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युवा पीढ़ी जान गई कि श्री राम कपोल कल्पना नहीं हैं!

रामायण का अर्थ होता है, राम का अयण। अयण का अर्थ होता है ‘भ्रमण’। राम जी का संपूर्ण वैश्विक भ्रमण और उससे उपजी घटनाओं ने कालांतर में रामायण का रूप लिया। इस समय भारतवर्ष की धरती राममय हुई जा रही है तो ऐसे कुछ लोग याद आ रहे हैं, जिनके कारण राम का नाम न केवल बढ़ा अपितु युवा वर्ग और बच्चों में रामायण काल के बारे में जानने की इच्छा बढ़ी। इंटरनेट के इस युग में सूचनाओं का तीव्र आदान-प्रदान हुआ। इसके कारण श्री राम पर किये गए अनुपम शोध जन सामान्य की पहुँच में आए। रामसेतु के बारे में जो शोध किये गए, उससे युवा पीढ़ी में श्री राम के प्रति न केवल सम्मान में वृद्धि हुई, बल्कि वे ये जान गए कि श्री राम कपोल-कल्पना नहीं थे।

राम के रक्तबीजों में सबसे पहला नाम डॉ. राम अवतार शर्मा का नाम स्मरण में आता है। पुराविद और इतिहासकार राम अवतार शर्मा ने अपना पूरा जीवन उन स्थानों को खोजने में लगा दिया, जहाँ राम और सीता के जीवन से जुड़ी उल्लेखनीय घटनाएं हुई थी। उन्होंने इन स्थानों पर विस्तृत खोज की।

राम अवतार ने ऐसे 200 स्थानों की खोज की। उन्होंने इस क्षेत्रों में बने स्मारकों, मंदिरों, गुफाओं में बने शैलचित्रों के आधार पर अपना शोध किया। इसके लिए उन्होंने उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, रामेश्वरम और श्रीलंका स्थित नुवारा एलिया पर्वत शृंखला तक की यात्रा की।

बचपन में राम वन गमन के लोकगीत सुनकर राम अवतार  रोने लगते थे। आयकर विभाग में छोटी सी नौकरी थी। ये जानना चाहते थे कि राम वास्तविक हैं या काल्पनिक पौराणिक चरित्र। इन यात्राओं ने राम अवतार को पूरी तरह बदल डाला।

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उन्होंने जाना कि आज भी राम भारतीय संस्कृति के मुख्य नायक क्यों बने हुए हैं। आज इस पावन अवसर पर देश के लोगों को ये मालूम होना चाहिए कि श्रीराम सांस्कृतिक शोध संस्थान में चालीस वर्षों से लगातार राम जी पर शोध किया जा रहा है।

फादर कामिल बुल्के का उल्लेख भी यहाँ बहुत जरुरी है। सन 1909 में बेल्जियम में जन्मे कामिल को राम के निश्छल चरित्र ने इतना प्रभावित किया कि वे आजीवन उनके भक्त बने रहे। वे एक मिशनरी थे लेकिन प्रचार राम का करते थे। कामिल तुलसी और वाल्मीकि भक्त थे। उन्होंने श्रीराम पर एक व्यापक शोध किया है। ये शोध उन विद्वानों के शोधों का संकलन है, जो विश्व के विभिन्न देशों से संकलित किये गए थे।

कामिल ने राम की वास्तविकता और व्यापकता पर कभी अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत नहीं किया बल्कि राम को लेकर विश्व के विद्वानों के नज़रिये को हमारे सामने रखा। कामिल ने प्राचीन काल से लेकर अब तक राम कथा की उत्पत्ति और विकास पर उल्लेखनीय कार्य किया। कामिल चाहते थे विश्व जाने कि राम कोई कल्पित चरित्र नहीं बल्कि इतिहास पुरुष थे। तार्किकता और वैज्ञानिक आधार पर वे ये सिद्ध करने में सफल रहे, जैसे डॉ. शर्मा सफल रहे थे।

विपिन किशोर सिन्हा भी अपने एक शोध को लेकर बहुत चर्चित हुए थे। विपिन ने इस बात पर शोध किया कि क्या सच में राम ने सीता का परित्याग कर दिया था। अपने शोध को उन्होंने एक किताब की शक्ल दी। ये किताब संस्कृति शोध एवं प्रकाशन वाराणसी ने प्रकाशित की थी।

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इस किताब में विपिन ने तथ्यात्मक ढंग से समझाया है कि राम जी ने सीता का परित्याग कभी किया ही नहीं। ऐसे ही एक लेखक अशोक कुमार आर्य की लिखी किताब ‘रावण इतिहास’ से उस काल के समूचे परिदृश्य का एक अनुमान मिलता है। उस काल के विज्ञान और तकनीक के बारे में पता चलता है। उस काल की विभिन्न प्रजातियों के बारे में पता चलता है। ऐसे ही आचार्य चतुरसेन की लिखी किताब ‘वयं रक्षामः (1955) से रामायण काल की अनूठी बातों का पता चलता है। इन्हें पढ़ना रोचक अनुभव है।

राम के इन रक्तबीजों ने रामायण और रामायण काल को लेकर जो महान कार्य किये हैं, वे अद्भुत हैं। किसी ने राम परिक्रमा पथ खोज निकाला तो किसी ने विश्वभर में राम जी पर हुए शोधों को संकलित किया। किसी ने रामायण में शामिल किये भ्रामक तथ्यों से पर्दा हटाने का काम किया तो किसी ने अपने उपन्यास में उस काल का रोचक वर्णन किया। यदि राम मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए हज़ारों कारसेवकों का महती योगदान है तो राम जी को वास्तविक नायक बताने में इन रक्तबीजों का योगदान नकारा नहीं जा सकेगा।

रामायण काल के ज्ञान-विज्ञान की संक्षिप्त जानकारी

मन्त्रिका (मन्त्र की शक्ति से उड़ने वाले विमान)

यांत्रिका(यंत्र की शक्ति से उड़ने वाले विमान)

तंत्रिका ( तंत्र की शक्ति से उड़ने वाले विमान)

लंका उस युग में सबसे संपन्न और आधुनिक देश था।

युद्ध धनुष बाण के अलावा तकनीक से भी लड़े जाते थे।

लंका के पास लड़ाकू वायुयानों और समुद्री जलपोतों के बेड़े थे।

वहां वेधशालाएं और दूरसंचार यंत्र भी हुआ करते थे।

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रामायण के युद्ध में आणविक शक्ति का प्रयोग किया गया था।

जब आणविक शक्ति का प्रयोग किया गया तो लंका के साथ दक्षिण भारत का कुछ भाग भी ढहकर समुद्र में चला गया। तिरूकोणमलै के रामायणकालीन शिव मंदिर भी समुद्र में समा गए। अब सेटेलाइट इमेजनरी से उन मंदिरों का पता चल गया है।

उस समय में आग के गोले थर्माइट से तैयार किये जाते थे। शम्बूक के पास एक ‘सूर्यहास खड्ग’ था, तकनीक की मदद से चलता था।

पुष्पक विमान रत्नजड़ित था। विमान का फर्श मरकत मणि का बना था। उसका कमरा सफ़ेद रंग का था। विमान में रत्न जड़ित कलाकृतियां बनाई गई थी।

शत्रु की जानकारी लेने के लिए लंका के द्वार पर ‘‘दारू पंच’ नामक तकनीक लगी हुई थी। इसका उल्लेख चतुरसेन और मदन शर्मा ‘शाही’ ने किया है।

मानवास्त्र, कांचनमालिनी शक्ति, सौर चलित अस्त्र, चित्राग्नि”यंत्र, मकरमुख,आशी विषमुख,वाराह मुख, अग्निदीप्तिमुख, अजवग धनुष, पिनाक धनुष, भुशुंडी(बंदूकें), ब्रम्ह छत्र, दूर नियंत्रण यंत्र, शूल, खड्ग, मुदगर

क्रौचगिरि -काराकुरम

शिवदान -सूडान

अंगिरा -अफ्रीका

मान्धाता -मानडाटे

शिवदेश -मिस्र

आद्र सागर -आडियाटिक सी

काम्बोज -कंबोडिया

प्रजातियां: आर्य, अनार्य, आगत, समागत, देव, यज्ञ, पितर, नाग, दैत्य, दानव, असुर, व्रात्य

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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