले आना भी विचार-शून्यता है! हर समय चुनाव नहीं हो रहा होता। अतः जो बात पाँच साल में एक बार, वह भी मात्र कुछ सप्ताह होनी चाहिए, जैसे अमेरिका-यूरोप में है; उसे वे यहाँ अहर्निश चलाते हैं। क्योंकि दिमाग में कुछ और नहीं।

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वे किसी विषय पर विमर्श तक नहीं करते। जैसे, भारत में हिन्दुओं का दूसरे समुदायों के समान धार्मिक शैक्षिक अधिकारों से वंचित रहना; गिरती संस्कृति; कुशिक्षा; राज्यतंत्र का अंतहीन अकर्मक विस्तार; शासकीय व्यक्तियों को अनुचित सुविधाएं; व्यापक भ्रष्टाचार; राजनीतिक दलों के अबाध अधिकार; उन के संदिग्ध वित्तीय स्त्रोत; सरकारी कोष से पार्टी-प्रचार; आदि। किसी बिन्दु पर उन की कोई घोषित नीति नहीं। इसीलिए यहाँ वामपंथी बौद्धिक दबदबा स्थाई है। यह किसी ‘ईको-सिस्टम’ की कमी नहीं है। ईको तो किसी स्वर का होता है – चुप्पी की क्या प्रतिध्वनि होगी! अभी देखिए, बंगाल में हिन्दू-संहार पर संघ-भाजपा के साहबों का क्या स्वर उठा, जिस का ‘ईको’ होता?

संघ-भाजपा सभी मुद्दों पर वामपंथियों की नकल करते हैं। ‘विकास’, ‘सेक्यूलरवाद’, ‘देवालय से अधिक जरूरी शौचालय’, ‘संविधान धर्म-ग्रंथ है’, इस्लाम की चापलूसी, मुस्लिम संस्थाओं को अधिकाधिक संसाधन देना, आदि। हिन्दू-हितों के मुद्दों से संघ संगठन खुद अनजान हैं! उन के सत्ताधारी उलटे काम करें, तो वही कुतर्क:  ‘‘क्या कांग्रेस बेहतर है?’’ यह दृष्टिहीनता के साथ मतिशून्यता है। सारी जगह घेरकर, किन्तु निठल्ले रहते हुए, सभी हिन्दू-शत्रुओं को फैलते जाने का खुला अवसर देना।

संघ-परिवार ने मान लिया है कि चुनाव जीतने वाला सब कर लेगा। इसलिए कुर्सी पाना मात्र लक्ष्य है। विविध तरकीबों, संयोगों से वे कुर्सीनशीं हो जाते हैं। तब अँधेरे में टटोलना शुरू करते हैं। तमाशों पर उन की निर्भरता का मुख्य कारण दृष्टिहीनता से बना नीतिगत खालीपन है। इसीलिए, ऐसे काम भी दशकों से उपेक्षित हैं जिन्हें निर्विरोध किया जा सकता था! केवल राज्यों में भी किया जा सकता था।

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सत्ता के लिए संघ सदैव प्रयत्नशील रहा। किन्तु सत्ता में आके क्या करना – इस पर नहीं सोचा। सारा समय आत्म-प्रशंसा / पर-निन्दा में जाता है। वह भी सपाट। जैसे: नेहरू बुरे थे, पटेल अच्छे थे। बस। इस से अधिक कुछ पता नहीं। राष्ट्रीय समस्याओं पर भी ऐसे ही सपाट। इतना भी नहीं देख पाते कि संघ-सत्ताधारियों ने दशकों से केवल नेहरूवादी काम ही किए हैं!

संघ-भाजपा के आधे लोग गाँधी-प्रचारक हैं, आधे गाँधी-निंदक। आधे विदेशी-निवेश के उत्साही हैं, आधे स्वदेशी वाले। यह सब ‘आइडिया’-विहीनता के ही प्रमाण हैं। गत पचास सालों से संघ परिवार के चेहरे बदलते रहे किन्तु अंतर्वस्तु खाली की खाली रही। मात्र कुर्सियों पर पहुँचने और वहाँ बैठे रहने की जुगत। अपने कुर्सीधारी की योग्यता, कार्य, कार्यफल, आदि से बेपरवाह। मात्र पार्टी-बंदी, और अपने नेताओं पर अंधविश्वास। ये सारे लक्षण हिन्दू चेतना के विरुद्ध हैं।

यह परिदृश्य दुःखद होने के साथ-साथ खतरनाक है। इस के कुपरिणाम बढ़ रहे हैं। जैसे, हिन्दुओं का हीन दर्जे के नागरिक बना रहना; हिन्दू-विरोधी शिक्षा का वर्चस्व; आर.टी.ई. द्वारा शिक्षा व्यवसाय से हिन्दुओं को क्रमशः बाहर करना; मुस्लिम दबदबे वाले इलाकों -संस्थाओं में हिन्दुओं का दयनीय हाल;  आदि। संघ सत्ताधारी/ संगठन कभी हिन्दुओं के साथ खड़ा होने भी नहीं आता। दूर से एकाध गोल-मोल बयानबाजी कर वे चुप बैठे रहते हैं। दिल्ली से कलकत्ता, व कश्मीर से कर्नाटक तक, दशकों से यही दिखता रहा है।

संघ परिवार के पास अपने बौद्धिक संस्थानों, ‘थिंक-टैंकों’, ‘फाउंडेशनों’ की भरमार है। किन्तु वे मुख्यतः पार्टी-प्रचार करते हैं। किसी प्रासंगिक समस्या पर शोध, आकलन नहीं करते। बस अपने नेताओं को ‘ऋषि’, ‘दार्शनिक’, आदि बताते रहते हैं। ऐसे-ऐसे नेता, जिन की कोई राष्ट्रीय देन तो क्या, किसी उल्लेखनीय पुस्तक-पुस्तिका, भाषण, पाराग्राफ तक का उल्लेख नहीं कर पाते। किन्तु उन्हीं को ज्ञानी, महापुरुष बताने के लिए सैकड़ों आयोजन, मूर्ति-स्थापन, सरकारी नामकरण, आदि करते रहे हैं। शत-प्रतिशत कम्युनिस्टों की नकल।

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इस प्रकार, संघ परिवार खुद को किसी कसौटी-जबावदेही से परे, और समाज-निरपेक्ष समझता है। हिन्दू समाज अपमानित, असहाय पड़ा रहे; पर अपना संगठन हर कहीं दिखे, बढ़े! यह वृक्ष की जड़ में दीमक लगने के प्रति बेपरवाही जैसी है, जिस की किसी डाल पर इतराते रहें।

उन के नेताओं की सारी चुस्ती केवल कांग्रेस-निंदा में दिखती है, क्योंकि यह *निरापद* काम है! हिन्दू समाज के असली शत्रुओं पर संघ परिवार के कुर्सी-नशीन चुप, तो कुर्सी-विहीन बातें बनाते हैं। यह हालत क्या दर्शाती है?

उन के बड़े-बड़े लोग कुर्सी से हटा देने पर छवि, साधन, नेटवर्क, आदि सब कुछ होते भी निठल्ले पड़े रहते हैं! या सालों साल केवल नाटक दर नाटक करते हैं। मानो अंधेरे में तीर चला रहे हों। कि किसी बहाने फिर कुर्सी मिले। इस से अधिक उन की कोई कल्पना, आकांक्षा नहीं।

संघ का गढ़ा जुमला ‘संघे शक्ति कलियुगे’ घोर प्रवंचना है। वस्तुतः हिन्दू समाज ही सच्चा संगठन है। उस से ‘अलग’ संघ/दल बना लेने भर से कोई बुद्धि पैदा नहीं होती। वरना दशकों से दिल्ली में जमे संघ-भाजपा चार दिन पहले खड़े हुए केजरीवाल से बुरी तरह, दो बार कैसे पिटे? वह भी मजबूत केंद्रीय सत्ता, नाटकीय नेता, तमाम संसाधन एवं प्रचारतंत्र हाथ में रहते। जबकि केजरीवाल भी *निरापद* प्रतिद्वंदी हैं!

संघ के सदाशयी लोगों को समझना होगा कि हिन्दू समाज और सच्ची चेतना मूल शक्ति है। कोई संघ/दल नहीं। चेतना ही संगठन का उपयोग करती है। इस का उलटा असंभव है। घोड़े को गाड़ी के पीछे लगाने से गंतव्य तक पहुँचना असंभव है।

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