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ओशो के शब्दों में कैलाश का रहस्य!

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कैलाश – एक अद्भुत तीर्थ दो-तीन बातें सिर्फ उल्लेख कर दूं, क्योंकि वे घटित होती हैं। जैसे कि आप कहीं भी जाकर एकांत में बैठ कर साधना करें तो बहुत कम संभावना है कि आपको अपने आस-पास किन्हीं आत्माओं की उपस्थिति का अनुभव हो, लेकिन तीर्थ में करें तो बहुत जोर से होगा। कहीं भी करें, वह अनुभव नहीं होगा; लेकिन तीर्थ में आपको प्रेजेंस मालूम पड़ेगी–थोड़ी बहुत नहीं, बहुत गहन। कभी इतनी गहन हो जाती है कि आप मालूम पड़ेंगे कि कम हैं, और दूसरे की प्रेजेंस ज्यादा है।

जैसे कैलाश है। कैलाश हिंदुओं का भी तीर्थ रहा है और तिब्बतन बौद्धों का भी। पर कैलाश बिल्कुल निर्जन है, वहां कोई आवास नहीं है। कोई पुजारी नहीं है, कोई पंडा नहीं है, कोई प्रकट आवास नहीं है कैलाश पर। लेकिन जो भी कैलाश पर जाकर ध्यान का प्रयोग करेगा वह कैलाश को पूरी तरह बसा हुआ पाएगा। जैसे ही कैलाश पर पहुंचेगा, अगर थोड़ी भी ध्यान की क्षमता है, तो कैलाश से कभी कोई यह खबर लेकर नहीं लौटेगा कि वह निर्जन है। इतना सघन बसा है, इतने लोग हैं, और इतने अदभुत लोग हैं। लेकिन ऐसे कोई बिना ध्यान के कैलाश जाएगा तो कैलाश खाली है।

इसलिए चांद के संबंध में जो लोग और तरह से खोज करते हैं, उनका ख्याल नहीं है कि चांद निर्जन है। और जिन्होंने कैलाश को अनुभव किया है वे कभी नहीं मानेंगे कि चांद निर्जन है। लेकिन आपके यात्री को चांद पर कोई नहीं मिलेगा। जरूरी नहीं है इससे कि कोई न हो। आपके यात्री को कोई नहीं मिलेगा। इसलिए बेचारे जैन, उनके ग्रंथों में बहुत वर्णन है कि चांद पर किस-किस तरह के देवता हैं, क्या हैं, बड़ी मुश्किल में पड़ गए हैं, वहां कोई नहीं है! और उनके साधु-संन्यासी बड़ी मुश्किल में हैं। तो वे बेचारे एक ही उपाय कर सकते हैं, उनको कुछ और तो पता नहीं है, वे यही कह सकते हैं कि तुम असली चांद पर पहुंचे ही नहीं। वे इसके सिवाय और क्या कहेंगे? तो अभी गुजरात में कोई मुझे कह रहा था कि कोई जैन मुनि पैसा इकट्ठा कर रहे हैं यह सिद्ध करने के लिए कि तुम असली चांद पर नहीं पहुंचे।

यह वे कभी सिद्ध न कर पाएंगे। आदमी असली चांद पर पहुंच गया है। लेकिन उनकी कठिनाई यह है कि उनकी किताब में लिखा है कि वह आवास है वहां! वहां इस-इस तरह के देवता रहते हैं! पर उनकी किताब में लिखा है और उनको तो कुछ पता नहीं है। तो वह किताब है और अब #वैज्ञानिक की रिपोर्ट है कि वहां कोई भी नहीं है। अब क्या करना? तो साधारण बुद्धि जो कर सकती है वह यह कि फिर तुम उस चांद पर नहीं पहुंचे। एक तो यह, और अगर नहीं सिद्ध कर पाए तो फिर मानना पड़ेगा कि हमारा शास्त्र गलत हुआ। तो जब तक जिद बांध रखेंगे बांध रखेंगे कि नहीं, तुम उस जगह नहीं पहुंचे। तो एक जैन मुनि ने तो यह कहा कि आप वहां नहीं पहुंचे।

अब इनकार भी नहीं कर सकते, पहुंचे तो जरूर हैं, तो फिर कहां पहुंच गए हैं? तो उन्होंने क्या कहा! कभी-कभी हास्यास्पद और रिडीकुलस हो जाती हैं बातें! उन्होंने कहा कि वहां देवताओं के जो विमान ठहरे रहते हैं चारों तरफ, आप किसी विमान पर उतर गए। वे बड़े विराट विमान हैं। किसी पर उतर कर आप लौट आए हैं, चांद पर आप ठीक चांद की भूमि पर नहीं उतर सके हैं।

अब यह सब पागलपन है, लेकिन इस पागलपन के पीछे कुछ कारण है। वह कारण यह है कि एक धारा है, कोई अंदाजन बीस हजार वर्ष से जैनों की धारा है कि चांद पर आवास है। पर अब वह उनको ख्याल में नहीं है कि वह आवास किस तरह का है। वह आवास कैलाश जैसा आवास है, वह आवास तीर्थों जैसा आवास है।

जब आप तीर्थ पर जाएंगे तो एक तीर्थ तो वह #काशी है जो दिखाई पड़ती है। जहां आप ट्रेन से उतर जाएंगे स्टेशन पर, एक तो काशी वह है। इसलिए काशी के दो रूप हैं–तीर्थ के दो रूप हैं। एक तो मृण्मय रूप है, वह जो दिखाई पड़ रहा है, जहां कोई भी जाएगा सैलानी और घूम कर लौट आएगा। और एक उसका चिन्मय रूप है, जहां वही पहुंच पाएगा जो अंतरस्थ होगा, जो ध्यान में प्रवेश करेगा, तो काशी बिल्कुल और हो जाएगी। तो काशी के सौंदर्य का इतना वर्णन है, और इस काशी को देखो तो फिर लगता है कि वह कवि की कल्पना है।

इससे ज्यादा गंदी कोई बस्ती नहीं है, यह काशी जिसको हम देख कर आ जाते हैं। पर किस काशी की बातें कर रहे हो तुम? किस काशी की बात हो रही है? किस काशी के सौंदर्य की? अपूर्व! ऐसा कोई नगर नहीं है इस जगत में! यह सब तुम किसकी बात कर रहे हो? यह काशी अगर है, तब फिर यह सब कवि-कल्पना हो गई! नहीं, पर वह काशी भी है। और एक कांटैक्ट फील्ड है यह काशी, जहां उस काशी और इस काशी का मिलन होता है। तो यह जो यात्री सिर्फ ट्रेन में बैठ कर गया है, वह इस काशी से वापस लौट आता है। वह जो ध्यान में भी बैठ कर गया है, वह उस काशी से भी संपर्क साध पाता है। तब इसी काशी के निर्जन घाट पर उनसे भी मिलना हो जाता है जिनसे मिलने की आपको कभी कोई कल्पना नहीं हो सकती, उनसे मिलना हो जाता है।

तो कैलाश पर #अलौकिक निवास है। करीब-करीब नियमित रूप से, नियम कैलाश का रहा है कि कम से कम पांच सौ बुद्ध-सिद्ध तो वहां रहें ही, उससे कम नहीं। पांच सौ #बुद्धत्व को प्राप्त व्यक्ति कैलाश पर रहेंगे ही। और जब भी एक उनमें से विदा होगा किसी और यात्रा पर, तो दूसरा जब तक न हो तब तक विदा नहीं हो सकता। पांच सौ की संख्या वहां पूरी रहेगी ही।

उनकी पांच सौ की मौजूदगी कैलाश को तीर्थ बनाती है। लेकिन यह बुद्धि से समझने की बात नहीं है इसलिए मैंने पीछे छोड़ रखी। उन पांच सौ की उपस्थिति कैलाश को तीर्थ बनाती है। काशी का भी नियमित आंकड़ा है कि उतने संत वहां रहेंगे ही। उनमें से कभी कमी नहीं होगी। उनमें से एक को विदा तभी मिलेगी जब दूसरा उस जगह स्थापित हो जाएगा। असली तीर्थ वही हैं। और उनसे जब मिलन होता है तो आप तीर्थ में प्रवेश करते हैं। पर उनके मिलन का कोई भौतिक स्थल भी चाहिए। आप उनको कहां खोजते फिरेंगे! उस अशरीरी घटना को आप न खोज सकेंगे, इसलिए भौतिक स्थल चाहिए। जहां बैठ कर आप ध्यान कर सकें और उस अंतर्जगत में भी प्रवेश कर सकें, और वहां संबंध सुनिश्चित है।

एक तो यह, जो बुद्धि से ख्याल में नहीं आएगा, बुद्धि से उसका कोई संबंध नहीं है। तो तीर्थ का–ठीक तीर्थ का–अर्थ, जो दिखाई पड़ जाता है वह नहीं है; छिपा है, उसी स्थान पर छिपा है। दूसरी बात, इस जमीन से जब भी कोई व्यक्ति परम ज्ञान को उपलब्ध होकर विदा होता है, तो उसकी करुणा उसे कुछ चिह्न छोड़ देने को कहती है। क्योंकि जिनको उसने रास्ता बताया, जो उसकी बात मान कर चले, जिन्होंने संघर्ष किया, जिन्होंने श्रम उठाया, उनमें से बहुत से होंगे जो अभी नहीं पहुंच पाए। और उनके पास कुछ संकेत चाहिए, जिनसे कभी भी जरूरत पड़ जाए तो वे संपर्क पुनः साध सकें।

इस जगत में कोई आत्मा कभी खोती नहीं, पर शरीर तो खो जाते हैं। तो उनसे संपर्क साधने के लिए सूत्र चाहिए। उन सूत्रों के लिए भी तीर्थों ने ठीक वैसे ही काम किया जैसे कि आज हमारे राडार काम कर रहे हैं। जहां तक आंखें नहीं पहुंचतीं वहां तक राडार पहुंच जाते हैं। जो आंखों से कभी नहीं देखे गए तारे, वे राडार देख लेते हैं। तो तीर्थ बिल्कुल आध्यात्मिक राडार का इंतजाम है। जो हमसे छूट गए, जिनसे हम छूट गए, उनसे भी संबंध स्थापित किए जा सकते हैं।

इसलिए प्रत्येक तीर्थ निर्मित तो किया गया उन लोगों के द्वारा, जो अपने पीछे कुछ लोग छोड़ गए हैं, जो अभी रास्ते पर हैं, जो पहुंच भी नहीं गए और जो अभी भटक सकते हैं। और जिन्हें बार-बार जरूरत पड़ जाएगी कि वे कुछ पूछ लें, कुछ जान लें, कुछ आवश्यक हो जाएगा। और छोटी सी जानकारी उन्हें भटका दे सकती है। क्योंकि भविष्य उन्हें बिल्कुल ज्ञात नहीं है, आगे का रास्ता उन्हें बिल्कुल पता नहीं है। तो उन सबने सूत्र छोड़े हैं। और उन सूत्रों को छोड़ने के लिए विशेष तरह की व्यवस्थाएं की हैं-तीर्थ खड़े किए, मंदिर खड़े किए, मंत्र निर्मित किए, मूर्तियां बनाईं, और सबका आयोजन किया। और सबका आयोजन एक सुनिश्चित प्रक्रिया है। रिचुअल जिसे हम कहते हैं, वह एक सुनिश्चित प्रक्रिया है।

ओशो

गहरे पानी पैठ
प्रवचन – ०६
तीर्थ : परम की गुह्य यात्रा

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