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21 वीं सदी के भटके हुए चंद्रशेखर आजादों की गाथा : कहीं मैं भी तो नहीं ?

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आदित्य जैन। एक चंद्रशेखर आजाद थे , जिन्होंने अपना सर्वस्व देश को समर्पित कर दिया था और आज 21वीं सदी के युवा हैं , जिन्होंने अपना सर्वस्व अपने स्वार्थ और खासकर सोशल मीडिया की चुहलबाज़ी को समर्पित कर दिया है । वो अपने अधिकांश समय को अनुत्पादक कार्यों में नष्ट कर रहे हैं। न तो समस्या बोध है और न ही शत्रु बोध है, समाधान की तो आप बात ही छोड़ दीजिए।

निम्नलिखित पंक्तियां लेखक के दर्द को भी व्यक्त करती हैं, आजाद के साहस को भी दर्शाती हैं, युवाओं की वर्तमान स्थिति पर तीखा , निर्मम प्रहार भी करती हैं , युवाओं को जगाने के लिए उन्हें उद्वेलित और प्रेरित भी करती हैं । चंद्रशेखर आजाद की तुलना महादेव चंद्रशेखर से भी की गई है और विभिन्न उपमाओं से दोनों के रूपों में भी समानता बताई है । कृपया इन पंक्तियों के सार को , इसकी मूल भावना को अपने अंतर्मन और आत्मा में उतर जाने दें।

है चंद्रशेखर सम्मुख खड़े !
निर्भय शांत जनेऊ पहने ,
सनातन के भगवा को ओढ़े ,
चेतना के अमृत्व का प्रमाण
कमजोरियों को जो दे त्राण !
मूछों पर देशभक्ति का ताव
प्राणों से ज्यादा देश से लगाव !
प्रयागराज की आजादी के प्रतीक
खींच दी क्रांतिकारियों के लिए नई लीक ।

थर – थर कांपे और घबराए अंग्रेज़ जिनसे ,
मृत युवाओं के संकल्पों में जान फूंक दे फिर से !
जिनकी मूर्ति के पास बैठना ऊर्जा से भर दे ,
जिनका ध्यान मन की कमजोरियों को दूर कर दे ।
ऐसे चंद्रशेखर को मेरा नमन !
एक चंद्रशेखर शिव हैं , जिन्होंने विष पिया था ,
उस विष की दाहकता को कम करने ,
मस्तक पर चन्द्र को धरा था ।
वहीं पर गंगा को भी जटा पर धारण किया था ,
भस्म को रमाए , कैलाशपति जो कहाए ।

इस आजाद चंद्रशेखर ने भी विष पिया था ,
अंग्रेज़ों की यातना का विष !
इस आजाद चंद्रशेखर ने भी चन्द्र को धरा था ,
देश प्रेम की शीतलता का चन्द्र !
इस आजाद चंद्रशेखर ने भी गंगा को धारण किया था ,
अनवरत संघर्ष , बंदूकों की गोलियों की गंगा !
भस्म भी रमाई थी ,
क्रांति की भस्म !
वो शिव कैलाश में अमर हैं ,
ये आजाद प्रयागराज में अमर हैं ,
अमर हैं क्रांतिकारियों के बीच यह नाम – चंद्रशेखर ।

क्रांति के लिए साहस चाहिए ,
जवानी खपानी पड़ती है ,
ठोकरें भी खानी पड़ती हैं ।
सिर्फ बंदूक उठाना क्रांति नहीं है ,
सहसा जोश से भरना क्रांति नहीं है ,
समाज के निर्माण का स्वप्न ,
देश के भविष्य की योजना ;
ध्वंस के साथ सृजन की
शक्ति लगानी पड़ती है ,
स्वयं को भारत की माटी में मिलाने की
योजना बनानी पड़ती है ।

आज भी नए ” आजाद ” चाहिए
आज भी नए ” चंद्रशेखर ” चाहिए
आज भी खुद के प्राणों को देश भूमि में
न्योछावर करने वाले ” अभिमानी ” चाहिए !
लेकिन आज के युवाओं को देश से तो कोई
मतलब ही नहीं है !

उन्हें तो रोटी , दाल , कपड़ा , मकान से भी कोई
मतलब नहीं है ;
आज के युवा कहते हैं –

” रोटी नहीं मुझे व्हाट्सएप के मैसेज खाना है ,
कपड़े नहीं मुझे फेसबुक के लाइक्स पहनने हैं ,
दाल नहीं मुझे टिक टॉक के वीडियो बनाना है ,
मकान नहीं मुझे इंस्टाग्राम में झोपड़ी ( ग्राम ) मिल गई है ,
आटा नहीं गूथना मस्तिष्क को ट्विटर से गूथ लिया है । “

मां ,
पिताजी ,
अब मूलभूत आवश्यकता आटा , दाल , रोटी , कपड़ा ,
मकान नहीं है ;
क्रांतिकारियों ने हमें आजादी दे दी है ,
अब हमें तो मौज करनी है ,
हम उनके बलिदानों को भूल गए हैं ,
हम उनके बहाए गए खून की कोई कदर नहीं करते हैं ।
वो सत्तर साल पहले की बात है ,
हम 21 वीं सदी की पैदाइश हैं ।

मूलभूत आवश्यकता अब –
व्हाट्सएप , फेसबुक , टिक टॉक , इंस्टाग्राम और टि्वटर हैं ;
साथ में पबजी का मैदान है खेलने के लिए !
तो फिर विवेकानंद की बात मानकर हम
खुले मैदान में फुटबॉल क्यों खेलें ?
यूट्यूब है देश विदेश घूमने के लिए ,
तो फिर भारत भ्रमण के लिए क्यों निकले ?

मां ,
पिताजी ,
मुझे दुनिया नहीं देखनी अब !
सब कुछ मोबाइल में ही तो है
दोस्त , गर्लफ्रेंड , ब्वॉयफ्रेंड , रिश्ते – नाते
पढ़ाई , मनोरंजन , चिकित्सा , पोर्न !
मैं थक गया हूं ;
जा रहा हूं खुद को ही अनइनस्टॉल करने !
यह आज के युवा हैं ,
जो सुसाइड कर रहे हैं ।
एक चंद्रशेखर आजाद हैं जिन्होंने देश के लिए
स्वयं को न्योछावर कर दिया !!
ये 21 वीं सदी के जो युवा भटके हुए चंद्रशेखर
आजाद हैं ,
इन्हे इनकी शक्ति बताने की जरूरत है ,
आंखों के सम्मुख निर्मम रक्त से सना
इतिहास लाने की जरूरत है ;
जलियांवाला और विभाजन में शहीद लाशों
की गिनती कराने की जरूरत है ।

आज जागने की जरूरत है ,
आज जगाने की जरूरत है ,
आज रक्त को उबालने की जरूरत है ,
आज आग चाहिए देश के लिए कुछ करने की !
आज वीतराग चाहिए देश के लिए लड़ने की !
पहले खुद की कमजोरियों से लड़े ,
फिर देश की कमजोरी को अपनी शक्ति से दूर करें।

है चंद्रशेखर सम्मुख खड़े !
निर्भय शांत जनेऊ पहने ,
सनातन के भगवा को ओढ़े ,
चेतना के अमृत्व का प्रमाण
कमजोरियों को जो दे त्राण !
मूछों पर देशभक्ति का ताव
प्राणों से ज्यादा देश से लगाव !
प्रयागराज की आजादी के प्रतीक
खींच दी क्रांतिकारियों के लिए नई लीक ;
नमन है , नमन है , चंद्रशेखर को नमन है !
जय हिन्द ! जय भारत ! जय सनातन !

।।जयतु जय जय पुनर्जागरण आह्वान ।।

( लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग के गोल्ड मेडलिस्ट छात्र हैं । कई राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में अपने शोध पत्रों का वाचन भी कर चुके हैं । विश्व विख्यात संस्था आर्ट ऑफ लिविंग के युवा आचार्य हैं । भारत सरकार द्वारा इन्हे योग शिक्षक के रूप में भी मान्यता मिली है । भारतीय दर्शन , इतिहास , संस्कृति , साहित्य , कविता , कहानियों तथा विभिन्न पुस्तकों को पढ़ने में इनकी विशेष रुचि है और यूट्यूब में पुस्तकों की समीक्षा भी करते हैं । )

लेखक आदित्य जैन
सीनियर रिसर्च फेलो
यूजीसी प्रयागराज
adianu1627@gmail.com

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